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Saturday, May 9, 2020

लॉक डाउन की खामोशी में ऑनलाइन कक्षाओं की शोर:डॉ.रमेश कुमार

मोतिहारी/जनादेश।लॉक डाउन की खामोशी में ऑनलाइन कक्षाओं की शोर

भारत में कोरोना कहर के कारण लॉकडाउन के तीसरे चरण में सभी प्राध्यापकों एवं छात्रों का जीवन लॉक है। प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में परिसर कक्षाएं बाधित है। विदित हो कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय, यूजीसी एवं कुलाधिपति द्वारा छात्र/छात्राओं के हित में सभी विश्वविद्यालयों को आॅनलाइन शिक्षण जारी रखने का निर्देश दिया गया है। महंत शिव शंकर गिरि महाविद्यालय, अरेराज में पदस्थापित हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रमेश कुमार ने बताया कि इस लाॅकडाउन में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों द्वारा भी क्षेत्राधीन महाविद्यालय के प्राचार्यों को छात्रों की अॉनलाइन पढ़ाई हेतु निर्देशित किया गया है। कुलपति महोदय के आदेश अनुपालनार्थ महाविद्यालय के प्राचार्यों द्वारा प्राध्यापकों को निर्देश अग्रसारित कर दिया गया है। लक्ष्मण रेखा के अंदर सुरक्षित रहते हुए कृत अॉनलाइन अध्यापन की साप्ताहिक प्रतिवेदन भी विश्वविद्यालय को प्रेषित की जा रही है।इस आकस्मिक आपदा में विद्यार्थियों के हितार्थ इस प्रकार का निर्णय यद्यपि स्वागतयोग्य है तथापि इसके अनुपालन में संसाधन एवं प्रशिक्षण का अभाव बाधाएं उत्पन्न कर रही हैं।

               सर्वविदित है कि किसी बेहतर कार्य परिणाम हेतु संसाधन एवं प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अॉनलाइन शिक्षण हेतु निर्देश तो जारी कर दिया गया किंतु कार्ययोजना एवं सफलता पर अपेक्षित विमर्श नहीं किया गया।प्रदेश का शायद ही कोई महाविद्यालय इस प्रकार के निर्देश का अक्षरशः अनुपालन करने में शत-प्रतिशत समर्थ हो। यहां के विश्वविद्यालयों अॉनलाइन शिक्षण की सफलताएं संदिग्ध है। फिर भी विश्वविद्यालय के सक्षम पदाधिकारी द्वारा अॉनलाइन पढ़ाई का निर्देश जारी होते ही तकनीक प्रेमी प्राध्यापक संबंधित पाठ्यक्रमों के अध्यापन का विडियो बनाकर यूट्यूब तथा व्हाटस्एप समूह में प्रेषित कर रहे हैं। कुछ प्राध्यापकगण तकनीक प्रेमी नहीं हैं। उनका क्या ? ऐसे प्राध्यापक क्या करें ? विडियो बनाकर अपलोड करने में भी समस्याएं हैं। यदि दस से पंद्रह मिनट तक का विडियो है तो सहजता से अपलोड हो जाता है किन्तु व्याख्यान बीस से अधिक मिनट का होने पर यूट्यूब अथवा व्हाटस्एप समूह में प्रेषित नहीं हो पाता है। दस से पंद्रह मिनट के व्याख्यान में किसी अध्याय/पाठ को ठीक ढंग से समझाया भी नहीं जा सकता है। 

कतिपय समस्याओं के वावजूद विभिन्न महाविद्यालयों के नवनियुक्त प्राध्यापकों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान का विडियो बनाकर अपलोड किया जा रहा है। यहां यह विचारणीय है कि क्या विश्वविद्यालय के सभी प्राध्यापकों एवं  विद्यार्थियों के पास एंड्रॉयड स्मार्टफोन, टैब या लैपटॉप उपलब्ध है ? जिनके पास इन संसाधनों की कमी है वे लाॅकडाउन अवधि में कैसे शिक्षण करेंगे ? जिन विद्यार्थियों के पास संसाधन तो है किंतु इस बात की पुष्टि कैसे होगी कि वे अॉनलाइन व्याख्यान से कितना प्रतिशत लाभान्वित हो रहे हैं अथवा नहीं। 

