Friday, January 29, 2021

मकड़ी की कहानी

 *दैनिक अयोध्या टाइल्स* 

धर्मेंद्र कुमार पोरवाल अहमदाबाद*
 शहर के एक बड़े संग्रहालय (Museum) के बेसमेंट में कई पेंटिंग्स रखी हुई थी. ये वे पेंटिंग्स थीं, जिन्हें प्रदर्शनी कक्ष में स्थान नहीं मिला था. लंबे समय से बेसमेंट में पड़ी पेंटिंग्स पर मकड़ियों ने जाला बना रखा था.
बेसमेंट के कोने में पड़ी एक पेंटिंग पर एक मकड़ी (Spider) ने बड़ी ही मेहनत से बड़ा सा जाला बुना हुआ था. वह उसका घर था और वह उसके लिए दुनिया की सबसे प्यारी चीज़ थी. वह उसका विशेष रूप से ख्याल रखा करती थी.
एक दिन संग्रहालय (Museum) की साफ़-सफाई और रख-रखाव कार्य प्रारंभ हुआ. इस प्रक्रिया में बेसमेंट में रखी कुछ चुनिंदा पेंटिंग्स (Paintings) को म्यूजियम के प्रदर्शनी कक्ष में रखा जाने लगा. यह देख संग्रहालय के बेसमेंट में रहने वाली कई मकड़ियाँ अपना जाला छोड़ अन्यत्र चली गई.
लेकिन कोने की पेंटिंग की मकड़ी ने अपना जाला नहीं छोड़ा. उसने सोचा कि सभी पेंटिंग्स को तो प्रदर्शनी कक्ष में नहीं ले जाया जायेगा. हो सकता है इस पेंटिंग को भी न ले जाया जाये.  
कुछ समय बीतने के बाद बेसमेंट से और अधिक पेंटिंग्स उठाई जाने लगी. लेकिन तब भी मकड़ी ने सोचा कि ये मेरे रहने की सबसे अच्छी जगह है. इससे बेहतर जगह मुझे कहाँ मिल पाएंगी? वह अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं थी. इसलिए उसने अपना जाला नहीं छोड़ा.
लेकिन एक सुबह संग्रहालय के कर्मचारी उस कोने में रखी पेंटिंग को उठाकर ले जाने लगे. अब मकड़ी के पास अपना जाला छोड़कर जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था. जाला न छोड़ने की स्थिति में वह मारी जाती. बुझे मन से उसने इतनी मेहनत से बनाया अपना जाला छोड़ दिया.
संग्रहालय से बाहर निकलने के बाद वह कई दिनों तक इधर-उधर भटकती रही. कई परेशानियों से उसे दो-चार होना पड़ा. वह बड़ी दु:खी रहा करती थी कि उसका ख़ूबसूरत घर भगवान ने उससे छीन लिया और उसे इस मुसीबत में ढकेल दिया.
वह संग्रहालय के अपने पुराने घर के बारे में सोचकर और दु:खी हो जाती कि उससे अच्छा स्थान अब उसे कभी हासिल नहीं होगा. लेकिन उसे अपने रहने के लिए स्थान तो खोजना ही था. इसलिए वह लगातार प्रयास करती रही. आखिर में एक दिन वह एक सुंदर बगीचे में पहुँची.
बगीचे में एक शांत कोना था, जो मकड़ी को बहुत पसंद आया. उसने फिर से मेहनत प्रारंभ की और कुछ ही दिनों में पहले से भी सुंदर जाला तैयार कर लिया. यह उसका अब तक का सबसे ख़ूबसूरत घर था. अब वह ख़ुश थी कि जो हुआ अच्छा ही हुआ, अन्यथा वह इतने सुंदर स्थान पर इतने सुंदर घर में कभी नहीं रह पाती. वह ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ रहने लगी.
सीख – कभी-कभी जीवन में ऐसा कठिन समय आता है, जब हमारा बना-बनाया सब कुछ बिखर जाता है. ये हमारा व्यवसाय, नौकरी, घर, परिवार या रिश्ता कुछ भी हो सकता है. ऐसी परिस्थिति में हम अपनी किस्मत को कोसने लगते हैं या भगवान से शिकायतें करने लग जाते हैं. लेकिन वास्तव में कठिन परिस्थितियों हमारे हौसले की परीक्षा है. यदि हम अपना हौसला मजबूत रखते हैं और कठिनाइयों से जूझते हुए जीवन में आगे बढ़ते जाते हैं, तो परिस्थितियाँ बदलने में समय नहीं लगता. हमारा हौसला, हमारा जुझारूपन, हमारी मेहनत हमें बेहतरी की ओर ले जाती हैं. यकीन मानिये, हौसला है तो बार-बार बिखरने के बाद भी आसमान की बुलंदियों को छुआ जा सकता है।

जो बाइडेन की चुनौतियां

जो बाइडेन अब अमेरिका के 46 वें राष्ट्रपति बन चुके हैं और इसी के साथ अब अमेरिका में बाइडेन युग की शुरुआत हो गई है। अमेरिका के लोगों को बाइडेन से बहुत सी उम्मीदें हैं, जिनको पूरा करने की चुनौतियों का सामना अब अमेरिका के 46 वें राष्ट्रपति को करना है। पहली चुनौती को स्वीकार करते हुए जो बाइडेन को कोरोना वायरस से निपटने के लिए अब बहुत बड़े और कड़े कदम उठाने होंगे क्योंकि अमेरिका अभी तक कोरोना वायरस जैसी महामारी से निपटने में बहुत असफल रहा है। बाइडेन के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की और उसे पटरी पर लाने की है। अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाने के कारण अमेरिका का मध्यमवर्गीय समाज प्रभावित हुआ है और इस कारण समाज में बंटवारे और आय की असमानता को दूर करना बाइडेन के लिए तीसरी बड़ी चुनौती बन गया है। अमेरिका की चौथी बड़ी समस्या रंगभेद का मुद्दा है जिसने अमेरिकी समाज को दो वर्गों में बांट दिया है, जिससे वहां सामाजिक सौहार्द बिगड़ चुका है। इस समस्या को दूर करना और अमेरिका में सामाजिक सौहार्द स्थापित करना जो बाइडेन के लिए चौथी बड़ी चुनौती होगा। अभी हाल ही में अमेरिकी संसद में हुई हिंसा के कारण दुनिया के अन्य देशों में अमेरिका की छवि बहुत धूमिल हुई है और अमेरिका की छवि सुधारने की पांचवी चुनौती जो बाइडेन के लिए सबसे कठिन होगी। अब जो बाइडेन को पुनः पूरी दुनिया के सामने अमेरिकी लोकतंत्र का सही स्वरूप पेश करना होगा तभी पिछले दिनों हुई अमेरिका की बदनामी को कुछ हद तक मिटाया जा सकता है। 

      कोरोनाकाल में अमेरिका में बड़े पैमाने पर लोग बेरोजगार हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2020 में करीब 66 लाख लोगों ने बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन किया था‌। बेरोजगार हुए और नौकरी गंवा चुके लोगों को रोजगार देना बाइडेन के लिए एक बड़ी चुनौती होगा।
       अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में कोरोना संकटकाल में अमेरिका की जनता की नाराजगी देखने को मिली है। इसका फायदा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन को मिला और अब अमेरिकी नागरिकों के विश्वास पर खरा उतरना भी  जो बाइडेन के लिए एक बड़ी चुनौती है।
         पूरी दुनिया आतंकवाद की समस्या से जूझ रही है, फ्रांस और अॉस्ट्रिया जैसे देशों ने इसके खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन अमेरिका को कट्टरवाद से बचाना भी बाइडेन के लिए एक बड़ी चुनौती होगा। विदेश नीति को सुधारने की बड़ी चुनौती का सामना भी बाइडेन को करना है। उन्हें दुनिया के अहम देशों का भरोसा जीतना होगा। उन्हें अमेरिकी हितों को ध्यान में रखते हुए, दुनिया में शांति, समृद्धि और विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियां अपनानी होंगी।
        34 वर्षों से जो बाइडेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के लिए प्रयास जारी रखा और 78 वर्ष की आयु में अब वह अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के अपने सपने को पूरा कर पाए हैं। अमेरिका और चीन के रिश्तो में पिछले कुछ वर्षों में कड़वाहट आई है। जो बाइडेन अमेरिका की विदेश नीति को एक नई दिशा देते हुए एक ऐसी रणनीति बना सकते हैं जिसमें एशिया और यूरोप के सहयोगी देशों के साथ चीन को लेकर कॉमन अप्रोच बनाई जाए। बाइडेन चीन को लेकर शायद ट्रंप की तरह आक्रामक ना हों पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनका रवैया चीन को लेकर नर्म होगा। ऐसी परिस्थितियों में संभव है कि अमेरिका के लिए भारत ज्यादा महत्वपूर्ण हो और चीन की विस्तारवादी रणनीति के खिलाफ अमेरिका का झुकाव भारत की ओर बना रहे।
        अमेरिका के उपराष्ट्रपति और सीनेटर की भूमिका में जो बाइडेन का पाकिस्तान जैसे देशों से गहरा जुड़ाव रहा है। वर्ष 2008 में उन्हें पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'हिलाले पाकिस्तान' से नवाजा गया था। जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने तब डेमोक्रेटिक पार्टी के शासनकाल में उनका रुख पाकिस्तान और कश्मीर को लेकर नर्म था और वर्ष 1993 से 97 के दौरान जब बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति थे तब भी अमेरिका का रुख पाकिस्तान के प्रति काफी नर्म ही था।
        अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है और वह दुनिया भर के लोगों के दिलो-दिमाग में एक शक्तिशाली विचारधारा के रूप में छाया रहता है। कोई इसे उम्मीदों को सच करने वाला देश मानता है तो कोई विनाश का दूसरा नाम। कोई इसे एक मजबूत और पुराना लोकतंत्र मानता है तो कोई इसे सैनिक तानाशाह मानता है जो दूसरे देशों में घुसकर सैनिक कार्यवाही कर सकता है। कोई अमेरिका को बहुत महत्व देता है तो कोई उस पर अपने संसाधनों को लूटने का आरोप लगाता है। कुल मिलाकर पूरी दुनिया में अमेरिका की सुपर पावर की छवि आज भी मौजूद है। वहां के राष्ट्रपति को दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति माना जाता है ऐसे में पूरी दुनिया की नजरें जो बाइडेन पर टिकी हैं।

रंजना मिश्रा ©️®️
कानपुर, उत्तर प्रदेश

कोई कायर प्यार नहीं कर सकता है , यह तो बहादुर की निशानी है - बापू

कोई भी इंसान महान पैदा नहीं होता है, उसके विचार उसे महान बनाते हैं,विचार और काम की शुद्धता और सरलता ही महान लोगों को आम लोगों से अलग करती है, वे वही काम करते हैं, जो दूसरे करते हैं, लेकिन उनका मकसद समाज में बदलाव लाना होता है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जिन्हें प्यार से हम 'बापू' कहते हैं, महान सोच वाले एक साधारण व्यक्ति थे ,जों  देशवासियों के जीवन  में बदलाव लाना चाहते थे।आइंस्टीन ने  तो महात्मा गांधी के बारे में कहे थे कि हमारा आने वाली नस्लें शायद ही यकीन करे कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी इस धरती पर चलता-फिरता था। एक साधारण से शरीर में विराट आत्मा के लिए ही तो दुनिया हमारे राष्ट्रपिता को ‘महात्मा’ कहती है , आज बापू का 73 वां शहादत दिवस है।आज के दिन भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर आते हैं ,साथ ही सभी गणमान्य हस्तियां गांधीजी को श्रद्धांजलि देती हैं और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदानों को हम सभी याद किया करते  है। मेरे आत्मीय मित्रों देश का  दुर्भाग्य  ही था कि इस नेता का मार्गदर्शन हम स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अधिक समय तक नहीं पा सके और नाथूराम गोड़से नामक व्यक्ति की गोली से 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की जीवनलीला समाप्त हो गई। साथियों वर्तमान  के किसान आंदोलन हो या अन्य मुद्दों पर भी गांधी जी के विचार आज भी कहीं ना कहीं किसी ना किसी कोने से आवाज दे रही है ,हम महात्मा गांधी के सत्याग्रह को युद्ध के नैतिक विकल्प के रूप में देख सकते है। उन्होंने आम जन को यह सिखाया कि सत्याग्रह का प्रयोग समस्या तथा संघर्ष के समाधान हेतु किस प्रकार किया जाता है। गांधी का सत्याग्रह राजनीतिक मुद्दों के निवारण हेतु एक प्रभावी साधन साबित हुआ है। युद्ध और शांति, आतंकवाद, मानवाधिकार, सतत विकास, जलवायु परिवर्तन,  इसके साथ ही सामाजिक-राजनीतिक अशांति और राजनीतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार से संबंधित समकालीन चुनौतियों में से कई को गांधीवादी तरीके से हल किया जा सकता है। अतः 21वीं सदी के लोगों के पास अभी भी गांधीवाद से सीखने के लिये बहुत कुछ सीखना बाकी है।


महिला लेखन : स्त्री-अस्मिता का साहित्य

पिछले कुछ दशक में हिंदी साहित्य में स्त्री लेखन का व्यापक प्रस्फुटन एक अनूठी और ऐतिहासिक घटना है। यहां स्त्री लेखन एक सामाजिक सच्चाई और अस्मिता के संघर्ष की चुनौती के रूप में सामने आता है। यह स्त्री के अपने नजरिए से स्त्री लेखन का नया पाठ है। इस साहित्य में स्त्री विमर्श अस्मिता का वह आंदोलन है, जो हाशिए पर छोड़ दिए गए नारी अस्तित्व को फिर से केंद्र में लाने और उसकी मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करने का अभियान है। यह साहित्य स्त्री को सामाजिक संरचना में दूसरे दर्जे पर रखने का मुखर विरोध और स्त्री को एक जीवंत मानवीय ईकाई के रूप में स्वीकार करने का प्रयास है।


दुनिया के सभी समुदायों, सभ्यता, धर्म, वर्ग और जाति में पितृसत्ता किसी न किसी रूप में मौजूद रही है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था और मूल्यों ,मर्यादाओं, आदर्शों और संस्कारों के विभिन्न रूपों के जरिए बड़े बारीक ढंग से इसे समाज की संरचना में बुना गया है। इसके माध्यम से पुरुष को स्त्री की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का जो षड्यंत्र रचा गया उसमें स्त्री शोषण को सहज और स्वाभाविक मान्यता के रूप में समाज के मन-मस्तिष्क में बैठाने की निरंतर कोशिश की गई। समय-समय पर विभिन्न शक्तियों से गठजोड़ करके इसने अपना रूप भी बदला, पर इसकी मौजूदगी सामंतवादी व्यवस्था से लेकर पूंजीवादी और अब बाजारवादी व्यवस्था की आतंरिक संरचना में भी अनेक स्तरों पर बनी हुई है। इसका उद्देश्य स्त्री के वास्तविक अस्तित्व और स्वप्नों का सदा के लिए दमन करना और पौरुषपूर्ण वर्चस्ववादी समाज में स्त्री के लिए समानता और न्याय की संभावनाओं को समाप्त करना रहा है।

इन सभी रूढ़िवादी व्यवस्थाओं और सदियों से चल रहे सुनियोजित शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध विश्व भर के वैचारिक चिंतन में नारीवादी विमर्श ने एक नया आयाम और परिप्रेक्ष्य निर्मित किया। 1975 अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित हुआ। भारत के संदर्भ में भी इसे ऐतिहासिक काल कहा जा सकता है। स्त्री शिक्षा का सभी क्षेत्रों में विकास हुआ, अधिकारों की मांग बढ़ी और आत्माभिव्यक्ति के लिए क्षुब्ध और छटपटाते हृदय ने साहित्य को माध्यम बनाया। राजनीति और समाज के सभी क्षेत्रों में जब महिला सशक्तीकरण का दौर शुरू हुआ तो साहित्य की दुनिया में भी यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। महिला-लेखन के केंद्र में स्त्री अस्मिता का संघर्ष, अदम्य जिजीविषा, स्त्री स्वतंत्र, देह और यौन उत्पीड़न के प्रति विद्रोह और स्वयं की पहचान के प्रति जागरूकता के साथ सामाजिक पहलुओं से जुड़े यथार्थ को भी देखा गया। मानवीय संवेदना की गहरी पड़ताल करते हुए सभी वर्ग, वर्ण और जाति की स्त्रियों की अंतरात्मा का अवलोकन करके ये स्त्री रचनाएं पाठकों को स्तब्ध और उद्वेलित कर देती हैं। यह स्त्री-लेखन नारी-शोषण के विरुद्ध परिवर्तन और क्रांति के साथ समकालीन साहित्य में सशक्त हस्तक्षेप भी करता है।

वर्तमान स्त्री लेखन में स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत और सक्रिय स्त्री रचनाकार स्त्री-हितों की चर्चा स्वयं करने लगी है और अपनी अस्मिता को पहचान रही है। स्त्री साहित्य अपनी मूल चेतना में उसे पराधीन बनाने वाली इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित विवाह संस्था, धर्म, जाति, वर्ग आदि की स्त्री-विरोधी भूमिका को प्रकाश में लाता है। स्त्री को शक्तिहीन करने की यह प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म, जटिल और संश्लिष्ट है, जिसमें स्त्री को कभी किसी संवाद या विवाद का अवसर नहीं दिया गया। स्त्री लेखन इन्हीं प्रश्नों से सीधी मुठभेड़ करके समाज की संकीर्ण मानसिकता से टकराने का जोखिम उठाता है। वह पुरुष को बेहतर सत्ता का मनुष्य मानने वाले समाज से प्रश्न करता है कि स्त्री आधी आबादी है, तो फिर उसे मानवीय गरिमा से वंचित क्यों रखा गया है। आज हिंदी में स्त्री लेखन का साहित्य समृद्ध और पहले की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है। स्त्री रचनाकार एक बड़े बदलाव के साथ आत्मविश्वास से अपने सुख-दुख, आक्रोश और असहमति को व्यक्त कर रही है। वह समान नागरिक के रूप में पुरुष से किसी अतिरिक्त दया या सहानुभूति की अपेक्षा नहीं रखती। मात्र देह मुक्ति को विमर्श न मान कर वह बौद्धिक रूप से अधिक सक्षम, सामाजिक रूप से ज्यादा सचेत और परिपक्व है। स्त्री साहित्य में आज की स्त्री के जीवन की वास्तविकताएं, संभावनाएं और दासता की दारुण स्थितियों से मुक्ति की दिशाओं का उद्घाटन हुआ है। स्त्री की अपनी पहचान को स्थापित करते हुए इन रचनाकारों ने यह सिद्ध किया कि समाज मे हर तरह के शोषण और अत्याचार का उपभोक्ता प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अधिकतर स्त्री ही होती है, चाहे वह धार्मिक कुरीतियां हों, यौन हिंसा या आर्थिक पराधीनता, युद्ध हो या जातिगत दंगे- विवाद, इन सभी का सबसे बुरा प्रभाव स्त्री पर ही पड़ा है। 

स्त्रीवाद की वैचारिकी साहित्य में अत्यंत विश्वसनीय रूप से एक सतत संघर्ष यात्रा और आंदोलन के रूप में निरतंर समृद्ध हो रही है। स्त्री-लेखन सामाजिकता और दैहिकता के प्रश्नों को समांतर लेकर चलते हुए पितृसत्ता पर ठीक उन्ही तर्कों से प्रहार कर रहा है, जो उसके लिए भी अपनी पहचान के सवाल हैं। हिंदी का स्त्रीवादी साहित्य स्त्री को व्यवस्था की गुलामी से मुक्त करके उसे एक आत्मनिर्णायक स्वतंत्र व्यक्ति की अस्मिता के रूप मे स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण और सार्थक प्रयास है।


प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार