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Showing posts from June, 2019

ऊष्मीय अनुकूलन से कम हो सकती है एअर कंडीशनिंग की मांग

उमाशंकर मिश्र  नई दिल्ली, 21 जून (इंडिया साइंस वायर):गर्मी के मौसम में भारतीय शहरों में एअर कंडीशनिंग का उपयोग लगातार बढ़ रहा है जो ऊर्जा की खपत बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के लिए भी एक चुनौती बन रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए शहरों एवं भवनों को ऊष्मीय अनुकूलन के अनुसार डिजाइन करने से एअर कंडीशनिंग की मांग को कम किया जा सकता है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंट (सीएसई)की आज जारी की गईरिपोर्ट में ये बातें उभरकर आई हैं।इसमें कहा गया है किभारत के प्रत्येक घर में साल में सात महीने एअरकंडीशनर चलाया जाए तो वर्ष 2017-18 के दौरान देश में उत्पादित कुल बिजली की तुलना में बिजली की आवश्यकता 120 प्रतिशत अधिक हो सकती है। यह रिपोर्ट राजधानी दिल्ली में बिजली उपभोग से जुड़े आठ वर्षों की प्रवृत्तियों के विश्लेषण पर आधारित है। रिपोर्ट में दिल्ली में बिजली के 25-30 प्रतिशत वार्षिक उपभोग के लिए अत्यधिक गर्मी को जिम्मेदार बताया गया है। प्रचंड गर्मी के दिनों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। इस वर्ष 7-12 जून के बीच प्रचंड गर्मी की अवधि में दिल्ली में बिजली की ख

अरुणाचल में मिली कछुए कीदुर्लभ प्रजाति

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उमाशंकर मिश्र नई दिल्ली, 26 जून (इंडिया साइंस वायर):भारतीय शोधकर्ताओंको अरुणाचल प्रदेश के जंगलों मेंकछुए की दुर्लभ प्रजाति मनोरिया इम्प्रेसा कीमौजूदगी का पता चला है। यह प्रजाति मुख्य रूप से म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, वियतनाम, कंबोडिया, चीन और मलेशिया में पायी जाती है। पहली बार इस प्रजाति के कछुए भारत में पाए गए हैं। इस प्रजाति के दो कछुए एक नर और एक मादा को निचले सुबनसिरी जिले के याजली वन क्षेत्र में पाया गयाहै।इस खोज के बाद भारत में पाए जाने वाले गैर समुद्री कछुओं की कुल 29 प्रजातियां हो गई हैं।इन कछुओं के शरीर पर पाए जाने वाले नारंगी और भूरे रंग के आकर्षक धब्बे इस प्रजाति के कछुओं की पहचान है। गुवाहाटी की संस्थाहेल्प अर्थ, बेंगलूरू स्थित वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसाइटीऔर अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग केशोधकर्ताओं ने मिलकर यह अध्ययन किया है। वनों में रहने वाले कछुओं की चार प्रजातियां दक्षिण-पूर्व एशिया में पायी जाती हैं, जिनमें मनोरिया इम्प्रेसा शामिल है।नर कछुए का आकार मादा से छोटा है, जिसकी लंबाई 30 सेंटीमीटर है।मनोरिया वंश के कछुए की इस प्रजाति का आकार एशियाई जंगली कछुओं के आकार का एक

खेत में खड़ी फसल की रक्षा के लिए फसल गार्ड का नया अविष्कार

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कन्नौज। बेसहारा जानवरों को लेकर परेशान किसानों के लिए खुशखबरी है। अब खेत में खड़ी फसल की रक्षा के लिए फसल गार्ड मौजूद रहेगा, जो बिल्कुल एक इंसान की तरह काम करेगा। इस फसल गार्ड का आविष्कार जिले के ही एक युवा ने किया है। ये इनोवेटर हैं, ठठिया कस्बे के इनोवेटर जीतू शुक्ला उर्फ अवनि। इन्होंने ही ऐसी डिवाइस बनाई है, जो मवेशियों से फसल को बर्बाद होने से बचाएगी, जिसे श्फसल गार्डश् नाम दिया है। बेसहारा पशुओं से परेशान जीतू के मन में ऐसी डिवाइस बनाने का विचार आया जिससे जानवर खेत में न जा पाएं। दिन-रात मेहनत के बाद आखिर उन्हें सफलता मिली। इस डिवाइस को उन्होंने पेटेंट भी करा लिया है। इसके प्रयोग से किसानों को रात भर जागकर खेतों में खड़ी फसल की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी। जीतू ने इस संबंध परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव समेत अन्य लोगों से भी फसल गार्ड के बारे में चर्चा की है। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को भी फसल गार्ड के बारे में बताया गया है। जीतू बताते है कि उन्होंने इस डिवाइस को खेत में लगाकर इसका डेमो किया है जो सफल रहा है। अब जल्द ही इसका डेमो प्रदेश सरकार के सामने दिखाया जाएगा।

आम की पत्तियों में मिले जंग-रोधी तत्व

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सुशीला श्रीनिवास बेंगलुरु, 25 जून, 2019 (इंडिया साइंस वायर):भारतीय शोधकर्ताओं ने आम की पत्तियों के अर्क से एक ईको-फ्रेंडली जंग-रोधी सामग्री विकसित की है,जिसकी परत लोहे को जंग से बचा सकती है।यह जंग-रोधी सामग्री तिरुवनंतपुरम स्थित राष्ट्रीय अंतर्विषयी विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित की गई है। नई जंग-रोधी सामग्री का परीक्षण वाणिज्यिक रूप से उपयोग होने वाले लोहे पर विपरीत जलवायु परिस्थितियों में करने पर इसमें प्रभावी जंग-रोधक के गुण पाए गए हैं। आमतौर पर,लोहे के क्षरण को रोकने के लिए उस पर पेंट जैसी सिंथेटिक सामग्री की परत चढ़ाई जाती है, जो विषाक्त और पर्यावरण के प्रतिकूल होती है। लेकिन, आम की पत्तियों के अर्क से बनी कोटिंग सामग्री पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है। पेड़-पौधों मेंजैविक रूप से सक्रिय यौगिक (फाइटोकेमिकल्स)पाए जाते हैं जोरोगजनकों एवं परभक्षियों को दूर रखते हैं और पौधों के सुरक्षा तंत्र के रूप में काम करते हैं। शोधकर्ताओं ने पौधों के इन्हीं गुणों का अध्ययन किया है और आम के पौधे में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले फाइटोकेमिकल्स का उपयोग जंग-रोधी पदा

शार्क संरक्षण में महत्वपूर्ण हो सकती है मछुआरों और बाजार की भूमिका

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  शुभ्रता मिश्रा वास्को-द-गामा (गोवा) , 1 8 जून , ( इंडिया साइंस वायर): भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शार्क मछली पालक देश है। लेकिन भारतीय मछुआरे और मछली व्यापारी शार्क संरक्षण संबंधी नियमों से अनजान हैं।   भारतीयमछुआरे प्रायः बड़ी शार्क मछलियां नहीं पकड़ते हैं, बल्कि दूसरी मछलियों को पकड़ने के लिए डाले गए जाल में बड़ी शार्क भी फंसजाती हैं। अधिकतर मछुआरे और व्यापारीजानते हैं कि व्हेल शार्क को पकड़ना गैरकानूनी है। पर, वे अन्य शार्क प्रजातियों, जैसे- टाइगर शार्क, हेमरहेड शार्क, बुकशार्क, पिगी शार्क आदि के लिए निर्धारित राष्ट्रीय शार्क संरक्षण मानकों से अनजान हैं।   शार्क मछलियों को उनके मांस और पंखो के लिए पकड़ा जाता है।शार्क के पंखों के अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति काफी हद तक अनियमित है।भारत में शार्क के मांस के लिए एक बड़ा घरेलू बाजार है। जबकि निर्यात बाजार छोटा है। यहां छोटे आकार और किशोर शार्क के मांस की मांग सबसे ज्यादा है।आमतौर पर एक मीटर से छोटी शार्क मछलियां ही पकड़ी जाती हैं और छोटी शार्क स्थानीय बाजारों में महंगी बिकती हैं।   शार्क संरक्षण को लेकर किये गए एक अध्ययन मे

तिहाड़ जेल यथा नाम तथा काम

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पढ़िए एक पत्रकार का सनसनीखेज कथानक   ● कैदी बन्दी आपस मे कैसा बर्ताव करते है सुना है अंदर फोन वगैरा भी मिलता है ● अंदर लड़की और शराब छोड़ कर हर सुविधा है बस आप उस सुविधा के लायक हों खूब पैसा हो या आप बढ़िया बदमाश हो हर सम्पन्न है जेल आपके लिए. चरस गांजा अफीम स्मैक से लगाकर मोबाइल तक आपके पास रहेगा . कोई सिपाही सेट कर लीजिए आपको सब कुछ लाकर दे देगा.   एक ऐसी जगह जहाँ शायद ही कोई जाना चाहता हो। एक ऐसी जगह जिसे धरती का जीता जागता नरक समझा जाता है। वो घर है जेल, जेल भी ऐसी जो भारत सहित एशिया की बड़ी जेलों में शुमार रखती है। कैसा है वहा का हाल। पुलिस का क्या रवैया रहता है। बंदियों की दिनचर्या कैसी रहती है । आजकल चर्चित पत्रकार मनीष दुबे की तिहाड़ जेल पर लिखी किताब जेल जर्नलिज्म खासा चर्चा में है । इसी कड़ी में दैनिक अयोध्या टाइम्स हिंदी दैनिक के एडिटर इन चीफ श्री ब्रजेश मौर्या ने जर्नलिस्ट मनीष दुबे से उनकी जेल जिंदगी पर विस्तार से बातचीत की और अंदर की दुनिया के हालातों का जायजा लिया पेश है एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ●आज जब जेल जैसी जगह जाने में लोग कांप उठते है वहा से लौटकर उस सब्जेक्ट पर किसी स

रोजाना लगाया जाता सिंदूर का लेप और कुछ घंटे में काले हो जाते हैं हनुमानजी, वजह कहीं ये तो नहीं

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कानपुर,  शहर के प्रसिद्ध सिद्धनाथ मंदिर में शिवलिंग अरघा, हनुमान जी की मूर्ति के साथ ही तांबे का त्रिशूल का रंगा काला होता जा रहा है। रोजाना सफाई और सिंदूर का लेप लगाने के कुछ देर तक सब सही रहता है मगर, कुछ घंटे में ही हनुमानजी का रंग बदलकर काला हो जाता है। इस घटना को लेकर भक्तों में तरह तरह की भ्रांतियां जन्म लेने लगी हैं। मंदिर में अचानक मूर्तियां काली पडऩे से भक्तों में रोष शहर के जाजमऊ में सिद्धनाथ मंदिर विशेष आस्था का केंद्र है। यहां शहर ही नहीं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भक्त दर्शन पूजन के लिए आते हैं। गंगा नदी के किनारे बने इस मंदिर की विशेष मान्यता है। यहां पर शिवलिंग, हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है और दर्शन के लिए रोजाना सैकड़ों भक्तों की भीड़ जुटती है। बीते कुछ महीनों से शिवलिंग का चांदी का अरघा काला पड़ गया है। द्वार पर लगी हनुमानजी की मूर्ति भी काले रंग की हो गई है और तांबे का त्रिशूल का भी रंग बदलकर काला हो रहा है। यहां तक की मंदिर की दीवारों का भी रंग बदल रहा है। रोजाना मंदिर की साफ सफाई की जाती है और हनुमान जी को लाल बंदन का सिंदूर लेप चढ़ाया जाता है। कुछ देर तक रं

वैज्ञानिकों ने उजागर की शीथ ब्लाइट के रोगजनक फफूंद की अनुवांशिक विविधता

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उमाशंकर मिश्र नई दिल्ली, 13 जून (इंडिया साइंस वायर) : भारतीय वैज्ञानिकों ने चावल की फसल के एक प्रमुख रोगजनक फफूंद राइजोक्टोनिया सोलानी की आक्रामकता से जुड़ी अनुवांशिक विविधता को उजागर किया है। नई दिल्ली स्थितराष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में कई जीन्स की पहचान की गई है जो राइजोक्टोनिया सोलानी के उपभेदों में रोगजनक विविधता के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अनुवांशिक जानकारी शीथ ब्लाइट रोग प्रतिरोधी चावल की किस्में विकसित करने में मददगार हो सकती है। इस शोध में राइजोक्टोनिया सोलानी के दो भारतीय रूपों बीआरएस11 और बीआरएस13 की अनुवांशिक संरचना का अध्ययन किया गया है और इनके जीन्स की तुलना एजी1-आईए समूह के राइजोक्टोनिया सोलानीफफूंद के जीनोम से की गई है। एजी1-आईए को पौधों के रोगजनक के रूप में जाना जाता है।   वैज्ञानिकों ने इन दोनों फफूंदों की अनुवांशिक संरचना में कई एकल-न्यूक्लियोटाइड बहुरूपताओं की पहचान की है तथा इनके जीनोम में सूक्ष्म खंडों के जुड़ने और टूटने का पता लगाया है। शोधकर्ताओं ने इन दोनों फफूंदों में विभ

वैज्ञानिकों ने घाव भरने के लिए विकसित किया दही आधारित जैल डॉ अदिति जैन

नई दिल्ली, 11 जून (इंडिया साइंस वायर): दवाओं के खिलाफ बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता के कारण कई बार घावों को भरने के लिए उपयोग होने वाले मरहम बेअसर हो जाते हैं, जिससे मामूली चोट में भी संक्रमण बढ़ने का खतरा रहता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने अब दही आधारित ऐसा एंटीबायोटिक जैल विकसित किया है जो संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने के साथ-साथ तेजी से घाव भरने में मददगार हो सकता है। दही के पानी में जैविक रूप से सक्रिय पेप्टाइड्स होते हैं, जिनका उपयोग इस शोध में उपचार के लिए किया गया है। शोधकर्ताओं ने 10 माइक्रोग्राम पेप्टाइड को ट्राइफ्लूरोएसिटिक एसिड और जिंक नाइट्रेट में मिलाकर हाइड्रोजैल बनाया है। इस जैल की उपयोगिता का मूल्यांकन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता रखने वाले बैक्टीरिया स्टैफिलोकॉकस ऑरियस और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा पर किया गया है। यह हाइड्रोजैल इन दोनों बैक्टीरिया को नष्ट करने में प्रभावी पाया गया है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि स्यूडोमोनास को नष्ट करने के लिए अधिक डोज देने की जरूरत पड़ती है। आईआईटी, खड़गपुर की शोधकर्ता डॉ

नई इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल स्टेम सेल अपटेक में सुधार कर सकती है

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सुशीला श्रीनिवास द्वारा बेंगलुरू, 7 जून (इंडिया साइंस वायर): पुनर्योजी चिकित्सा में स्टेम कोशिकाओं का उपयोग एक चुनौती भरा कार्य है क्योंकि प्रतिरोपित कोशिकाओं के जीवित रहने से जुड़ी समस्याएं हैं। स्टेम सेल, जब एक घाव स्थल पर प्रत्यारोपित किया जाता है, तो पैरासरीन कारकों नामक रसायन छोड़ता है जो ऊतक पुनर्वृद्धि को शुरू करने के लिए आसपास के अन्य कोशिकाओं को उत्तेजित करता है। भारतीय वैज्ञानिकों के एक समूह ने एक इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल विकसित किया है जो प्रत्यारोपण कोशिकाओं को लंबे समय तक जीवित रहने में मदद कर सकता है। Dr . Deepa Ghosh (Centre) withresearch team मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनोसाइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल में मेसेनचाइमल स्टेम सेल (MSC) नामक स्टेम सेल को एनकैप्सुलेटेड्टल सेल बनाने की विधि तैयार की है। प्रारंभिक अध्ययनों में, यह पाया गया है कि हाइड्रोजेल सेल व्यवहार्यता प्रदर्शित करता है और स्टेम कोशिकाओं के दीर्घकालिक अस्तित्व का समर्थन कर सकता है। इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल को सेल्यूलोज और चिटोसन (सीशेल्स में पाया जाने वाला) जैसे प्राकृतिक पदार्

एस्ट्रोसैट जेलीफ़िश आकाशगंगा के दिल में स्थित है

सरिता विग द्वारा तिरुवनंतपुरम, 4 जून (इंडिया साइंस वायर): भारत के अंतरिक्ष वेधशाला, एस्ट्रोसैट पर पराबैंगनी इमेजिंग टेलिस्कोप ने जेलीफ़िश आकाशगंगा के दिल में काम करने की प्रक्रियाओं पर एक अंतर्दृष्टि प्रदान की है। जो201 नामक एक जेलीफ़िश आकाशगंगा के शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसमें एक उज्ज्वल टूटी हुई अंगूठी जैसी उत्सर्जन संरचना से घिरे एक केंद्रीय उज्ज्वल क्षेत्र शामिल हैं। बीच में रखा गया एक गुहा या शून्य है जैसा कि बेहोश पराबैंगनी उत्सर्जन का क्षेत्र है। उज्ज्वल अंगूठी से पराबैंगनी प्रकाश पिछले 200 से 300 मिलियन वर्षों में बने युवा सितारों के कारण है। विभिन्न तरंगों पर अन्य दूरबीनों की छवियों के साथ इसकी तुलना करके, शोधकर्ताओं ने दिखाया कि गुहा युवा सितारों की कमी के कारण है। इसका मतलब है कि इस गुहा क्षेत्र में कम से कम पिछले 100 मिलियन वर्षों से कोई नए सितारे नहीं बने हैं। आकाशगंगाएं गुरुत्वाकर्षण द्वारा धारण किए गए अरबों सितारों के बहुत बड़े समुच्चय हैं। माना जाता है कि मिल्की वे, हमारी होम गैलेक्सी को माना जाता है कि सूर्य के साथ लगभग दस बिलियन

एनई से ऑरेंज ककड़ी विटामिन ए का भंडार है: अध्ययन

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डॉ। अदिति जैन द्वारा  नई दिल्ली, 6 जून (इंडिया साइंस वायर): कृषि वैज्ञानिकों की एक टीम ने पाया है कि देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र से आने वाली नारंगी-मांसल ककड़ी की किस्में सफेद मांस से कैरोटीनॉयड सामग्री (विटामिन-ए) में चार से पांच गुना अधिक समृद्ध होती हैं। देश के अन्य भागों में व्यापक रूप से उगाई जाने वाली किस्में। ऑरेंज-फ्लेशेड खीरे उत्तर-पूर्व के आदिवासी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। फलों का सेवन पकी हुई सब्जी या चटनी के रूप में किया जाता है। लोग इसे 'फंग्मा' और मिज़ोरम में 'हम्ज़िल' और मणिपुर में 'थाबी' कहते हैं। किस्मों ने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया, जब वे नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिसोर्स (NBPGR) में जमा ककड़ी के स्वदेशी जर्मप्लाज्म की विशेषता बता रहे थे। आगे के निरीक्षण पर, उन्होंने पाया कि उन्हें मणिपुर और मिजोरम से एकत्र किया गया था। यह देखते हुए कि पौधों का नारंगी रंग उच्च कैरोटीनॉयड सामग्री के अनुरूप हो सकता है, उन्होंने अपनी विशेषताओं और पोषक तत्व का विस्तार से अध्ययन करने का निर्णय लिया। “बहुत सारे फल उपलब्ध हैं जो बीटा कैरोटीन / कैरोट

वैज्ञानिकों ने बनाया फूलों को सुखाने के लिए नया सोलर ड्रायर

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उमाशंकर मिश्र  नई दिल्ली, 3 जून (इंडिया साइंस वायर): भारत से निर्यात होने वाले फूल उत्पादों में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी सूखे फूलों और पौधों के अलग-अलग भागों की होती है। लेकिन सूखे फूल उत्पादों के वैश्विक बाजार में भारत की भागीदारी सिर्फ पांच प्रतिशत है। भारतीय शोधकर्ताओं ने अब एक सोलर ड्रायर विकसित किया है जो गुलाब और गेंदे जैसे अधिक मूल्यवान फूलों के सौन्दर्य और गुणों को नुकसान पहुंचाए बिनासुखाने में उपयोगी हो सकता है। इस सोलर ड्रायर को विकसित करने वालेशोधकर्ताओं में शामिल नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ पी.के. शर्मा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “सोलर ड्रायर और सीधे धूप में सुखाए गए फूलों के रंग, रूप और आकार का मूल्यांकन करने पर हमने पाया कि बाहरी वातावरण की अपेक्षा सोलर ड्रायर में तापमान स्थिर रहता है। इसमें सुखाने की दर 65 से 70 प्रतिशत तक अधिक पायी गई है। बाहरी तापमान में उतार-चढ़ाव होता रहता और दोपहर के समय तो तापमान सबसे अधिक हो जाता है। इस कारण, खुली धूप में फूलों को सुखाने से उनके रंग, रूप और आकार पर बुरा असर पड़ता है। जबकि, सोलर ड्रायर में फूलों

अदभुत अविश्वसनीय महात्मा सती प्रसाद जी महाराज जो विज्ञान के लिए बने रहस्य---

अमेठी अदभुत अविश्वसनीय महात्मा सती प्रसाद जी महाराज जो विज्ञान के लिए बने रहस्य--- आज के युग में जहां इंसान जंक फूड खा कर अपने स्वस्थ के नुकसान पहुंचा रहा है अगर कोई व्यक्ति बीमारी में डॉक्टर के पास जाता है तो डॉक्टर उन्होंने साफ पानी पीने सलह देते हैं और साफ-सुथरा भोजन करने की सलाह देते हैं वहीं इस मामले में एक महात्मा ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवन का आधा से ज्यादा समय सिर्फ नदी का पानी कंकड़ नदी की बालू मिट्टी खाकर बिताया है आज यह विज्ञान के लिए एक चुनौती है| https://www.youtube.com/watch?v=5DOI5ZT8CPE&feature=youtu.be आज न्यूज़ कवरेज के दौरान एक ऐसे संत महापुरुष से भेंट हुई जिन्होंने अपने जीवन के लगभग 100 वर्ष गोमती नदी के किनारे और पूरे देश के भर्मण में लगा दिया ग्रामीणों की माने तो उनसे देश का कोई भी तीर्थ स्थल बाकी नहीं जहां वह ना गए हो और वह महात्मा नेपाल भूटान बर्मा देश का भी पैदल यात्रा कर चुके हैं। लोकसभा क्षेत्र अमेठी की पावन धरती पर जन्मे संत श्री सती प्रसाद जी महाराज जोकि विज्ञान को कड़ी चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने अपने जीवन का आधे से ज्यादा हिस्सा कंकड़ पत्थर मिट्टी ब