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Friday, May 31, 2019

महिलाओं को शिक्षित करें और उन्‍हें प्रबुद्ध एवं सशक्‍त बनाएं : उपराष्‍ट्रपति

उपराष्‍ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडू ने शिक्षा पर विशेष जोर देने के साथ-साथ संसद और राज्‍यों की विधानसभाओं में आरक्षण जैसे प्रगतिशील उपायों पर अमल करके महिलाओं को सशक्‍त बनाने का आह्वान किया है।


श्री नायडू ने महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव किये जाने की घटनाओं पर गंभीर चिंता व्‍यक्‍त करते हुए समाज में लोगों के व्‍यवहार एवं नजरिये में बदलाव लाकर इस पर अंकुश लगाने की आवश्‍यकता को रेखांकित किया है।


श्री नायडू ने आज नई दिल्‍ली में अपने आवास पर चाणक्‍यपुरी स्थित कार्मेल कॉन्‍वेंट स्‍कूल की छात्राओं से संवाद करते हुए कहा कि किसी लड़की को शिक्षि‍त करना एक पूरे परिवार को शिक्षित करने के समान है, जबकि एक आदमी को शिक्षित करना सिर्फ एक व्‍यक्ति को शिक्षित करने के समान है।


उपराष्‍ट्रपति ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि शिक्षा की अहमियत न केवल रोजगार, बल्कि सशक्तिकरण और ज्ञानोदय से भी जुड़ी हुई है। उन्‍होंने कहा कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना का लक्ष्‍य बालिकाओं का सशक्तिकरण करना है।


श्री नायडू ने कहा कि शिक्षा निश्चित रूप से ऐसी होनी चाहिए जो नागरिकों को आदर्श एवं जिम्‍मेदार बनाए और इसके साथ ही देश के नागरिकों का दृष्टिकोण राष्‍ट्रीय स्‍तर का होना चाहिए। यही नहीं, देश के नागरिकों को सामाजिक रूप से कर्तव्‍यनिष्‍ठ भी होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि यह अत्‍यंत आवश्‍यक है कि देश के युवा भारत की सांस्‍कृतिक विरासत, परम्‍पराओं एवं इतिहास और राष्‍ट्रीय महानुभावों एवं स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका तथा समाज सुधारकों के अमूल्‍य योगदान से भलीभांति अवगत हों।


उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि सिर्फ भारत माता के चित्र पर माल्‍यार्पण करना ही राष्‍ट्रवाद नहीं है, बल्कि देश के हितों को सबसे ऊपर रखना और साथी नागरिकों के हितों का ख्‍याल रखना ही राष्‍ट्रवाद है।


श्री नायडू ने सार्वजनिक जीवन में सत्‍यनिष्‍ठा की अहमियत को रेखांकित किया और इसके साथ ही कहा कि लोगों को 4 'सी' यथा कैरेक्‍टर (चरित्र), कंडक्‍ट (आचरण), कैपेसिटी (क्षमता) और कैलिबर (काबिलियत) के आधार पर ही अपने-अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करना चाहिए। इसके साथ ही उन्‍होंने लोगों को 4 अन्‍य 'सी' यथा कैश (नकदी), कास्‍ट (जाति), कम्‍युनिटी (समुदाय) और क्रिमनलिटी (आपराधिकता) को महत्‍व देने के प्रयासों के खिलाफ आगाह किया।


उपराष्‍ट्रपति ने कहा कि भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था विकास के मोर्चे पर अच्‍छा प्रदर्शन कर रही है और विश्‍व भर में भारत को सम्‍मान दिया जा रहा है तथा पूरी दुनिया में भारत की विशिष्‍ट पहचान है। उन्‍होंने कहा कि कई विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करने की इच्‍छुक हैं।


प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के विशेष मंत्र 'सुधार, प्रदर्शन एवं रूपांतरण' का उल्‍लेख करते हुए उपरा‍ष्‍ट्रपति ने युवा विद्यार्थियों को एक 'नये भारत' का निर्माण करने के लिए परिवर्तन का हिस्‍सा बनने की सलाह दी।



तम्बाकू मुक्त परिसर" घोषित करने हेतु एक संवादात्मक वार्ता का आयोजन 

आज दिनांक 31 मई, 2019 को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस (वर्ल्ड एंटी टोबैको डे) के अवसर
पर मर्चेंट्स चैम्बर ऑफ उत्तर प्रदेश ने अपने परिसर को "तम्बाकू मुक्त परिसर" घोषित करने
हेतु एक संवादात्मक वार्ता का आयोजन किया।  



आज की यह वार्ता श्री बी.एम. गर्ग, अध्यक्ष, मर्चेंट्स चैम्बर ऑफ उत्तर प्रदेश, की अध्यक्षता में
समपन्न हुई जिसमें मुख्य रूप से डॉ.  आई.एम. रोहतगी, श्री प्रेम मनोहर गुप्ता,  , सुनील
खन्ना, संतोष गुप्ता, आत्मा राम खत्री, मुकुल टंडन, अतुल कनोडिया, डॉ. उमेश पालीवाल, विजय
पांडे, सुशील शर्मा, महेंद्र नाथ मोदी उपस्थित थे।
उक्त वार्ता में यह बताया गया कि पान, मसाला, व् तम्बाकू सेवन न केवल  बीमारियों के
लिए आमंत्रण है वरन यह वह जानलेवा पदार्थ है जो उस व्यक्ति के साथ-साथ पुरे परिवार
को तोड़ के रख देता है। तम्बाकू सेवन से होने वाली बीमारियों में हार्ट अटैक,
ब्रेन-स्ट्रोक, मुँह का कैंसर, फेफड़ों का गलना व् बांझपन भी एक भयानक बीमारी है। अपना
शहर कानपुर को अगर हम तम्बाकू सिटी के नाम से कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योकि
लगभग अधिकांश नागरिक के मुँह में हम पान-मसाला व् तम्बाकू चबाते हुए देखते है। शहर
की अधिकांश आबादी पान-मसाले व् तम्बाकू चबाने की आदि हो चुकी है।  
पान-मसाला व् तम्बाकू के स्वान से बचने के लिए बहुत से उपाय किया जा सकते है लेकिन
खुद से दृण-निश्चयी होने अतिआवश्यक है। सरकार द्वारा भी पान-मसाला को रोकने के लिए
पहल की जानी चाहिए क्योकि यदि कोई कदम जन-हित में उठाया जाता है तो पूरे देश का है
भविष्य बेहतर व् सुरक्षित हो सकता है।  
मर्चेंट्स चैम्बर की 'तम्बाकू मुक्त परिसर' की वार्ता में सर्वसम्मति से
एक प्रस्ताव पास कर प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री  को भेजा जाना प्रस्तावित किया गया कि " हम
शराब बॉर की तरह पान-मसाला-तम्बाखू के खाने को भी पान-मसाला बॉर बना दें, मसाला
उसी बॉर में खाये व् थूंके। बाहर व् घर के बाहर मसाला  खाते या खाये जाने व् पकड़े जाने पर
जुर्माना हो व् तीसरी बार पकड़े जाने पर जेल का प्रावधान  हो साथ ही नो स्मोकिंग जोन की
तर्ज़ पर नो टोबैको जोन बनाने पर भी विचार किया जाए"।   
साथ ही मर्चेंट्स चैम्बर के समस्त सदस्यों को इस बात  के लिए जागरूक किया जाएगा कि वे
अपने-अपने व्यवसायिक परिसरों  को "तम्बाकू मुक्त परिसर" घोषित करने की दिशा में कदम
उठाये।  इस कार्य हेतु उन्हें स्टीकर भेजने का प्रस्ताव भी पास किया गया।
आज की इस अतिमहत्वपूर्ण वार्ता में मर्चेंट्स चैम्बर प्रांगण में समस्त उपस्थित सदस्यगण
यह प्रतिज्ञा करते है कि मर्चेंट्स चैम्बर को आज से 'तम्बाकू मुक्त परिसर' बनाने में पूर्ण
दृणप्रतिज्ञ होंगे।


Thursday, May 30, 2019

आर्सेनिक की चपेट में उत्तर प्रदेश की ग्रामीणआबादी- उमाशंकर मिश्र


 नई दिल्ली, 30 मई (इंडिया साइंस वायर): आर्सेनिक सेप्रदूषित जल का उपयोगस्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। भारतीय शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन में पता चला है किउत्तर प्रदेश की करीब 2.34 करोड़ ग्रामीण आबादी भूमिगत जल में मौजूद आर्सेनिक के उच्च स्तर से प्रभावित है। विभिन्न जिलों से प्राप्तभूमिगत जल के 1680 नमूनों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं।


इस अध्ययन में उत्तर प्रदेश के 40 जिलों के भूजल में आर्सेनिक का उच्च स्तर पाया गया है। राज्य के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में स्थित जिलों में आर्सेनिक का उच्च स्तर पाया गया है। इनमें से अधिकांश जिले गंगा, राप्ती और घाघरा नदियों के मैदानी भागों में स्थित हैं। बलिया, गोरखपुर, गाजीपुर, बाराबंकी, गोंडा, फैजाबादऔर लखीमपुर खीरी आर्सेनिक से सबसे अधिक प्रभावित जिले हैं।


शाहजहांपुर, उन्नाव, चंदौली, वाराणसी, प्रतापगढ़, कुशीनगर, मऊ, बलरामपुर, देवरिया और सिद्धार्थनगर के भूजल में आर्सेनिक का मध्यम स्तर पाया गया है। उत्तर प्रदेश की करीब 78 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जो सिंचाई, पीने, भोजन पकाने और अन्य घरेलू कामों के लिए भूजल पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्सेनिक से प्रभावित होने का खतरा अधिक है क्योंकि शहरों की तुलना में वहां पाइप के जरिये जल आपूर्ति का विकल्प उपलब्ध नहीं है।


शोधकर्ताओं में शामिल नई दिल्ली स्थित टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज से जुड़े डॉ चंदर कुमार सिंह ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “बलिया, गोरखपुर, गाजीपुर, फैजाबाद और देवरिया जैसे जिलों में आर्सेनिक के अधिक स्तर के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट गंभीर हो सकता है। आर्सेनिक के दुष्प्रभाव से लोगों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर हैंडपंप या कुओं के पानी का परीक्षण करने की जरूरत है।”


डॉ चंदर कुमार सिंह और सोनल बिंदल


अध्ययनकर्ताओं ने भूमिगत जल के नमूनों का परीक्षण एक खास किट की मदद से किया है और इस किट से प्राप्त आंकड़ों की वैधता की पुष्टि प्रयोगशाला में की गई है। आर्सेनिक के स्तर को प्रभावित करने वाले 20 प्रमुख मापदंडों को केंद्र में रखकर यह अध्ययन किया गया है। इन मापदंडों में भौगोलिक स्थिति, जलकूपों की गहराई, मिट्टी की रासायनिक एवं जैविक संरचना, वाष्पन, भूमि की ढलान, नदी से दूरी, बहाव क्षेत्र और स्थलाकृति शामिल है। इन आंकड़ों के आधार पर कंप्यूटर मॉडलिंग सॉफ्टवेयर की मदद से आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों का मानचित्र तैयार किया गया है।


पीने के पानी के लिए हैंडपंप या ट्यूबवेल पर निर्भर इलाकों में भूजल में आर्सेनिक प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए एक प्रमुख खतरा है। आर्सेनिक के संपर्क में आने से त्वचा पर घाव, त्वचा का कैंसर, मूत्राशय, फेफड़े एवं हृदय संबंधी रोग, गर्भपात,  शिशु मृत्यु और बच्चों के बौद्धिक विकास जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।


डॉ. सिंह का कहना है कि पूर्वानुमानों पर आधारित इस तरह के अध्ययनों की मदद से आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित करने में नीति निर्माताओं को मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं में डॉ चंदर कुमार सिंह के अलावा उनकी शोध छात्र सोनल बिंदल शामिल थीं। यह अध्ययन शोध पत्रिका वाटर रिसर्च में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)


एनएसआईसी ने सूक्ष्‍म, लघु तथा मध्‍यम उद्यम मंत्रालय के साथ सहयोग ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर किया

राष्‍ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड (एनएसआईसी) ने वर्ष 2019-20 के लिए सूक्ष्‍म, लघु तथा मध्‍यम उद्यम मंत्रालय के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर किया है। समझौता ज्ञापन पर एएस तथा डीसी (एमएसएमई) तथा एनएसआईसी के सीएमडी राम मोहन मिश्रा तथा एमएसएमई मंत्रालय के सचिव डॉ. अरुण कुमार पांडा ने हस्‍ताक्षर किए। इस अवसर पर सूक्ष्‍म, लघु तथा मध्‍यम मंत्रालय की संयुक्‍त सचिव अलका नांगिया अरोड़ा निदेशक (एमएमई) मर्सी ईपाव, निदेशक पी तथा एम (एनएसआईसी) पी उदय कुमार और निदेशक वित्त (एनएसआईसी) ए के मित्तल उपस्थित थे।


समझौता ज्ञापन में देश में सूक्ष्‍म, लघु तथा मध्‍यम उद्यमों के लिए एनएसआईसी द्वारा अपनी विपणन, वित्तीय, टेक्‍नोलॉजी तथा अन्‍य समर्थनकारी सेवा योजनाओं को बढ़ाने का प्रावधान है। निगम को 2019-20 में संचालन से राजस्‍व प्राप्ति 22 प्रतिशत बढ़ने की आशा है। यह राजस्‍व 2018-19 में 2540 करोड़ रुपये से 22 प्रतिशत बढ़कर 2019-20 में 3100 करोड़ रुपये हो जाएगा। वर्ष 2019-20 में एनएसआईसी  के मुनाफे में 32 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना है। निगम प्रशिक्षुओं की संख्‍या में 45 प्रतिशत की वृद्धि लक्ष्‍य तय करके उद्यमिता तथा कौशल विकास प्रशिक्षण के क्षेत्र में कार्य कुशलता बढ़ाने की योजना बना रहा है।


सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्योग मंत्रालय की ओर से एनएसआईसी द्वारा लागू की जा रही राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति – जनजाति हब योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति/जनजाति उद्यमियों को सहायता प्रदान करने के प्रयास विभिन्‍न उपायों तथा कार्यक्रम के माध्‍यम से जारी रहेंगे।


सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय के सचिव डॉ. ए के पांडा ने एनएसआईसी के कार्यों की सराहना करते हुए एनएसआईसी की पहुंच को व्‍यापक बनाने के प्रयास का सुझाव दिया ताकि यह देश में बड़ी संख्‍या में सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्योगों की सेवा कर सके।



भारत कथाकारों की भूमि; भारतीय फिल्‍म निर्माताओं को निजी कथाएं तेजी से बताने पर ध्‍यान देना चाहिए : जॉन बैली



      सिनेमा में सहयोग की संभावनाओं का पता लगाने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने आज एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज के अध्यक्ष जॉन बैली के साथ नई दिल्‍ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में बातचीत के विषय सत्र का आयोजन किया। सत्र के बाद श्री बैली ने प्रेस के साथ बातचीत की।


  सत्र में श्री जॉन बैली ने एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज में भारतीयों की सदस्‍यता बढ़ाने की आवश्‍यकता के बारे में चर्चा की। उन्‍होंने एकेडमी में विविध सदस्‍यों की संख्‍या दोगुनी करने की एकेडमी की पहल को उजागर किया और कहा कि भारत अवसरों, चुनौतियों और विविधता को एकजुट करने का प्रतिनिधित्‍व करता है। इस बातचीत के जरिए अनेक जन संचार मीडिया संस्‍थानों से आए उभरते फिल्‍म निर्माताओं और छात्रों को न केवल एकेडमी के अध्‍यक्ष श्री जॉन बैली बल्कि मास्‍टर सिनेमेटोग्राफर जॉन बैली से भी बातचीत का अवसर मिला। बातचीत के दौरान न केवल फिल्‍म तकनीक की अग्रणी अवस्‍था में कला की बारीकियों पर प्रकाश डाला गया, बल्कि विश्‍व स्‍तर की विषय वस्‍तु तैयार करने के बारे में भी समझ विकसित करने में सहयोग किया गया। श्री बैली ने उन पर महिला सिनेमेटोग्राफरों के प्रभाव के बारे में भी बातचीत की। भारत की कथाकारों की भूमि के रूप में सराहना करते हुए उन्‍होंने इस बात पर जोर दिया कि फिल्‍म निर्माता निजी कथाओं को तेजी से बताएं। उन्‍होंने एकेडमी के साथ गहरे सहयोग की दिशा में भारत द्वारा दिखाए गए उत्‍साह और उत्‍सुकता की भी सराहना की।


 सूचना और प्रसारण सचिव श्री अमित खरे ने भारत में बड़ी संख्‍या में प्रतिभाओं के होने और क्षेत्रीय भाषा में बनाई जा रही फिल्‍मों में तेजी का जिक्र किया। उन्‍होंने विभिन्‍न राज्‍यों के उभरते हुए फिल्‍म निर्माताओं के सामने रखे जा रहे प्रोत्‍साहनों की जानकारी दी और आशा व्‍यक्‍त की कि श्री बैली और एकेडमी के साथ जुड़ाव से दुनिया भर में भारतीय फिल्‍म निर्माताओं की कला के प्रदर्शन में मदद मिलेगी।


 



 


  फिल्‍म प्रमाण पत्र और अपीलीय न्‍याधिकरण के अध्‍यक्ष न्‍यायमूर्ति मनमोहन सरीन ने सिनेमेटोग्राफर के रूप में श्री जॉन बैली की उपलब्धियों को सर्वोत्‍कृष्‍ट बताया।


   सीबीएफसी के अध्‍यक्ष श्री प्रसून जोशी ने बताया कि किस प्रकार सिनेमा भारत में रोजमर्रा के जीवन का हिस्‍सा बन चुका है, यहां तक कि जीवन का दर्शन भी सिनेमा से ही उत्‍पन्‍न होता है। उन्‍होंने वर्तमान रुझान 'सिनेमा लोकतंत्र' की तरफ – भारत में प्रौद्योगिकी के जरिए सिनेमा का लोकतंत्रीकरण और उसकी बढ़ती पहुंच की जानकारी दी। उन्‍होंने भारतीय सिनेमा में भावनाओं और संगीत के महत्‍व की भी चर्चा की, जो पश्चिमी देशों के सिनेमा से हटकर है। उन्‍होंने सामूहिक रूप से सिनेमा को देखने के महत्‍व की चर्चा की और भारत के अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह जैसे उत्‍सवों का भी महत्‍व बताया।



विटामिन-डी की कमी से हो सकता है हार्ट फेल

 दिनेश सी शर्मा
नई दिल्ली, 28 मई (इंडिया साइंस वायर): शरीर में विटामिन-डी का उत्पादन करने के
लिए हर रोज धूप की खुराक हड्डियों की मजबूती के साथ-साथ हृदय को सेहतमंद रखने में
भी मददगार हो सकती है।



एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि हृदय को स्वस्थ रखने में भी विटामिन-डी महत्वपूर्ण
हो सकता है। यह तो दशकों से सभी जानते हैं कि शरीर में विटामिन-डी की कमी से हड्डियों
पर बुरा प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ सालों में वैज्ञानिकों ने विटामिन-डी की कमी की
पहचान हृदय के स्वास्थ्य को निर्धारित करने वाले कारक के रूप में की है। अब भारतीय
शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि विटामिन-डी की कमी से होने वाले इंसुलिन प्रतिरोध के
कारण भी हार्ट फेल हो सकता है।
इंसुलिन बेहद उपयोगी हार्मोन है जो रक्त में उपस्थित शर्करा को ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं।
इंसुलिन शरीर में कई ऊतकों में कोशिकीय चयापचय के नियमन में भी भूमिका निभाता है।
हृदय कोशिकाओं में इंसुलिन प्रतिरोध के कारण हृदय में ग्लूकोज और वसा अम्ल जैसे ऊर्जा
उत्पादकों का उपयोग बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है।
हृदय को नुकसान पहुंचाने वाले अधिक वसा और उच्च कैलोरी वाले भोजन जैसे कारकों की
तरह विटामिन-डी की कमी का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों पर एक प्रयोग
किया है। उन्होंने चूहों के तीन समूह बनाए और इन समूहों को अलग-अलग तीन प्रकार के
आहार दिए। इनमें एक समूह को पर्याप्त विटामिन-डी, दूसरे को विटामिन-डी की कमी और
तीसरे को उच्च वसा और उच्च फ्रूक्टोज वाला भोजन दिया गया।
बीस सप्ताह बाद पाया गया कि जिन चूहों को विटामिन-डी की कमी वाला आहार दिया
गया था, उनके हार्ट फेल हो रहे थे। इन चूहों के हृदय में कुछ उसी तरह के आणविक और
कार्यात्मक बदलाव देखे गए जो अधिक वसा और उच्च फ्रूक्टोज युक्त आहार का सेवन करने
वाले चूहों में पाए गए थे।
शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल विटामिन-डी की कमी के कारण होने वाला हृदय संबंधी
विकार और उच्च कैलोरी आहार जैसे अन्य जोखिम कारकों के कारण होने वाले विकार
बिल्कुल समान थे। कुछ मापदंडों में तो विटामिन-डी की कमी का प्रभाव अधिक पाया गया।
हृदय की मांसपेशियों के विस्तार के लिए उत्तरदायी जीन्स की अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक
देखी गई है। हृदय की दीवार की मोटाई, हृदय-कक्षों के आंतरिक व्यास और हृदय की
संकुचन क्षमता द्वारा इन निष्कर्षों की पुष्टि हुई है।
फरीदाबाद स्थित ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (टीएचएसटीआई)
के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. संजय कुमार बनर्जी ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “हमने
विटामिन-डी की कमी और हृदय संबंधी विकारों के बीच की कड़ी का पता लगाया है और
जानने का प्रयास किया है कि यह कैसे हार्ट फेल होने का कारण बन सकती है। विटामिन-डी


और इसकी संकेतक प्रक्रिया दिल के पेशीय ऊतकों से संबंधित इंसुलिन संवेदनशीलता को
प्रभावित करती है। इंसुलिन की कमी होने से ग्लूकोज के ऊर्जा में परिवर्तित होने का क्रम टूट
जाता है और हार्ट फेल होने की स्थिति बनने लगती है।”


डॉ. संजय के. बनर्जी और हिना लतीफ निजामी


यह शोध शरीर में विटामिन-डी ग्राहियों की सक्रियता को ध्यान में रखते हुए हार्ट फेल होने
को नियंत्रित करने के लिए नई दवाएं तैयार करने में सहायक हो सकता है।
नई दिल्ली स्थित नेशनल डायबिटीज ओबेसिटी ऐंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन से जुड़े डॉ. अनूप
मिश्रा, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं हैं, के अनुसार- “हमारे पास इस बात के प्रमाण हैं कि
भारतीयों में विटामिन-डी की कमी का निश्चित रूप से इंसुलिन प्रतिरोध और मधुमेह में
महत्वपूर्ण योगदान है। हमारे पिछले शोध और भारतीयों पर किए जा रहे अन्य शोध दर्शाते
हैं कि विटामिन-डी के पूरक इंसुलिन प्रतिरोध को सुधारने और रक्त शर्करा के स्तर को कम
करने में मदद कर सकते हैं।"
यह शोध मॉलिक्यूलर न्यूट्रिशन ऐंड फूड रिसर्च नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
शोधकर्ताओं में हिना लतीफ निजामी, परमेश्वर कटारे, यशवंत कुमार और संजय कुमार
बनर्जी (टीएचएसटीआई, फरीदाबार); पंकज प्रभाकर, सुबीर कुमार मौलिक, सुधीर कुमार
आरव (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली) और प्रलय चक्रवर्ती (वीएमएमसी
एवं सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली) शामिल थे। (इंडिया साइंस वायर)
भाषांतरण- शुभ्रता मिश्रा


पिछले एक दशक में कम हुए हैं गंभीर एनीमिया के मामले डॉ अदिति जैन

 नई दिल्ली, 29 मई (इंडिया साइंस वायर): पुरुषों में हीमोग्लोबिन का स्तर 13.5 और महिलाओं के मामले में
12 से कम होने पर शरीर में रक्त कमी की स्थिति मानी जाती है। जबकि हीमोग्लोबिन का स्तर 07 से कम हो
तो गंभीर एनीमिया का मामला बनता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता से जुड़ा यह मामला भारत के लिए
चुनौतीपूर्ण है क्योंकि गंभीर रूप से एनीमिया के शिकार दुनिया के एक-चौथाई और दक्षिण एशिया के 75
प्रतिशत लोग यहीं पर रहते हैं।
एनीमिया उन्मूलन एक चुनौती है, पर हेल्थ मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम ऑफ इंडिया के आंकड़ों पर आधारित
एक नए अध्ययन से पता चला है कि पिछले करीब एक दशक में भारत में एनीमिया के गंभीर मामलों में 7.8
प्रतिशत की गिरावट हुई है। वर्ष 2008-09 में गंभीर एनीमिया के 11.3 प्रतिशत मामलों की तुलना में वर्ष
2017-18 में इसके 3.29 प्रतिशत मामले सामने आए हैं।


2010-11 और 2017-18 के दौरान विभिन्र राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एनीमिया की स्थिति


विभिन्न राज्यों में भी गंभीर एनीमिया के मामलों में विविधता देखने को मिलती है। केरल, नागालैंड, हिमाचल
प्रदेश और गोवा में गंभीर एनीमिया के सिर्फ दो प्रतिशत मामले देखे गए हैं। बिहार में पिछले दस वर्षों के
अंतराल में गंभीर एनीमिया के मामले 10.6 प्रतिशत से कम होकर 3.1 प्रतिशत पर पहुंच गए। इसी तरह,
हरियाणा में भी यह आंकड़ा 12.3 प्रतिशत से गिरकर 4.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया।


डॉ. कौस्तुभ बोरा


इस अध्ययन में पता चला है कि गंभीर एनीमिया का स्तर आर्थिक रूप से बेहतर राज्यों, जैसे- तेलांगना (8-
10%) और आंध्र प्रदेश में (6-8%) अधिक पाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि एनीमिया के लिए
जिम्मेदार कारकों में गरीबी भी शामिल है, पर इस पोषण संबंधी बीमारी की व्यापकता के लिए जलवायु और
आनुवांशिक कारक भी जिम्मेदार हो सकते हैं। तेलंगाना के शहरी बुजुर्गों में विटामिन-बी12 की कमी भी
एनीमिया का कारण बन रही है। इसी तरह, हुकवर्म और व्हिपवर्म का संक्रमण आंध्र प्रदेश में गंभीर एनीमिया के
रोगियों की बढ़ती संख्या के लिए जिम्मेदार है।
इस अध्ययन से जुड़े भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के डिब्रूगढ़ स्थित क्षेत्रीय केंद्र के वैज्ञानिक डॉ.
कौस्तुभ बोरा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि "यह अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश में गंभीर
एनीमिया की स्थिति का व्यापक वर्णन करता है, जिसमें हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। यह
बताता है कि एनीमिया से निपटने के लिए पिछले 10 वर्षों में किस तत्परता से काम किया गया है।"
लाल रक्त कोशिकाओं की विकृति के लिए जिम्मेदार सिकल-सेल एनिमिया और बीटा-थैलेसीमिया सिंड्रोम का
प्रकोप देश के अन्य हिस्सों की तुलना में उत्तर-पूर्व भारत में कम है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मलेरिया के
प्रसार को बढ़ावा देने वाली जलवायु वाले राज्य हीमोग्लोबिन की कमी के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं और
वहां एनीमिया से ग्रस्त लोगों की संख्या अधिक हो सकती है। यह अध्ययन शोध पत्रिका ट्रॉपिकल मेडिसिन ऐंड
इंटरनेशनल हेल्थ में प्रकाशित किया गया है।


जहाँ पानी ज्यादा खारा नहीं है वहां आरओ बैन करे सरकार


नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने केंद्र सरकार से कहा है कि जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां रिवर्स ओस्मोसिस (आरओ) उपकरणों के इस्तेमाल पर बैन लगाया जाए। एनजीटी ने सरकार को इस बारे में नीति बनाने का भी निर्देश दिया। आदेश में कहा गया है कि जिन जगहों पर पानी में टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स (टीडीएस) की मात्रा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है, वहां घरों में सप्लाई होने वाले नल का पानी सीधे पिया जा सकता है।
एनजीटी ने यह भी कहा कि 60 फीसदी से ज्यादा पानी देने वाले आरओ के इस्तेमाल की ही मंजूरी दी जाए। सरकार की प्रस्तावित नीति में आरओ से 75 फीसदी पानी मिलने और रिजेक्ट होकर निकलने वाले पानी का इस्तेमाल बर्तनों की धुलाई, फ्लशिंग, बागवानी, गाड़ियों और फर्श की धुलाई आदि में करने का प्रावधान होना चाहिए। एनजीटी ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि लोगों को मिनरल वाले पानी से सेहत को संभावित नुकसानों के बारे में भी बताया जाए।
एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने उसके द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद आदेश पारित किया और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को निर्देश दिए। कमिटी ने कहा कि अगर टीडीसी 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है तो आरओ प्रणाली उपयोगी नहीं होगी बल्कि उससे महत्वपूर्ण खनिज निकल जाएंगे और साथ ही पानी की अनुचित बर्बादी होगी।
एनजीटी ने कहा, 'पर्यावरण एवं वन मंत्रालय उन स्थानों पर आरओ के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने वाली उचित अधिसूचना जारी कर सकता है जहां पानी में टीडीएस 500 एमजी प्रति लीटर से कम है और जहां भी आरओ की अनुमति है वहां यह सुनिश्चित किया जाए कि 60 प्रतिशत से अधिक पानी को पुन: इस्तेमाल में लाया जाए।'


Monday, May 27, 2019

पक्षियों के लिए खतरा बन रही हैं पवन-चक्कियां सुशीला श्रीनिवास


बेंगलुरु, 27 मई (इंडिया साइंस वायर): पवन अक्षय ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत मानी जाती है। लेकिन, पवन-
चक्की की टरबाइनें आसपास के क्षेत्रों में पक्षियों के जीवन के लिए खतरा बनकर उभर रही हैं। एक नए अध्ययन
में पता चला है कि पवन-चक्कियों के ब्लेड से टकराने के कारण पक्षियों की मौत हो रही है।
गुजरात के कच्छ में स्थित सामाख्याली और कर्नाटक के हरपनहल्ली और दावणगेरे में पवन-चक्की संयंत्रों के
आसपास पक्षियों की मौतों के कारणों की पड़ताल करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं।
इस अध्ययन के दौरान सामाख्याली में 11 प्रजातियों के पक्षियों के 47 कंकाल मिले हैं। इसी तरह, हरपनहल्ली
के पवन-चक्की संयंत्रों के आसपास तीन प्रजातियों के सात पक्षी कंकाल पाए गए हैं।
मृत पक्षियों के कंकालों का पता लगाने के लिए टरबाइनों के 130 मीटर के दायरे में खोजबीन की गई है।
टरबाइन के आसपास के क्षेत्रों की पूरी तरह से खोजबीन करने के लिए पवन-चक्की के आधार से सर्पिल मार्ग चुना
गया ताकि अधिक संख्या में मृत पक्षी कंकाल खोजे जा सकें।



शोधकर्ताओं ने पवन-चक्की टावरों के आसपास पाए गए पक्षियों के शवों, उनके शरीर पर चोट के निशान और
पंखों एवं हड्डियों के अवशेषों की पड़ताल की है। इस तरह मिले आंकड़ों को मृत पक्षियों के अवशेष, प्रजाति और
टरबाइन से जैविक अवशेषों की दूरी के अनुसार वर्गीकृत किया गया है। अध्ययनकर्ताओं ने अन्य जीवों द्वारा
पक्षियों के जैविक अवशेषों के निस्तारण की दर पर भी पर विचार किया है।


कच्छ के कुल 59 पवन-चक्की संयंत्रों में से प्रत्येक संयंत्र के आसपास औसतन 40 दिन के अंतराल पर क्रमशः 23
चक्रों में खोजबीन की गई है। चार प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों से घिरा यह क्षेत्र पक्षियों की विविध प्रजातियों का
आवास है, जहां सर्दियों में आर्कटिक, यूरोप और मध्य एशिया से प्रवासी पक्षी भी आते हैं।सामाख्याली पाए गए पक्षी कंकालों में से 43 कंकाल प्रवासी पक्षियों के आगमन के मौसम में मिले हैं। इनमें से
अधिकतर कंकाल टरबाइन के 20 मीटर के दायरे में पाए गए हैं। टरबाइन से टकराने के कारण कबूतर की
प्रजाति ढोर फाख्ता (यूरेशियन कॉलर डव) की मौतें सबसे अधिक हुई हैं। हौसिल (डालमेशियन पेलिकन) और
कठसारंग (पेंटेड स्ट्रोक) जैसे दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों के शव भी शोधकर्ताओं को मिले हैं।
अध्ययन में शामिल पक्षी विज्ञानी डॉ रमेश कुमार सेल्वाराज ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “आसपास
के घास के मैदान चील और बाज जैसे शिकारी पक्षियों की शरणगाह हैं। इस कारण इन पक्षियों के पवन चक्की के
ब्लेड से टकराने का खतरा बना रहता है। शिकारी पक्षियों की उम्र लंबी होती है और ये बहुत कम अंडे देते हैं।
इनकी मौतें अधिक होने से इन पक्षी प्रजातियों पर लुप्त होने का संकट बढ़ सकता है।”
दावणगेरे में जिन पवन-चक्कियों के आसपास यह अध्ययन किया गया है वे पर्णपाती वनों के करीब हैं, जहां
स्थानीय पक्षियों की 115 प्रजातियां पायी जाती हैं। वर्ष 2014-15 के दौरान यहां पवन-चक्की क्षेत्रों में नौ
चरणों में अध्ययन किया गया है। यहां सात पक्षी कंकाल मिले हैं, जिसमें से चार कंकाल प्रवासी पक्षियों के
आगमन के मौसम में पाए गए हैं। ये सभी पक्षी कंकाल पवन-चक्की के 60 मीटर के दायरे में मिले हैं।


शोधकर्ताओं का कहना है कि “इस अध्ययन से प्रति टरबाइन से औसतन 0.5 पक्षियों के मारे जाने का पता
चलता है। यह एक सीमित आंकड़ा हो सकता है क्योंकि पक्षियों के पवन-चक्कियों के ब्लेड से टकराने से होने
वाली मौतें 40 दिन के अंतराल पर दर्ज की गई हैं। नियमित निगरानी से पक्षियों की मौतों से संबंधित आंकड़े
अधिक हो सकते हैं।”
वैज्ञानिकों के अनुसार, पक्षियों की नियमित निगरानी और पवन-चक्की लगाते समय पक्षियों के आवास को ध्यान
में रखते हुए स्थान का चयन करना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसा करने से पक्षियों को पवन-चक्कियों
के खतरे से बचाया जा सकता है।
शोधकर्ताओं में रमेश कुमार सेल्वाराज (बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, मुंबई), अनूप वी., अरुण पी.आर., राजा
जयपाल, और मोहम्मद समसूर अली (सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्रकृतिक इतिहास केंद्र, कोयंबत्तूर) शामिल
थे। यह अध्ययन शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किया गया है।


गोबर के कंडे का इतिहास


धरोहर, गोबर कंडे का होली से क्या रिश्ता है, गोबर की राख में सोना, चांदी, बिजली, धुआं से देवता पुरखे के प्रसन्न क्यों होते हैं। गोबर शब्द का प्रयोग गाय, बैल, भैंस के मल को कहते हैं। घास भूसा खली जो कुछ चैपाया जानवर खाते हैं उनके पाचन से निकले रासायनिक प्रक्रिया को गोबर कहते हैं, ठोस या पतला होता है, रंग पीला काला होता है इसमें घास के टुकड़े अन्न के कुछ कर्ण होते हैं सूख जाने के बाद भी है कंडे के रूप में जाना जाता है। गाय का गोबर कंडे के लिए ज्यादा अच्छा होता है, गोबर में खनिजों की मात्रा अधिक होती है इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन, चूना, पोटाश, मैग्नीज, लोहा, सिल्कन, एलमुनियम, गंधक कुछ आंशिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं। आयोडीन की मात्रा भी होती है इसीलिए गोबर को खेत में डाला जाता है जिन कारणों से मिट्टी को उपजाऊ बनाने में खेत के लिए मदद मिलती है गोवर में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो मिट्टी को जोड़ते हैं अंदर हवा देते हैं जैसे कंपोस्ट खाद केंचुआ खाद, जैविक खाद, गोबर की खाद से धूप अगरबती तैयार होती है। गोबर के कंडों को ईंधन के रूप में प्रयोग करते हैं जिससे खाना बनता है गोबर का महत्व इस बात से लगाया जा सकता है कि सृष्टि के देवता भगवान गणेश, माता गौरी की पूजा की मूर्ति गोबर की होती है। हर शुभ कार में जमीन को गोबर से लीपा जाता है जीवन का समय हो, मृत्यु का समय हो, शमशान जाने का समय हो, सुख का समय हो, दुख का समय हो हरित क्रांति के दौरान अधिक फसल लेने के उद्देश्य खेतों में आता अधिक फर्टिलाइजर डाला गया है।मिट्टी में जैविक तत्व की कमी हो गई है खेत बीमार हो गए हैं उसकी बीमारी दूर करने के लिए केवल गोबर ही इलाज है गोबर की खेती से उपजे गेहूं, धान, दाल, दलहन का स्वाद व प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। यह अनाज के साथ दवा है गोबर के कंडे का धुआं शरीर के लिए फायदेमंद है कंडे के धुए से देवता प्रसन्न होते हैं ग्रह कलेश शांत होता है, कंडे का धुआं लकड़ी के अपेक्षा अधिक फायदेमंद है गाय के गोबर के कंडे ई-कॉमर्स मार्केटिंग के माध्यम से बेचे जा रहे हैं 12 कंडे 120 से अधिक में बिकते हैं। एक अध्ययन से सिद्ध हो गया है कि जिस घर में प्रतिदिन गाय के गोबर से नियमित धुआं किया जाता है उस घर में देवताओं का वास हो जाता है बीमारियां उस घर के पास तक नहीं आती उस घर का वातावरण शुद्ध होता है। परिवार के सभी सदस्य प्रसन्न रहते हैं, कंडे की आग दूध, घी, रोटी, दाल, सब्जी सबके के लिए फायदेमंद है कंडे की आग में में बनाया गया भजन सबसे अधिक पाचक होता है। एक अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार विश्व स्तरीय प्रयोगशाला ने 19 सितंबर 2016 को रिपोर्ट के दौरान यह पाया है, कि गोबर में तथा उसकी राख में सोना चांदी लोहा के साथ अन्य मिनरल पाए जाते हैं और यह शरीर के लिए फायदेमंद है इसलिए गोबर के कंडे की राख की रोटी आयुर्वेदिक विधि के अनुसार फायदेमंद है। गोबर से लीपा गया भवन वैदिक महत्त्व से मूल्यवान है। बालू, प्लास्टिक, सीमेंट की अपेक्षा 100 गुना अच्छा है यह वैदिक प्लास्टर है, गोबर में बिजली होती है जिसे सौर ऊर्जा प्लांट कहते हैं। लगभग कई गांव में चल रहे हैं कंडे की आंच से उठने वाले धुए से पुरखे प्रसन्न होते हैं, अतृप्त आत्मा तृप्त हो जाती हैं, मनुष्य का गोबर से तब तक रिश्ता रहता है जब तक वह जीवित रहता है अंतिम समय जिस तरह गोबर का कंडा राख जाता है उसी तरह मनुष्य भी राख हो जाता है। बचपन में हमारी अम्मा भोजन करने के बाद राख खाने के लिए दिया करती थी और कहती थी कि इससे खाया गया भोजन पच जाएगा। पीतल के बर्तन राख सेस साफ किए जाते थे, गोबर की होली शरीर के लिए इसलिए फायदेमंद है क्योंकि गोबर में वह सारे विटामिन पाए जाते हैं जिनके शरीर में पढ़ते ही रोग ठीक हो जाते हैं। होली का पूरा त्यौहार गोबर के विज्ञान पर आधारित है चाहे होलिका दहन हो, हर घर में गोबर के चंद्रमा, सूर्य बल्ले बनाए जाते हैं गोबर की होली खेली जाती है यह हमारी परंपरा रही है हमारे गांव जहां पर प्रकृति ने भोजन बनाने के लिए पूरे गांव में कंडे के बड़े-बड़े भट्टे बनाए रखें यह प्रकृति की देन है। आज पशुधन खत्म हो जा रहा है।भविष्य में शायद एक कंडे की भट्टी देखने को ना मिले सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मैंने जो अपने गांव में देखा आपके साथ साझा कर रहा हूं। शायद युवा पीढ़ी कुछ समझे होली सबकी शुभ हो। गोबर की होली की शुरुआत वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन उठाकर ग्वाल बालों के साथ शुरू किए क्योंकि सबसे अधिक गाय माता वहीं पर थी। हमारे बुंदेलखंड में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा होती है, गाय के गोबर से लोक देवता बनाए जाते हैं जिन्हें बासी भोजन कराया जाता है कई दिनों तक उस गोबर को पूजा के बाद खेतों में डाला जाता इससे धन, धान की वृद्धि होती है। गोबर के महत्व पर चित्रकूट कामदगिरि के प्रमुख महंत मदन गोपाल दास जी महाराज कहते हैं की हर व्यक्ति को एक गाय पाली चाहिए, गाय के गोबर से बने कंडे से रोटी बनानी चाहिए प्राकृतिक पर्यावरण दृष्टि से, गाय के गोबर की बनी रोटी से लकड़ी बचेगी पेड़ हम नहीं बना सकते पेड़ जल के लिए आवश्यक है, पर्यावरण के लिए आवश्यक है। होली पर संकल्प लें कि अगले वर्ष हम अपने गाय के गोबर से बने कंडो से दहन कर होली खेलेंगे। महोबा के प्रसिद्ध समाजसेवी श्री मनोज तिवारी जी कहते हैं कि गांव की खेती किसानी मे गोबर का बहुत महत्व है गोबर में प्राकृतिक घास फूस के गुण हैं औषधियां है किसान का मित्र है।



आयुर्वेद के जानकार प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ सचिन उपाध्याय कहते हैं कि गाय के गोबर में वे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी है। गोबर में, कंडे में, धुए मे, आग में, राख में, अलग अलग औषधि गुण है। गोबर से स्नान करने पर निरोगी जीवन के लिए बड़ा महत्व है, गोबर एक रहस्य है जिसकी अनुसंधान की बड़ी आवश्यकता है खेती के लिए , शारीरिक बीमारी के लिए, भोजन बनाने के लिए, हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से गोबर के कंडे की आग पर रोटी बना रहे हैं, वे हम से अधिक जानकार थे।


उमा शंकर पांडे सर्वोदय कार्यकर्ता बांदा बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश।