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Showing posts from January, 2022

बहरूपिया

जब हम छोटे थे तो याद आता हैं कि एक व्यक्ति आता था जो रोज ही नया रूप बना कर आता था।कभी हनुमानजी बन कर आता था तो कभी महाकाली का रूप ले कर आता था।कोई न कोई पात्र को ले कर उसी के उपर वेशभूषा कर घर घर जाता था और बदले में भिक्षा पाता था। दुकानों में भी वही स्वरूप बना कर भिक्षा पाता था।जिसे देखने बच्चे तो बच्चे बड़े भी खड़े हो जाते थे।क्या हम इसकी करोना से तुलना कर सकते हैं?पहले आया तो अनजाना सा किसीने भी न देखा न सुना था।आया तो तूफान सा था।जिस से डर ज्यादा लगा था ,काल्पनिक राक्षस सा था ,जिसका रूप और रंग की हम सिर्फ कल्पना ही कर के रह गए थे।वास्तविक रूप का अता पता नहीं था एक वायका सा था ,जो बातें जैसे हवा के साथ बह कर पूरे विश्व में फेल गई।लेकिन भिक्षा में न जानें क्या क्या के गया और पीछे छोड़ गया आर्थिक नुकसान,सभी देशों ने लॉकडाउन लगाया और इंसानों को बंद करके रख दिया।फिर थोड़ी राहत हुई ,सोचा कि अब गया लेकिन जब वह  फिर आया तो महा भयंकर रूप धर के आया तो विश्व के सभी देशों को आर्थिक,मंजिल और आर्थिक स्वरूप से ध्वंस कर कठूराघात कर गया।इस रूप ने तो आधे विश्व को अस्पतालों के दरवाजे पर पहुंचा दिया औ

डुप्लीकेट लोगों की डुप्लीकेट धरती

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा  न जाने क्यों मुझे रह-रहकर मूर्धन्य  ' ष '  की चिंता सताती रहती है। प्रदूषण से भरा  ‘ श ’  हर जगह हावी है। लगता है कभी-कभी  ' ङ्’ अपने लुप्त होते उच्चारण की चिंता में आत्मदाह कर लेगा। न जाने कौन धीरे-धीरे शिरोरेखा को मिटाता जा रहा है। मौके-बेमौके खड़ी पाई को चुराता चला जा रहा है। नागरी के सारे अंक अपनी विलुप्तता का रोना अकेले में रोए जा रहे हैं। उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। मानो विदेशज के शब्दों ने देशज शब्दों को अंतरिक्ष में फेंक दिया है। यौगिक धातुओं के जमाने में हम स्टील ,  फाइबर सोडियम क्लोराइड के आदि हो चुके हैं। शुद्धता अब हमें कतई नहीं भाती। मिक्स्ड प्रवृत्ति को अपना स्वभाव बनाने के आदी हो चुके हैं। दूरदर्शन के रामायण वाले हनुमान से नजर हटी तो बैटरी वाले हनुमान दिखाई दिए जो प्लास्टिक का पहाड़ उठाए पौराणिक ज्ञान को बाँचने का काम कर रहे हैं। बच्चों के हाथों में  ‘ चल छैंया छैंया वाले प्लास्टिक के बने खिलौने वाले मोबाइलों ’  की जगह असली मोबाइलों ने ले ली है, जो बड़ों की कद्र तो दूर उनके कहे को  ‘ सो बोरिंग पकाऊ पिपुल ’  कहकर आदर्श उवाचों को कचरे

टीबी का गढ़ बनते देश को करनी होगी चिंता

- टीबी से ग्रस्त लोग जानते हैं कि सामाजिक अलगाव और इससे जुड़ा कलंक क्या है। टीबी की संक्रामक प्रकृति की वजह से सामाजिक दुराव की प्रवृत्ति और मजबूत होती है। टीबी को पहचानने की चुनौतियां इससे निपटने में सबसे बड़ी बाधा हैं। इस रोग को पहचानने में देरी, खासकर एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी से पीड़ित मरीज तो एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर तक चक्कर काटता रहता है। अमित बैजनाथ गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार-लेखक करीब 140 साल पहले रॉबर्ट कोच ने ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) बैक्टीरिया की खोज की थी। इंसान की ओर से खोजी गई यह उन शुरुआती बीमारियों में से एक है, जिसके कारक स्पष्ट हैं। संक्रामक रोग होने से टीबी मौत का अहम कारण बनती है। सालाना एक करोड़ से अधिक लोग टीबी से संक्रमित होते हैं और 10 लाख से अधिक मौतें होती हैं। भारत पर टीबी का सबसे अधिक बोझ है। करीब 25 प्रतिशत मामले अकेले भारत से होते हैं और मौतें भी यहीं सबसे ज्यादा होती हैं। बीते कुछ वर्षों में भारत में टीबी उन्मूलन कार्यक्रमों पर विशेष जोर दिया गया है। इलाज के नए तरीके, पोषण सहायता के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है। साथ ही आंकड़ों का व्याप

ब्रेल लिपि की व्यवहारिक लब्धिया -

नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि शैक्षिकविकास की चरम परिणति होती है। "नाइट राइटिंग" के नाम से प्रसिद्ध है यह लिपि विश्व के सभी नेत्रहीन व्यक्तियों के शैक्षिक विकास के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है जिसका आविष्कार फ्रांस के लुई ब्रेल ने किया था जो स्वयं नेत्रहीन थे। लुई ब्रेल के पूर्व नेपोलियन बोनापार्ट के सैनिक रात्रि में एक दूसरे से बिना बातचीत किए अपना संदेश दूसरे सैनिक को पहुंचा देते थे लगभग उसी समय से ब्रेल लिपि का उद्भव माना जाता है।नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि शिक्षा के संस्कृतियों की वह श्रृंखला है जिसमें प्रत्येक राष्ट्र संपूर्ण नेत्रहीन मानवीय उपलब्धियों मे अपना अपना समायोचित अभिव्यक्ति प्राप्त करता है। आधुनिक युग में ब्रेल लिपि नेत्रहीनों के लिए शिक्षा के परिवर्तन की वह परिभाषा है जिससे एक राष्ट्र का विकास उच्चतम बिंदु पर  होता है।  प्रतियोगिता में पिछड़ जाने वाले नेत्रहीन बालको का मूल कारक शिक्षा है। शिक्षा प्रत्येक राष्ट्र की वह महान उदय यात्रा है जिसमें कल्याणकारी राज्य तत्वमीमांसा निहित रहती है। विश्व को माननीय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ब्रेल लिपि का व्यवहारिक 

काल की चाल

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा  जीना भी एक कला है। काश यह विज्ञान होता। कम से कम इसमें दो और दो जोड़ने से चार तो होते। कम से कम हाइड्रोजन के दो परमाणु और ऑक्सीजन का एक परमाणु मिलकर जल का अणु तो बनता। यहाँ तो जिंदगी कागज की नाव की तरह बही जा रही है। जमाना बाढ़ बनकर हमेशा पीछे लगा रहता है। जब देखो तब डुबोने के चक्कर में। शायद औरों की झोपड़ियाँ जलाकर उस पर भोजन पकाने से खाने का मजा दोगुना हो जाता होगा। भूख से बिलखती जिंदगियों की अंतर्पीड़ाओं के बैकग्राउंड में एक अच्छा सा संगीत बजा देने से शायद वह कर्णप्रिय लगने लगे। हो सकता है ऊटपटांग गानों के बीच यह भी जोरों से धंधा कर ले। चलती का नाम गाड़ी है और इस गाड़ी में मुर्दों के बीच सफर करना जो सीख जाता है तो समझो उसकी बल्ले-बल्ले है। वैसे भी यहाँ कौन जिंदा है। सब के सब मरे हुए तो हैं। कोई जमीर मारकर जी रहा है। कोई किसी का मेहनताना खाकर जी रहा है। कोई झूठों वादों से बहलाकर जी रहा है तो कोई मैयत की आग पर रोटी सेककर जी रहा है। यहाँ उल्टा-सीधा जो भी कर लो, लेकिन जीकर दिखाओ यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है। या फिर कहलो आठवाँ अजूबा है। सिर उठाने के लिए नहीं झुका

मनुष्य आखिर है क्या?

मनुष्य का अन्तर्जगत इतने प्रचण्ड उत्पात-घात,प्रपंचों, उत्थान पतन, घृणा, वासना की धधकती ज्वालाओं और क्षण क्षण जन्म लेती इच्छाओं से घिरा हुआ है कि उसके सामने समुद्र की महाकाय सुनामी क्षुद्र...लघुतर है। सुनामी नष्ट कर लौट जाती है। मानव मन के पास लौट जाने वाली कोई लहर नहीं है। वह तो बार-बार उठने और उसकी संपूर्ण उपस्थिति को ध्वस्त, मलिन कर घुग्घू बना देने वाली शक्ति है, जिसे विरले ही पराजित कर पाते हैं। मैंने कई लोगों को देखा है। और मैं उन्हें देखकर चकित होता रहता हूं। बढ़ती आयु अथवा दूसरी विवशताएं भी उन्हें रोक नहीं पातीं। वे महत्तर संकल्प, प्रपंचों, सूक्ष्म और वैभवशाली उपायों से अपनी अग्नि को शांत करते हैं। हर क्षण किसी साधारण मनुष्य को खोजते हैं। उन्हें शिकार बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं और वह साधारण मनुष्य जब ऊब कर चुपचाप विदा लेता है तो वे भी येन-केन प्रकारेण किनारा कर लेते हैं। लेकिन....मौका मिलते ही उसी साधारण मनुष्य को फांस कर फिर से नया गठन करते हैं। झूठ, मक्कारी, धूर्तता से भरे ये लोग हैरतअंगेज चालबाजियों से लाभ उठाने के अनगिन तरीके जानते हैं। किसी साधारण मनुष्य को ये वहां तक खीं
वर्तमान प्रौद्योगिकी युग में मानवीय बुद्धि सब कुछ आर्टिफिशियल बनाने के चक्कर में है!!!  प्राकृतिक मौलिकता और मृत् देह में जान फ़ूकना बाकी रहा!!! जो मानवीय बुद्धि के लिए असंभव है!!!  - एड किशन भावनानी   वैश्विक स्तर पर प्रौद्योगिकी का अति तीव्रता से विकास हो रहा है। शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों और अनेक साहित्यों में ऐसा आया है कि, सृष्टि में उपस्थित 84 करोड़ योनियों में मानव योनि सबसे सर्वश्रेष्ठ और अलौकिक बौद्धिक क्षमता का अस्तित्व धारण किए हुए हैं!! साथियों यह बात हम अक्सर आध्यात्मिक प्रवचनों में भी सुनते हैं कि यह मानवीय चोला बड़ी मुश्किल से मिलता है और इसे सत्यकर्म में उपयोग कर अपना मानव जीवन सफल बनाएं। साथियों बात अगर हम मानव बौद्धिक संपदा की क्षमता की करें तो हमें व्यवहारिक रूप से इसका लोहा मानना ही पड़ेगा। बहुत से ऐसे काम हैं, जिन्हें पहले करने में जहां देर लगती थी, वही अब चुटकियों में हो जाते हैं, इसके लिए विज्ञान के द्वारा विकसित की गई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धि, ए आई) को शुक्रिया कहा जा सकता है। हालांकि आज भी जिन कामों में बुद्धि के साथ विवेक की ज़रूरत होती है,वहां ए

यक्ष प्रश्न कलयुग का

 हे धर्म राज यह भारत पूछ रहा आपसे यक्ष प्रश्न  अगर संभव होतो हल कर दो भारत के यह यक्ष प्रश्न ll  चार भाई के जीवन खातिर आपने हल किए सारे यक्ष प्रश्न  आज इस कलयुग में क्यों नहीं कर रहे हल यह यक्ष प्रश्न ll  माना भीम अर्जुन सा ना अब इस युग में है कोई बलवान  पर आप तो समदर्शी हैं इसका कहाँ आपको गुमान ll  उस युग में तो केवल चार जान थे संकट में  लेकिन आज तो पूरा भारत हीं है संकट में ll   वहाँ तो केवल एक शकुनी जो गंदी चाले चलता था  यह यहाँ तो हर गली में शकुनि जो गंदी चाले चलता है ll   वहाँ  तो केवल एक दुर्योधन जिसको था सत्ता का भूख  य हाँ  तो हर घरचौराहे पर दुर्योधन खोज रहा सत्ता का सुख ll   एक धृतराष्ट्र मौन साधकर बुलाया कई संकट को  य हाँ  तो धृतराष्ट्र का फौज खड़ा बुला रहा संकटों को ll   एक शकुनी कंधार से आकर हस्तिनापुर मिटाने का रखा था दम  आज ना जाने कितने शकुनी भारत को मिटाने का करते जतन ll  उन दुष्टों को तो झेल गए आप अपने दृढ़ विचारों से  अब इस भारत को कौन बचाए ऐसे कु विचारों से ll   दुर्योधन संग एक दुशासन चीर हरण को था बेताब।  आज ना जाने कितने दुशासन चीरहरण को है तैयार ll   उस युग में तो