विडियो अपलोड वाली समस्या को देखते हुए पाठ्यक्रम से संबंधित अध्ययन सामग्री व्हाटस्एप समूह के माध्यम से छात्रों तक पहुंचाने के उपाय सुझाए गए। महाविद्यालय के प्राध्यापकों द्वारा यह कार्य भी किया जा रहा है, किंतु विचारणीय बिंदु यह है कि शायद ही कोई ऐसा महाविद्यालय हो जिसके पास सभी नामांकित विद्यार्थियों का व्हाटस्एप नम्बर उपलब्ध हो। बहुत ऐसे निर्धनतम विद्यार्थी हैं जिनके पास साधारण मोबाइल भी नहीं है। बहुसंख्यक विद्यार्थियों के पास स्मार्टफोन ही नहीं है। ऐसे विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत है जिनके नामांकन पंजी में अभिभावकों की दुरभाष संख्या दर्ज है। इस स्थिति में क्या इस प्रकार के विद्यार्थियों तक प्राध्यापकों द्वारा किए गए कठिन परिश्रम का फल पहूंच पा रहा है ? 

अपने कर्तव्य निर्वहन एवं छात्र-छात्राओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए प्राध्यापकों द्वारा अपने-अपने महाविद्यालय में नामांकित विद्यार्थियों का विषयवार व्हाटस्एप समूह का निर्माण कर शिक्षण कराया जा रहा है। जिज्ञासु विद्यार्थी प्रतिदिन इस व्यवस्था से लाभान्वित भी हो रहे हैं, किंतु व्हाटस्एप समूह निर्माण में भी अनेक समस्याएं सामने आ रही हैं। प्रथमत: बहुसंख्य विद्यार्थियों के नामांकन पंजी में दर्ज मोबाइल नंबर अभिभावकों का है तथा कुछ का मोबाइल नंबर बंद है। द्वितीयत: बड़ी समस्या है कि व्हाटस्एप समूह में कुछ विद्यार्थियों द्वारा पाठ्यक्रम से संबंधित प्रश्न की बजाय अवांछित संदेश प्रेषित कर दी जा रही है। वैसे विद्यार्थियों को अॉनलाइन दण्डित भी नहीं किया जा सकता है। फलत: समूह का माहौल खराब हो जा रहा है, स्वत: कुछ विद्यार्थी समूह से बाहर निकल जा रहे हैं। छात्रोन्मुखी रूप में समाधान हेतु सभी प्राध्यापकों की दुरभाष संख्या  सार्वजनिक की गयी है। इससे विद्यार्थी विषय से संबंधित समस्याओं का समाधान सीधे प्राप्त कर रहे हैं।

इस आकस्मिक विपदा में विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने हेतु महाविद्यालय के प्राध्यापकों द्वारा किए जा रहे कर्त्तव्य निर्वहन अत्यंत ही प्रशंसनीय है। विश्वविद्यालयों को अॉनलाइन अध्ययन-अध्यापन हेतु समुचित संसाधनों से लैस हो जाने की जरूरत है। इसके लिए सभी प्राध्यापकों को प्रशिक्षण देने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। अंतत: कक्षाध्यापन की जगह अॉनलाइन अध्यापन कदापि नहीं ले सकता है। कक्षाध्यापन ही सर्वाधिक प्रभावशाली अध्यापन होता है। शिक्षक-छात्र के बीच स्नेहशीलता, संवेदनशीलता, प्रभावशीलता एवं गतिशीलता जैसे चरित्र ऑनलाइन शिक्षण में हो ही नहीं सकती।

 

 

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