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Showing posts from May, 2022

रिजल्ट हाईस्कूल का

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  हाईस्कूल_का_रिजल्ट_तो_हमारे_जमाने_में_ही_आता_था... ये जमाना गुजर गया ।अब बच्चो के no 95% से भी ऊपर आने पर भी कुछ नही आता ओर उस जमाने के 36 % वाला भी आज की फौज को पढ़ा रहा है रिजल्ट तो हमारे जमाने में आते थे, जब पूरे बोर्ड का रिजल्ट 17 ℅ हो, और उसमें भी आप ने वैतरणी तर ली हो (डिवीजन मायने नहीं, परसेंटेज कौन पूँछे) तो पूरे कुनबे का सीना चौड़ा हो जाता था। दसवीं का बोर्ड...बचपन से ही इसके नाम से ऐसा डराया जाता था कि आधे तो वहाँ पहुँचने तक ही पढ़ाई से सन्यास ले लेते थे। जो हिम्मत करके पहुँचते, उनकी हिम्मत गुरुजन और परिजन पूरे साल ये कहकर बढ़ाते,"अब पता चलेगा बेटा, कितने होशियार हो, नवीं तक तो गधे भी पास हो जाते हैं" !! रही-सही कसर हाईस्कूल में पंचवर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते..." भाई, खाली पढ़ने से कुछ नहीं होगा, इसे पास करना हर किसी के लक में नहीं होता, हमें ही देख लो... और फिर , जब रिजल्ट का दिन आता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो एक दिन पहले ही शहर के दो- तीन हीरो (ये अक्सर दो पंच वर्षीय योजना वाले होते थे) अपनी हीरो स्प्लेंडर या यामहा में शहर चले जाते। फिर आधी रा

समय पर इलाज न कराया जाए तो इस बीमारी से जा सकती है आपकी आंख की रोशनी

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 डायबिटिक रेटिनोपैथी  : समय पर इलाज न कराया जाए तो इस बीमारी से जा सकती है आपकी आंख की रोशनी डॉ. महिपाल सचदेव डायरेक्टर सेंटर फॉर साइट नई दिल्ली डायबिटिक रेटिनोपैथी आंख की एक समस्या है जिसके कारण अंधापन हो सकता है। यह तब होता है जब उच्च रक्त शर्करा आंख के पृश्ठ भाग में यानी रेटिना पर स्थित छोटी रक्त वाहिनियों को क्षतिग्रस्त कर देती है। डायबिटीज वाले सभी लोगों में यह समस्या होने का जोखिम होता है। डायबिटिक रेटिनोपैथी दोनों आंखों को प्रभावित कर सकती है। हो सकता है कि शुरुआत में आपको कोई लक्षण न दिखें। स्थिति के बिगडने के साथ, रक्त वाहिनियां कमजोर हो जाती हैं और रक्त तथा द्रव्य का रिसाव करती हैं। नई रक्त वाहिनियों के बढने पर वे भी रिसाव करती हैं और आपकी दृष्टि में बाधा उत्पन्न हो सकती है। डायबिटिक रेटिनोपैथी, आंखों की एक ऐसी बीमारी है, जिसकी वजह डायबिटीज होती है। जो मरीज सालों डायबिटीज के मरीज हैं उनमें यह बीमारी भी होने का खतरा कई गुणा ज्यादा होता है। यह आंखों के पर्दे की बीमारी, जिसमें मरीज के रेटिना यानी आंख के पर्दे जहां पर तस्वीर बनती है को प्रभावित कर देता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिस

दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता खाने से पहले आम को पानी भिगोने को क्यों कहती थीं, जानें इसके पीछे का विज्ञान

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  *हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता खाने से पहले आम को पानी भिगोने को क्यों कहती थीं, जानें इसके पीछे का विज्ञान..* *आम को खाने से पहले पानी में भिगोने का मकसद सिर्फ फलों की गंदगी और धूल को साफ करना नहीं है. जानें इसके पीछे छिपे छह वैज्ञानिक कारणों के बारे में.* *गर्मी का मौसम यानि फलों के राजा, आम का मौसम. एक तरफ धूप, पसीना और गर्म हवाओं के बारे में सोचकर मन थोड़ा परेशान होता है, तो वहीं दूसरी तरफ आम के मीठे स्वाद के बारे में सोच कर मन खुश भी हो जाता है.*  *आम का मौसम आते ही लोग इसके अचार, आमरस, मैंगो शेक सहित कई तरह की रेसिपी बनाने की तैयारी में जुट जाते हैं.लेकिन क्या आपने गौर किया है कि आमतौर पर घरों में हमारी दादी-नानी आम खाने से पहले इसे एक-दो घंटे के लिए पानी में भिगोकर जरूर रखती थीं !* *उनका मानना था कि ऐसा करने से आम में लगी गंदगी और फसल में इस्तेमाल किए गए केमिकल, दोनों साफ हो जाते हैं. आम को पानी में भिगोकर रखने के पीछे यह तो एक कारण है. आईए विस्तार से जानें ऐसा करने के पीछे और कारणों के बारे में.* *01. फाइटिक एसिड से छुटकारा* *फाइटिक एसिड उन पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट्स)

जो भी पूरा पढ़ेगा उसे अपने बीते जीवन के कई पुराने सुहाने पल अवश्य याद आयेंगे

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  एक जमाना था... खुद ही स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि साइकिल बस आदि से भेजने की रीत नहीं थी, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे...  उनको किसी बात का डर भी नहीं होता था,  पास/नापास यही हमको मालूम था... *%* से हमारा कभी भी संबंध ही नहीं था...  ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको ढपोर शंख समझा जा सकता था... किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी...  कपड़े की थैली में...बस्तों में..और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में... किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी.. ..   हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर रद्दी पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम... एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था.....    साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की पुरानी किताबें खरीदने में हमें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती थी.. क्योंकि तब हर साल न किताब बदलती थी और न ही पाठ्यक्रम...  हमारे माताजी पिताजी को हमारी पढ़ाई  बोझ है.. ऐसा

बैलगाड़ी में सवार होकर से दुल्हन लेने पहुंचा दूल्हा

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चमक धमक के बीच शादी समारोह का आयोजन दूल्हा या दुल्हन का सपना होता है. राजस्थान के पाली  जिले के जैतारण में चकाचौंध और आधुनिकता से दूर शादी समारोह पूरा हुआ है. यहां एक दूल्हे ने वर्षों पुरानी यादों को ताजा कर दिया है. दूल्हे राजा अपनी पूरी बारात सजी-धजी बैलगाडियों पर लेकर गए. बैलगाड़ियों में बैठी महिलाएं ने एक साथ एक सुर में विवाह गीत भी गाया. ये बारात जहां से भी निकली हर कोई इसे देख अचंभित रह गया, मानो जैसे पुराना दौर एक बार फिर से आ गया हो. वैसे तो गांवों में बैलगाडियों की पुरानी संस्कृति आज भी है लेकिन बैलगाडियों पर बारात जाना, ये अनोखा है.  देवरिया गांव के बेरा रामर से दूल्हे की बारात मारवाड़ी अंदाज में निकली. बेरा रामर निवासी पी लक्ष्मण पंवार का दक्षिण भारत में अच्छा व्यवसाय है. शादी के अच्छे आयोजन के लिए महंगी वातानुकूलित कारें और हेलिकॉप्टर में उनके पुत्र की बारात ले जाना उनकी पहुंच से बाहर नहीं है, लेकिन दूल्हे प्रदीप पंवार की तरफ से बैलगाडियों पर बरात ले जाने का प्रस्ताव बिलकुल अलग था. आर्थिक रूप के सक्षम परिवार ने बैलगाडियों को सजाकर और उसमें बारात लेकर लड़की वालों के यहां चावण

बेतहाशा महंगाई, जनता की रोजमर्रा की जीवनशैली को दे रही भारी शिकस्त हैं...!

  बेतहाशा महंगाई, जनता की रोजमर्रा की जीवनशैली को दे रही भारी शिकस्त हैं...!                          ----- पेट्रोल-डीजल तो ठीक लो गैस में लग गई आग, आज का यही लोक राग। सभी का यही राग 6 मई को लगाया रसोई गैस का नंबर और 977.5 रूपये ने उछाल मारा रूपये पचास की बढ़ोतरी का दूसरे दिन टंकी आई रुपये 1027.5 किसी ने दिया है पाइंट में पैसा कभी... ?, सभी ने चुकाया राउंड अप में और कीमत चुकाते हैं रुपये 1030 की क्योंकि चिल्लर नहीं मिलती, ना ही स्वीकार की जाती है। बहुत दुख में जी रहे हैं, फिर भी जूं है कि रेंगती नहीं, है मगर काटती भी नहीं। कुछ समय पूर्व में जाऐं या दो - तीन - चार साल के पहले की जितनी कीमतें पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस की चुकाते थे आज डबल हो गई या उससे अधिक हो गई और इसे मजबूरन हम सभी चुकाते हैं, रो-गाकर या अंधभक्ति में ताली पिटते हुए, बताऐं आपकी आय डबल हुई क्या या नौकरी पेशा, पेंशनर्स की आय बढ़ी, नहीं बढ़ी ना तो हासिल में आई महंगाई। अब ठोको ताली या गाल बजाओ या गाल फुलाओ। महंगाई बढ़ा रहे, टेक्स बढ़ा रहे, जीएसटी बढ़ा रहे। इनसे बड़े व्यापारी, बिजनेसमेन कमा रहे हैं, टेक्सों से सरकार अरबों रूपये कमाती ह

पार्थ सारथी तलास एक नई राह

 हे जग सारथी अब टूट रहा है इंसान ।  एक बार को पुनः सुसज्जित  कुरुक्षेत्र का यह मैदान ।। उस रथ पर तो एक धनुर्धर  न्याय पताका ले बैठा था ।  अब तो ना रथ और रथी  केवल तेरा आसरा है ।।  असत्य पर सत्य कैसे जीतता  इसका राह दिखाया था ।  आज दोनो साथ बैठा है  जनता भ्रमित सा दिखता है ।।  धर्म विजय के खातिर तुमने  वहाँ दिया गीता का ज्ञान । अहंकारी और दंभी को  दिखाया अपना होने का प्रमाण ।।  अब तो सब दंभी ही  अपने को समझते हैं भगवान । एक बार तुम रथ सजाकर  करवा दो अपना भान ।।  हे पीत वसन धारी हे लीलाधर,  दिखलाओ अपनी लीला ।  भारतवर्ष की पुण्य धरा  भूल रही आपकी लीला ।।  वाका काका पूतना आदि  शर ताने हो रहा खड़ा ।  कान्हा के उस बाल रूप का  जनता कर रहा आशा ।।  कंस का आतंक अब  फिर फैला है चारों ओर । मुरली छोड़ो कान्हा अब  शांति कर दो चारों ओर ।।  जरासंध का अत्याचार अब  फैल रहा संपूर्ण भूभाग । अधर्मी और अताताई का  संघार कौन करेगा आज ।।  कुटिलों की कुटिल चालें अब  एक जगह एकत्रित है । इस चक्रव्यूह में फंसे आम जन,  वेधने की जरूरत है ।।  तुम तो हो न्याय रथी फिर  अन्याय कैसे देख सकते हो । जरूरत हो तो पुनः एक  पार

हर वर्ष पुनरावृति करने वाला संक्रमण करोनाl घबराइए नहीं सिर्फ सावधान रहिए

करोना कभी न नष्ट होने वाला वाला ऐसा जानलेवा संक्रमण है जिसके महीनों तथा वर्ष के अंतराल में लौट लौट कर मानव शरीर में आने की संभावना सदैव बनी रहती है । वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि करोना संक्रमण के वैरीअंट को समूचा खत्म नहीं किया जा सकता उसकी केवल प्रीवेंटिव मेडिसिन या वैक्सीन ही ली जा सकती है। करोना से दूर रहने के लिए केवल और केवल सावधानी और चिकित्सा विशेषज्ञ द्वारा दी गई गाइडलाइंस का ही पालन करना होगा, अन्यथा करोना जानलेवा तो है ही। क्या आपको नहीं लगता एक दूसरे के संक्रमण से फैलने वाला भयानक करोना सिर्फ प्राकृतिक विपदा एवं प्राकृतिक असंतुलन का नतीजा है, बल्कि कुछ मांस भक्षी लोगों मानसिक असंतुलन का भी भयानक परिणति है। प्रकृति ने हमें पहले से ही सचेत करके रखा था, पहले सुनामी, बाढ़, सूखा और भूस्खलन के परिणामों से हमें आगाह किया था और न जाने इन भयानक विपदाओं से कितने लोग काल के गाल में समा चुके हैं। हर वर्ष सुनामी,भूस्खलन,बाढ़ से मरने वालों की संख्या हजारों में होती रही है, पर कुछ देशों के नागरिकों के मानसिक संतुलन का क्या कहें, जिन्हें सब्जी,भाजी,दूध,फल, सूखे मेवे को छोड़कर कुत्ता, बिल्

मुस्कराना खूबसूरत जिंदगी का इम्यूनिटी बूस्टर!!

हमेशा ऐसे हंसते मुस्कुराते रहो कि आपको देखकर लोग कहें वह देखो! जिंदगी कितनी खूबसूरत है!!  मनोभाव से मुस्कुराना, हंसना स्वस्थ जिंदगी का मंत्र - मुस्कान की दूसरों के दिलों पर राज करने में अहम भूमिका! - एड किशन भावनानी गोंदिया - कुदरत नें इस ख़ूबसूरत सृष्टि रूपी कायनात में एक खूबसूरत प्राणी मनुष्य की रचना कर 84 लाख़ जीवों से अलग एक विशेष कलाकृति बुद्धि का सृजन मानव शरीर में समाहित किया ताकि उस के बल पर अन्य जीवों से अति उत्तम जीव बन कर रहे! वैसे तो मानव शरीर की संरचना के अंग हर दूसरे प्राणियों में भी होते हैं पर बुद्धि अपेक्षाकृत सर्वश्रेष्ठ होती है! जिसका उपयोग हम सकारात्मकता से अपने अपने क्षेत्रों और अपने शरीर को स्वस्थ, निरोगी काया बनाने में करने की विचारधारा को रेखांकित करना होगा!  साथियों बात अगर हम अपने शरीर के स्वस्थ एवं निरोगी रखने की करें तो उसके अनेक तरीकों में से एक हंसना और मुस्कुराना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है जिसका उपयोग करने से हमारे स्वास्थ्य पर बहुत अधिक फायदा होता है यह स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा भी कहा गया है परंतु वह हंसना मुस्कुराना असली होना चाहिए! इसीलिए बड़ों की त

सुकून मिले

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तपती देह जब उमस और भीषण गर्मी से ओंठ कंठ तक प्राण बसते सूखे  आकर। माथे से टपके स्वेदो टपके है पग में छाले नदिया पोखर शीतलता से सुकून पाकर। मन में जब और अवसाद भरा क्षण भर मां की ममता शीतल आंचल मिल जाए। मन की पीड़ा और व्यथा में मिले शांति मां की ममता से भरा सुकून मिल जाए।। भूख बढ़ी ज्वाला में असह भूख मिटाने रूखी सूखी रोटी भी प्रिय भोजन मीठा उदर ज्वाला को एक सुकून मिल जाए पेट भरा हो तब तो फिर सब सो इतराए। प्रिया प्रेम की आंखों में प्रीतम प्यारे को रसभरी मद मुग्ध नयन फिर सदा बिछे। करकी किबाड़ ओट से झलक मिले तो विरहिन प्रिय को एक सुकून शांति मिले। प्रणय प्रेम में भरी प्रिय चाहत उम्मीदों से प्रियवर से कर मान मनौती पूरी चली है उठी प्रेम की ज्वाला में प्रियतम बोली से उम्मीद भरी ताप धरा सी सुकून मिले हैं। बच्चों की प्रिय तोतली बोली दिल  बसती वीणा गुंजन सरगम कीमत सबसे फीके है। नन्हे पग रखते बच्चा मां का आंचल पकड़े मां बाप को सुकून मिले जंग सभी जीते है। दिन मेहनत मजदूरी करके श्रममूल्य मिले दर्पण सा चेहरा चमका है सौसौ बार खिले। अपनी झोपड़पट्टी में कुछ मटकी में चावल लाकर रखता घर को पोषण सुकून मिले।

छपरा के 70 साल का बुजुर्ग बना दूल्हा, धूमधाम से निकली बारात, पिता की शादी में 8 बच्चे बने बाराती

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(रवि कुमार भार्गव राज्य को-आर्डिनेटर अयोध्या टाइम्स बिहार) पटना  : छपरा में हुई एक अनोखी शादी इन दिनों काफी सुर्खियों में है। 70 साल का शख्स जब दूल्हा बनकर अपनी दुल्हन को लाने निकला तो इस नजारे को देख लोग हैरान रह गए। गाजे-बाजे के साथ निकाली इस बारात में बड़ी संख्या में लोग डीजे की धुन पर झुमते दिखे। बारातियों में दूल्हे की सात बेटियां और एक बेटा भी शामिल हुए। रथ पर सवार दूल्हा जिस रास्ते से भी गुजरा लोग एक झलक पाने के लिए बेताब नजर आए।दरअसल, करीब 42 साल पहले एकमा के आमदाढ़ी निवासी राजकुमार सिंह की शादी बड़े ही धूमधाम के साथ हुई थी। शादी के बाद पहली बार जब पत्नी मायके गई तो बिना गौना के ही ससुराल चली आई। गौना की रस्म पूरी नहीं हो सकी। 42 साल बाद 5 मई को उनकी सात बेटियों और एक बेटे ने इस दिन को खास बना दिया। जब 70 साल के बुजुर्ग की बारात निकली तो देखने वाले देखते ही रह गए। राजकुमार सिंह बताते हैं कि 42 साल पहले 5 मई को उनकी शादी हुई थी। शादी के 42 साल बाद भी वे अपने ससुराल आमदाढ़ी नहीं गए थे और ना ही गौना की रस्म ही पूरी हो सकी थी। लेकिन 42 साल बाद उनकी बेटी और बेटे ने उस रस्म को पूरा कर