विज्ञापन

विज्ञापन

Thursday, July 1, 2021

तुम मेरी पहली और आखरी आशा

तुम्हीं मेरी पहली और आखरी आशा

तुम्हीं मेरी हो जीने की अभिलाषा
कहे करूं बखान तेरे प्यार की परिभाषा
सुन प्रियतम मेरे तुम ही मेरी पिपासा।।

तुम संग ही जुड़ी मेरी हैं सांसें
तुम्हें ही देख भरती मैं आंहें
बिन तेरे रह ना पाती प्रियतम
तुम्हीं मेरे जीने की हो वजह।।

मेरी पहली मंजिल तुम 
मेरी आखरी मंजिल भी गुम
खोके तेरी आंखों की गहराई मे प्रियवर
जैसे हो जाती मैं बेसुध।।

तुम मेरी पहली और आखरी आशा।।2।।

वीना आडवाणी"तन्वी"
नागपुर, महाराष्ट्र

आंखों में सागर लहराए

 आँखों में सागर लहराए

होठों पर मुस्कान खिली है!
आत्म-कक्ष में भंडारे में
दुख की बस सौगात मिली है!

मन उपवन में किया निरीक्षण
प्रेम-पुष्प सब निष्कासित हैं!
सांसों से धड़कन तक फैले
कंटक सारे उत्साहित हैं!

पीडाओं के कंपन से अब
अंतस की दीवार हिली है!
आत्म-कक्ष के--------

उलझ गये रिश्तों के धागे
जगह-जगह पर गाँठ पड़ी है!
द्वार प्रगति के बंद हुए सब
मुश्किल अब हर राह खड़ी है!

सत्य-झूठ की दुविधा में ही
विश्वासों की परत छिली है!
आत्म-कक्ष के---------

प्रश्न सरीखा जीवन जैसे
निशदिन उत्तर ढूढ़ रही हूँ!
पर्वत नदियाँ झरनों से अब
पता स्वयं का पूँछ रही हूँ!

सृष्टि करे संवाद भले पर
सबकी आज जुबान सिली है!
आत्म-कक्ष के-------

यहां चौरासी सिद्धों को योगनी माता ने दिये थे साक्षात दर्शन

हिमाचल प्रदेश जिला मण्डी के वाह्य सिराज व सतलुज के साथ लगते शिमला जिला क्षेत्र के गांव व उप गांव का शायद कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो च्वासी क्षेत्र व च्वासीगढ़ से परिचित न हो। समुद्रतल से करीब 9000 फुट की ऊंचाई पर स्थित च्वासीगढ़ के नामकरण के बारे में प्रदेश के स्थान नाम व्युत्पत्तिजन्य विवेचनात्मक अध्ययन पुस्तक में लिखा है ,कि मण्डी जिला की करसोग तहसील के च्वासीगढ़ में किसी समय गुरु गोरखनाथ चौरासी सिद्धों के साथ स्वयं इस स्थान पर आये थे । इसलिए यह स्थान चौरासी कहलाया। जो बाद में बदलकर ( अपभ्रंश शब्द) च्वासी हो गया ।अपने धार्मिक महत्व की वजह से यह स्थान सुकेत ही नहीं ,अपितु जिला कुल्लू व शिमला का भी प्रसिद्ध तीर्थ स्थल रहा है । 

इस स्थान के बारे में जे• हचिसन और जे• बोगल ने हिस्ट्री ऑफ पंजाब हिल स्टेट भाग एक में सुकेत राज्य में उग्रसेन के शासन काल में धूंगल वजीर की कठोरता के कारण इसी गढ़ में बने किले में बारह दिनों तक वजीर को बंदी बनाने का वर्णन मिलता है। करसोग घाटी के पांगणा निवासी वरिष्ठ समाज सेवी व संस्कृति मर्मज्ञ डाॅ• जगदीश शर्मा जी व च्वासीगढ़ के युवा कारदार व समाज सेवी टी सी ठाकुर बताते है कि समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली योगिनियों का यह मंदिर जब अस्तित्व में आया तब से इसकी पूजा एक ही गांव के गांव वासी के वंशानुगत की जाती है। योगिनियों का यह मंदिर कताण्ङा से रोखङू बानीधार तक गहन वनराजियों से गुजरते हुए पहुंचा जा सकता है । यह मंदिर बानीधार व रोखङू के बीच एक ऊंचे स्थान पर जंगलों के बीच स्थित है ।कहा जाता है कि एक बार एक योगनी ने हाथ में सांप रूपी शस्त्र के साथ चौरासी सिद्धों को साक्षात दर्शन दिए थे। अतीत में यह तांत्रिक साधना का दिव्य स्थल रहा है। स्थानीय निवासी युवा नितेश ठाकुर जी ने बताया कि आगामी समय में इस मंदिर का जीर्णोद्धार प्राचीन शैली में ही किया जायेगा। यह स्थान चारों ओर से शानदार जंगलों से घिरा है ।हरे भरे पेड़ मन की शांति व तनाव मुक्ति रास्ता है। इस प्रकार के प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली यह तांत्रिक योगिनियां आज तक खुले स्थान पर ही पूज्य रही है ।

कोरोना से जान गंवाने वालों के परिजनों को बड़ी राहत - प्रवासी मजदूरों को राहत - सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुआवजे सहित दो बड़े फैसले

कोरोना महामारी राहत पर दो दिन में सुप्रीम कोर्ट के 2 बड़े फैसले - मृत्यु पर परिजनों को मुआवजा और वन नेशन वन कार्ड, कम्युनिटी किचन से आम जनता को राहत - एड किशन भावनानी

गोंदिया - भारत में कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर से हर नागरिक आर्थिक रूप से त्रस्त हुआ तथा संभावित डेल्टा प्लस प्रकोप से भयग्रस्त और चिंतित है। भारतीय परिवार जिन्होंने अपनों को खोया है उसमें हम सभी और और भी बहुत दुखी हैं। कई बच्चे अनाथ हुए हैं, कई परिवारों के कमाने वाले अब नहीं रहे, उनके सामने भविष्य रूपी पहाड़ खड़ा है उसे पार करने की दुविधा में फंसे हैं। हालांकि सरकारें भी अनेक राहतें उपलब्ध करवा रही है। 28 जून 2021 को ही 6.29 लाख करोड़ का पैकेज दिए हैं। परंतु अगर हम पिछले साल की बात करें तो 14 मार्च 2020 को केंद्र सरकार ने देश में कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों की सहायता के लिए मुआवजे का एलान किया था। गृह मंत्रालय ने कहा था कि कोरोना वायरस से मरने वाले व्यक्ति के परिवार को 4 लाख रुपये का भुगतान किया जाएगा, इसमें राहत कार्यों में या प्रतिक्रिया गतिविधियों में शामिल लोगों कोभी इसका लाभ मिलेगा। हालांकि सरकार ने इसके कुछ घंटे बाद जारी अधिसूचना में मुआवजे को लेकर और स्पष्टीकरण दिया था, भारत सरकार के जॉइंट सेक्रेटरी ने अधिसूचना जारी कर इसकी जानकारी दी थी, उन्होंने बताया था कि अब स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड के तहत कोरोना वायरस के इलाज में होने वाले खर्च को दिया जाएगा। इसका मतलब यह है कि अब अगर कोई कोरोना वायरस की चपेट में आता है, तो उसके आइसोलेशन और जांच से लेकर इलाज तक में होने वाला खर्च ही सरकार देगी। स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फंडसे धनराशि देने का फैसला भी राज्य सरकार करेगी...। बात अगर हम बुधवार दिनांक 30 जून 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की करें तो आदेश कॉपी और टीवी चैनलों में बताइए समाचार अनुसार माननीय दो जजों की बेंच जिसमें माननीय न्यायमूर्ति अशोक भूषण और माननीय न्यायमूर्ति एमआर शाह की बेंच ने रिट पिटिशन (सिविल) क्रमांक 554/2021और 539/2021 याचिकाकर्ता बनाम यूओआइ के मामले में अपना फैसला 66 पृष्ठोंऔर 17 पॉइंटों के आदेश के पॉइंटनंबर 16 में कोर्ट ने एनडीएमए को डीएमए की धारा 12 (iii) के तहत अनिवार्य रूप से कोविड-19 के कारण मरने वाले व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों के लिए अनुग्रह राशि के लिए दिशा-निर्देशों के साथ आने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आगे कहा कि अनुग्रह सहायता के रूप में कितनी राशि दी जानी है, यह राष्ट्रीय प्राधिकरण के विवेक पर छोड़ दिया गया है। वे अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए राशि तय करने पर विचार कर सकते हैं। वे आवश्यकता, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के तहत फंड की उपलब्धता और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण केंद् द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं, राहत के न्यूनतम मानकों के लिए किए गए फंड आदि पर भी विचार कर सकते हैं। उपरोक्त निर्देशों को 6 सप्ताह की अवधि के भीतर समायोजित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मौत का सही कारण यानी कोविड-19 के कारण मृत्यु का कारण बताते हुए मृत्यु प्रमाण पत्र/आधिकारिक दस्तावेज जारी करने के लिए सरल दिशानिर्देश तैयार किए जाएं। दूसरे शब्दों में शीर्ष अदालत ने कोरोना से जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को एक बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने ऐसे परिजनों को मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट नेएनडीएमए को निर्देश दिया कि कोविड-19 से जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को आर्थिक मदद देने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि कोविड-19 से मारे गए लोगों के परिवारों को दी जाने वाली आर्थिक मदद की राशि, हर पहलू को ध्यान में रखते हुए निर्धारित की जाए और माननीय कोर्ट ने कहा कि मुआवजा तय करना सरकार का काम हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की रकम या नियम तय करना उसका काम नहीं है। अदालत ने एनडीएम ए को दायित्व निभाने में नाकामी पर फटकार भी लगाई। कोर्ट ने कहा कि एनडीएमए को वैधानिक तौर पर मुआवजा तय करने और दिलवाने की सिफारिश करने का अधिकार है, लेकिन ऐसा न करके वह अपने वैधानिक कर्तव्य का पालन करने में विफल रहा है। उसे मुआवजा समेत मिनिमम स्टैंडर्ड की राहत तो कम से कम देनी ही चाहिए। यह आवश्यक है हालांकि, कोर्ट ने यह जवाब याचिका कर्ताओं द्वारा दायर उन याचिकाओं पर दिया है, जिसमें कोविड-19 महामारी से मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत  चार लाख रुपये का मुआवजा देने की मांग की गई थी।...बात अगर हम मंगलवार दिनांक 29 जून 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की करें तो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा था कि वह 31 जुलाई 2021 तक वन नेशन वन राशन कार्ड स्कीम लागू करें ताकि अपने राज्य से दूसरे राज्य में गए प्रवासी मजदूरों को राशन आसानी से मिल सके। तथा केंद्र सरकार को निर्देशित किया कि वह असंगठित मजदूरों के रजिस्ट्रेशन के लिए पोर्टल डेवलप करें ताकि उन्हें स्कीमों का फायदा मिल सके। तथा केंद्र, राज्यों को राशन मुहैया करवाएं जब तक देश में महामारी से पनपे हालात समाप्त नहीं हो जाते तब तक राज्य कम्युनिटी किचन चलाएं।...बात अगर हम दिनांक 30 जून 2021 को प्रधानमंत्री द्वारा ली गई हाई लेवल मीटिंग की करें तो दो दिन पहले एक बड़ा निर्णय घोषित किया था कि जिनको कोविडके चलते दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने ऐसे सभी क्षेत्रों को 6.28 लाख़ करोड़ रुपये की मदद का खाका बताया था। कैबिनेट ने उसे मजूरी दी। वहीं, कैबिनेट भारत नेट को पीपीपी के माध्यम से देश के 16 राज्यों में 29,432 करोड़ रुपये के कुल खर्च को भी मंजूरी दी है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो कोरोना से जान गंवाने वालों के परिजनों को मुआवजे के फैसले के रूप में बड़ी राहत माननीय कोर्ट द्वारा दी गई है और असंगठित मजदूरों को वन नेशन वन कार्ड, कम्युनिटी किचन के रूप में राहत दी गई है जो सराहनीय है। 

-संकलनकर्ता- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

बिना किसान किसी भी देश का संपूर्ण होना संभव नहीं है

देश में कोरोना की रफ्तार कम हो गई है,अधिकतर राज्य धीरे-धीरे अनलॉक की तरफ बढ़ रहे हैं, इस बीच हमारे  अन्नदाता भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी में जुट गए हैं। देश में अन्नदाता का विरोध प्रदर्शन जारी है।,देशभर में जारी विरोध प्रदर्शन का करीब सात महीने से भी अधिक होने वाले हैं। देखे तो आजाद भारत में हम सबका पेट भरने वाले अन्नदाता को आये दिन अपने अधिकारों और हक को हासिल करने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है ,लेकिन देश की सरकारें है कि वो अपनी चतुर चाणक्य नीति से हर बार हम किसानों को आश्वासन देकर समझा-बुझाकर सबका पेट भरने के उद्देश्य से अन्न उगाने के लिए वापस खेतों में काम करने के लिए भेज देती है। देश में सरकार चाहें कोई भी हो, लेकिन अपने अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत किसानों की झोली हमेशा खाली रह जाती है। आज अन्नदाता किसानों के हालात बेहद सोचनीय हैं, स्थिति यह हो गयी है कि एक बड़े काश्तकार को भी अपने परिवार के लालनपालन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जो स्थिति देशहित में ठीक नहीं हैं। किसानों के इस हाल के लिए किसी भी एक राजनैतिक दल की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उनकी बदहाली के लिए पिछले 74 सालों में किसानों की वोट से देश में सत्ता सुख का आनंद लेने वाले सभी छोटे-बड़े राजनैतिक दल जिम्मेदार हैं। क्योंकि इन सभी की गलत नीतियों के चलते ही आज हम किसानों की स्थिति यह है कि भले-चंगे मजबूत किसानों को सरकार व सिस्टम ने कमजोर, मजबूर व बीमार बना दिया है। जिसमें रही सही कसर हाल के वर्षों में सत्ता पर आसीन रही राजनैतिक दलों की सरकारों ने पूरी कर दी है। जिनकी गलत नीतियों व हठधर्मी रवैये ने हम परेशान किसानों को सड़क पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।

देखे तो वही अन्नदाताओं की आत्महत्याओं के पीछे भी सबसे बड़ा मुख्य कारण साहुकार व बैंकों के ऋण की समय से अदायगी न कर पाना है ,और बैंक से किसानों को ऋण लेने में इतनी परेशानियों का सामना करनी पड़ती है , जो की मैं खुद अपने परिवार और दूसरों के लिए कई बार बैंकों के उदासीन रवैया का सामना कर चुका हूं , वही किसान ब्याज के चलते कर्ज में भारी वृद्धि हो जाने से समय पर कर्ज नहीं चुका पाता है, इसके लिए फसल उत्पादन लागत में भारी वृद्धि के बाद भी फसल उत्पादन में कमी, फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना तथा मौसम की बेरुखी के चलते लगातार फसलों का बर्बाद होना, बर्बाद फसलों का उचित मुआवजा नहीं मिल पाना आदि हालात जिम्मेदार है। हमारे देश में आजकल किसानों के द्वारा नगदी फसलें उगाने का चलन ज्यादा चल गया है, जिनकी लागत बहुत अधिक होती है। जिसके चलते किसानों को बहुत पैसे की आवश्यकता होती है और देश में आज भी स्थिति यह है कि बैंकों व अन्य संस्थाओं से किसानों को उनकी जरूरत के मुताबिक कर्ज आसानी से नहीं मिल पाता है। जिसके चलते किसान 24 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत ब्याज पर निजी साहूकारों से ऋण लेकर अपनी खेती की जरूरतों को पूरा करता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद गलत नीतियों के चलते उचित मूल्य ना मिल पाने, फसल बर्बाद व उत्पादन कम होने के चलते किसानों की कर्ज अदा करने की स्थिति नहीं रह पाती है, जिसके चलते वो कर्ज के इस खतरनाक दलदल में बुरी तरह धंसता चला जाता हैं और जब उसकी सहने की क्षमता जवाब दे जाती हैं तो वो जिंदगी से खफा हो आत्महत्या करने जैसा कदम उठा कर असमय मौत को गले लगा लेता है, देखो मत मारो गोलियों से मुझे मैं पहले से एक दुखी इंसान हूँ, मेरी मौत कि वजह यही हैं कि मैं पेशे से एक किसान हूँ, अंत में यही कहुंगा की हम सभी अन्नदाता के खेतों से उपजा हुआ अन्न ही खाएंगे,ना की गूगल से डाउनलोड करके रोटी खाएंगे, इसलिए तरक्की तो खूब करें लेकिन अन्नदाता की उपेक्षा करके तरक्की करके हम कंकड़ मिट्टी पत्थर नहीं खाएंगे, इसलिए आज आपसे अनुरोध करता हूं कि अगर आप हम अन्नदाता के उपजाया हुआ अन्न को खाते हैं तो अन्नदाता के  न्याय के लिए आवाज उठाते रहे, साथ ही जितना संभव हो आप अपने सामर्थ्य अनुसार आगे बढ़कर अन्नदाता की मदद के लिए भी आगे आएं।

डॉ.विक्रम चौरसिया (क्रांतिकारी)  चिंतक/आईएएस मेंटर/ दिल्ली
लेखक सामाजिक आंदोलनो से जुड़े रहे हैं व वंचित तबकों के लिए आवाज उठाते रहे है ।