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Wednesday, June 26, 2019

ऊष्मीय अनुकूलन से कम हो सकती है एअर कंडीशनिंग की मांग

उमाशंकर मिश्र


 नई दिल्ली, 21 जून (इंडिया साइंस वायर):गर्मी के मौसम में भारतीय शहरों में एअर कंडीशनिंग का उपयोग लगातार बढ़ रहा है जो ऊर्जा की खपत बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के लिए भी एक चुनौती बन रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए शहरों एवं भवनों को ऊष्मीय अनुकूलन के अनुसार डिजाइन करने से एअर कंडीशनिंग की मांग को कम किया जा सकता है।


सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंट (सीएसई)की आज जारी की गईरिपोर्ट में ये बातें उभरकर आई हैं।इसमें कहा गया है किभारत के प्रत्येक घर में साल में सात महीने एअरकंडीशनर चलाया जाए तो वर्ष 2017-18 के दौरान देश में उत्पादित कुल बिजली की तुलना में बिजली की आवश्यकता 120 प्रतिशत अधिक हो सकती है। यह रिपोर्ट राजधानी दिल्ली में बिजली उपभोग से जुड़े आठ वर्षों की प्रवृत्तियों के विश्लेषण पर आधारित है। रिपोर्ट में दिल्ली में बिजली के 25-30 प्रतिशत वार्षिक उपभोग के लिए अत्यधिक गर्मी को जिम्मेदार बताया गया है। प्रचंड गर्मी के दिनों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। इस वर्ष 7-12 जून के बीच प्रचंड गर्मी की अवधि में दिल्ली में बिजली की खपत में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है जो इस मौसम में होने वाली औसत बिजली की खपत की तुलना में काफी अधिक है।


भविष्य में यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल सकती है क्योंकि ताप सूचकांक और जलवायु परिवर्तन का दबाव देशभर में लगातार बढ़ रहा है। भारत का ताप सूचकांक 0.56 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। गर्मी (मार्च-मई) और मानसून (जून-सितंबर) के दौरान ताप सूचकांक में प्रति दशक वृद्धि दर 0.32 डिग्री सेल्सियस देखी गई है। ताप सूचकांक में बढ़ोत्तरी बीमारियों के संभावित खतरों का संकेत करती है।गर्मी के मौसम में देश के दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों (आंध्रप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु) और मानसून में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (गंगा के मैदानी भाग और राजस्थान) में यह खतरा सबसे अधिक हो सकता है।


इस रिपोर्ट के लेखक अविकल सोमवंशी ने बताया कि “ऊर्जा दक्षता ब्यूरो का अनुमान है कि एअर कंडीशनरों के उपयोग से कुल कनेक्टेड लोड वर्ष 2030 तक 200 गीगावाट हो सकता है। यहां कनेक्टेड लोड से तात्पर्य सभी विद्युत उपकरणों के संचालन में खर्च होने वाली बिजली से है। ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष  2015 में उपकरणों का कुल घरेलू कनेक्टेड लोड 216 गीगावाट था। इसका अर्थ है कि जितनी बिजली आज सभी घरेलू उपकरणों पर खर्च होती है, उतनी बिजली वर्ष 2030 में सिर्फ एअरकंडीशनर चलाने में खर्च हो सकती है।”


इस अध्ययन में पता चला है कि 25-32 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर बिजली की खपत में अधिक वृद्धि नहीं होती। पर, तापमान 32 डिग्री से अधिक होने से बिजली की मांग बढ़ जाती है, जिसके लिए ठंडा करने वाले यांत्रिक उपकरणों का अत्यधिक उपयोग और कम दक्षता से उपयोग जिम्मेदार हो सकता है।


सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी ने बताया कि “अत्यधिक गर्मी सेनिजात पाने के लिए व्यापक स्तर पर वास्तु डिजाइन के अलावा शीतलन से जुड़ी मिश्रित पद्धतियों को प्रोत्साहित करने जरूरत है। इन पद्धतियों में कम बिजली खपतएवं ऊर्जा दक्षता वाले उपकरणों का उपयोग प्रमुखता से शामिल है। ऐसा न करने पर जलवायु परिवर्तन के शमन और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े भारत के प्रयासों को गहरा धक्का लग सकता है।”


रिपोर्ट बताती है कि यह स्थिति राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान के लक्ष्यों को निष्प्रभावी कर सकती है।भारत पहले ही ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है, जहां एअर कंडीशनिंग की शहरी पैठ 7-9 प्रतिशत है, और 2016-17 में (भारत ऊर्जा सांख्यिकी रिपोर्ट 2018 के अनुसार) बिजली की घरेलू मांग कुल बिजली खपत का 24.32 प्रतिशत थी।राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान का कहना है कि सभी भवनों के निर्माण में ऊष्मीय अनुकूलन के मापदंडों पर अमल करना जरूरी है और सस्ते आवासीय क्षेत्र को भी इस दायरे में शामिल किया जाना चाहिए।(इंडिया साइंस वायर)


अरुणाचल में मिली कछुए कीदुर्लभ प्रजाति

उमाशंकर मिश्र


नई दिल्ली, 26 जून (इंडिया साइंस वायर):भारतीय शोधकर्ताओंको अरुणाचल प्रदेश के जंगलों मेंकछुए की दुर्लभ प्रजाति मनोरिया इम्प्रेसा कीमौजूदगी का पता चला है। यह प्रजाति मुख्य रूप से म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, वियतनाम, कंबोडिया, चीन और मलेशिया में पायी जाती है। पहली बार इस प्रजाति के कछुए भारत में पाए गए हैं।


इस प्रजाति के दो कछुए एक नर और एक मादा को निचले सुबनसिरी जिले के याजली वन क्षेत्र में पाया गयाहै।इस खोज के बाद भारत में पाए जाने वाले गैर समुद्री कछुओं की कुल 29 प्रजातियां हो गई हैं।इन कछुओं के शरीर पर पाए जाने वाले नारंगी और भूरे रंग के आकर्षक धब्बे इस प्रजाति के कछुओं की पहचान है।


गुवाहाटी की संस्थाहेल्प अर्थ, बेंगलूरू स्थित वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसाइटीऔर अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग केशोधकर्ताओं ने मिलकर यह अध्ययन किया है।


वनों में रहने वाले कछुओं की चार प्रजातियां दक्षिण-पूर्व एशिया में पायी जाती हैं, जिनमें मनोरिया इम्प्रेसा शामिल है।नर कछुए का आकार मादा से छोटा है, जिसकी लंबाई 30 सेंटीमीटर है।मनोरिया वंश के कछुए की इस प्रजाति का आकार एशियाई जंगली कछुओं के आकार का एक-तिहाई है। मध्यम आकार के ये कछुए कम से कम 1300 मीटर की ऊंचाई वाले पर्वतीय जंगलों और नम क्षेत्रों में पाए जाते हैं।


हेल्प अर्थ से जुड़े जयदित्य पुरकायस्थ ने बताया कि “इस प्रजाति का संबंध मनोरिया वंश के कछुओं से है। मनोरिया वंश के कछुओं की सिर्फ दो प्रजातियां मौजूद हैं। इसमें से सिर्फ एशियाई जंगली कछुओं के भारत में पाए जाने की जानकारी अब तक थी। इस खोज के बाद इम्प्रेस्ड कछुओं का नाम भी इसमें जुड़ गया है।”


इस प्रजाति के कछुओं के मिलने के बाद अरुणाचल प्रदेश को कछुआ संरक्षण से जुड़े देश के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कियह खोज उत्तर-पूर्वी भारत में, विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में उभयचर और रेंगने वाले जीवों के व्यापक सर्वेक्षण के महत्व को रेखांकित करती है।


अध्ययनकर्ताओं की टीम में डॉ पुरकायस्थ के अलावा वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के डॉ शैलेंद्र सिंह तथाअर्पिता दत्ता और अरुणाचल प्रदेश वन विभाग के बंटी ताओ एवं डॉ भारत भूषण भट्टशामिल थे।(इंडिया साइंस वायर)



कछुए की मनोरिया इम्प्रेसा प्रजाति



डॉ शैलेंद्र सिंह और डॉ जयदित्य पुरकास्थ


 


 


 


 


 


खेत में खड़ी फसल की रक्षा के लिए फसल गार्ड का नया अविष्कार


कन्नौज। बेसहारा जानवरों को लेकर परेशान किसानों के लिए खुशखबरी है। अब खेत में खड़ी फसल की रक्षा के लिए फसल गार्ड मौजूद रहेगा, जो बिल्कुल एक इंसान की तरह काम करेगा। इस फसल गार्ड का आविष्कार जिले के ही एक युवा ने किया है। ये इनोवेटर हैं, ठठिया कस्बे के इनोवेटर जीतू शुक्ला उर्फ अवनि। इन्होंने ही ऐसी डिवाइस बनाई है, जो मवेशियों से फसल को बर्बाद होने से बचाएगी, जिसे श्फसल गार्डश् नाम दिया है।
बेसहारा पशुओं से परेशान जीतू के मन में ऐसी डिवाइस बनाने का विचार आया जिससे जानवर खेत में न जा पाएं। दिन-रात मेहनत के बाद आखिर उन्हें सफलता मिली। इस डिवाइस को उन्होंने पेटेंट भी करा लिया है। इसके प्रयोग से किसानों को रात भर जागकर खेतों में खड़ी फसल की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी। जीतू ने इस संबंध परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव समेत अन्य लोगों से भी फसल गार्ड के बारे में चर्चा की है। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को भी फसल गार्ड के बारे में बताया गया है। जीतू बताते है कि उन्होंने इस डिवाइस को खेत में लगाकर इसका डेमो किया है जो सफल रहा है। अब जल्द ही इसका डेमो प्रदेश सरकार के सामने दिखाया जाएगा।
सोलर ऊर्जा से चलने वाली ये डिवाइस खेत के पास लगाई जाएगी। इसमें सेंसर और कैमरा भी लगा है। थ्री-डी मैङ्क्षपग के तहत काम करने वाली इस डिवाइस में पहले से ही उन जानवरों की इमेज अपलोड कर दी गई है, जो फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। डिवाइस लगाने के दौरान किसान इसमें फसल का क्षेत्रफल मार्क करेगा। मार्क क्षेत्रफल में जैसे ही मवेशी घुसने का प्रयास करेगा, वैसे ही डिवाइस से कुछ किरणें और आवाज निकलेगी, जो थ्री-डी इफेक्ट देंगी और जानवर भयभीत होकर भाग जाएगा। उसे भी नुकसान नहीं पहुंचेगा। इस डिवाइस के रडार पर 50 बीघा तक का क्षेत्रफल रहेगा। इसे फसल के हिसाब से ऊंचाई पर लगाना होगा। इसे चोरी भी नहीं किया जा सकेगा।
जीतू इससे पहले भी किसान रोबोट मित्र समेत कई कई डिवाइस बनाकर उत्तर प्रदेश सरकार के नव प्रवर्तन दल से सेंसरमैन की उपाधि पा चुके हैं। गरीब परिवार मे पले जीतू के पिता देवेंद्र शुक्ला रेडियो मैकेनिक हैं। काम में उनका हाथ बटाते बटाते वह भी रेडियो तकनीक में हुनरमंद हो गए। जीतू ने यूपी बोर्ड से हाईस्कूल करने के बाद आइटीआइ से तकनीकी शिक्षा हासिल की। उन्होंने डिजिटल बाइक सिक्योरिटी डिवाइस, ऑन स्पॉट क्रिमिनल ट्रैकर, किसान रोबोट मित्र, चाइल्ड सेफ्टी डिवाइस भी बनाई है।


आम की पत्तियों में मिले जंग-रोधी तत्व


सुशीला श्रीनिवास


बेंगलुरु, 25 जून, 2019 (इंडिया साइंस वायर):भारतीय शोधकर्ताओं ने आम की पत्तियों के अर्क से एक ईको-फ्रेंडली जंग-रोधी सामग्री विकसित की है,जिसकी परत लोहे को जंग से बचा सकती है।यह जंग-रोधी सामग्री तिरुवनंतपुरम स्थित राष्ट्रीय अंतर्विषयी विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित की
गई है।


नई जंग-रोधी सामग्री का परीक्षण वाणिज्यिक रूप से उपयोग होने वाले लोहे पर विपरीत जलवायु परिस्थितियों में करने पर इसमें प्रभावी जंग-रोधक के गुण पाए गए हैं। आमतौर पर,लोहे के क्षरण को रोकने के लिए उस पर पेंट जैसी सिंथेटिक सामग्री की परत चढ़ाई जाती है, जो विषाक्त और पर्यावरण के प्रतिकूल होती है। लेकिन, आम की पत्तियों के अर्क से बनी कोटिंग सामग्री पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है।


पेड़-पौधों मेंजैविक रूप से सक्रिय यौगिक (फाइटोकेमिकल्स)पाए जाते हैं जोरोगजनकों एवं परभक्षियों को दूर रखते हैं और पौधों के सुरक्षा तंत्र के रूप में काम करते हैं। शोधकर्ताओं ने पौधों के इन्हीं गुणों का अध्ययन किया है और आम के पौधे में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले फाइटोकेमिकल्स का उपयोग जंग-रोधी पदार्थ विकसित करने के लिए किया है।



डॉ के.जी. निशांत, कृष्णप्रिया के.वी., नित्या जे., रोशिमा के., तेजस पी.के.


शोधकर्ताओं ने एथेनॉल के उपयोग से आम की सूखी पत्तियों सेफाइटोकेमिकल्स प्राप्त किया है क्योंकि सूखी पत्तियों में अधिक मात्रा में मेंजैविक रूप से सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। इसके बादपत्तियों के अर्क की अलग-अलग मात्रा का वैद्युत-रासायनिक विश्लेषण किया गया है। 200 पीपीएम अर्क के नमूनों में सबसे अधिक जंग-रोधी गुण पाए गए हैं।


अध्ययनकर्ताओं में शामिल डॉ निशांत के. गोपालन ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “इस शोध में हमें पता चला है कि जैविक रूप से सक्रिय तत्व मिलकर एक खास कार्बधात्विक यौगिक बनाते हैं, जिनमें जंग-रोधक गुणहोते हैं।”


पत्तियों के अर्क में जंग-रोधी गुणों का परीक्षण जैव-रासायनिक प्रतिबाधा स्पेक्ट्रोस्कोपी और लोहे की सतह पर जंग का मूल्यांकन एक्स-रे फोटो-इलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रोस्कोपी से किया गया है। इस तरह, शोधकर्ताओं को जैविक रूप से सक्रिय तत्वों की जंग-रोधी भूमिका के बारे में पता चला है। इस कोटिंग सामग्री को 99 प्रतिशत तक जंग-रोधी पाया गया है जो आम के पत्तों के अर्क के जंग-रोधक गुणों को दर्शाता है।


लोहे पर सिर्फ अर्क की परत टिकाऊनहीं हो सकती।इसीलिए, शोधकर्ताओं ने अर्क को सिलिका के साथ मिलाकर मिश्रण तैयार किया गया है। इस मिश्रण को एक प्रकार की गोंद एपॉक्सी में मिलाकर कोटिंग सामग्री तैयार की गई है।


प्रमुख शोधकर्ता कृष्णप्रिया के. विदु ने कहा कि "हम विभिन्न तापमान और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार आम की पत्तियों के अर्क का परीक्षण करना चाहते हैं। हमारी टीम अब इस उत्पाद के स्थायित्व का परीक्षण करने के लिए आगे प्रयोग करने की योजना बना रही है। दूसरी मिश्रित धातुओं पर भी इसकी उपयोगिता का परीक्षण किया जा सकता है।"


शोधकर्ताओं में डॉ निशांत के. गोपालन और कृष्णप्रिया विदु के अलावा तेजस पेरिनगट्टू कलारीक्कल और नित्या जयकुमार शामिल थे। यह अध्ययन शोध पत्रिका एसीएस ओमेगा में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)


 


Tuesday, June 18, 2019

शार्क संरक्षण में महत्वपूर्ण हो सकती है मछुआरों और बाजार की भूमिका

 


शुभ्रता मिश्रा


वास्को-द-गामा (गोवा), 18 जून, (इंडिया साइंस वायर):भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शार्क मछली पालक देश है। लेकिन भारतीय मछुआरे और मछली व्यापारी शार्क संरक्षण संबंधी नियमों से अनजान हैं।


 


भारतीयमछुआरे प्रायः बड़ी शार्क मछलियां नहीं पकड़ते हैं, बल्कि दूसरी मछलियों को पकड़ने के लिए डाले गए जाल में बड़ी शार्क भी फंसजाती हैं। अधिकतर मछुआरे और व्यापारीजानते हैं कि व्हेल शार्क को पकड़ना गैरकानूनी है। पर, वे अन्य शार्क प्रजातियों, जैसे- टाइगर शार्क, हेमरहेड शार्क, बुकशार्क, पिगी शार्क आदि के लिए निर्धारित राष्ट्रीय शार्क संरक्षण मानकों से अनजान हैं।


 


शार्क मछलियों को उनके मांस और पंखो के लिए पकड़ा जाता है।शार्क के पंखों के अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति काफी हद तक अनियमित है।भारत में शार्क के मांस के लिए एक बड़ा घरेलू बाजार है। जबकि निर्यात बाजार छोटा है। यहां छोटे आकार और किशोर शार्क के मांस की मांग सबसे ज्यादा है।आमतौर पर एक मीटर से छोटी शार्क मछलियां ही पकड़ी जाती हैं और छोटी शार्क स्थानीय बाजारों में महंगी बिकती हैं।


 


शार्क संरक्षण को लेकर किये गए एक अध्ययन में ये बातें उभरकर आई हैं।अशोका यूनिवर्सिटी, हरियाणा, जेम्स कुक यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रेलिया और एलेस्मो प्रोजेक्ट, संयुक्त अरब अमीरात के वैज्ञानिकों द्वारा किए गएइस अध्ययन में शार्क व्यापार के दो प्रमुख केंद्रों गुजरात के पोरबंदर और महाराष्ट्र के मालवन में सर्वेक्षण किया गया है।भारत में शार्क मछलियां पकड़ने में गुजरात और महाराष्ट्र का कुल 54 प्रतिशत योगदान है। शार्क मछलियां पकड़ने के लिए पोरबंदर में 65 प्रतिशत ट्राल नेटों और मालवन में 90 प्रतिशत गिलनेटों सहित हुक ऐंड लाइन मत्स्यपालन विधि का उपयोग होता है।


 


अध्ययन से जुड़ीं अशोका यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डॉ. दिव्या कर्नाड ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “बड़ी शार्क मछलियों की संख्या में लगातार गिरावट की जानकारी ज्यादातर मछुआरों और व्यापारियों को है और शार्क व्यापारी स्थानीय नियमों का पालन भीकरते हैं। लेकिन,भारत में शार्क मछलियों की संख्या में गिरावट के सही मूल्यांकन के लिए बड़े पैमाने परशोध करने होंगे।”


शोधकर्ताओं के अनुसार, पिछले दस सालों में शार्क पंखों की अंतरराष्ट्रीय बिक्री में 95 प्रतिशत तक गिरावट हुई है।  उत्तर-पश्चिमी भारत में शार्क मछलियों की संख्या और आकार में लगातार गिरावट का आर्थिक असर मछुआरों और मछली व्यापारियों पर पड़ रहा है।अध्ययन के आंकड़े स्थानीय मछुआरों, नौका मालिकों, खुदरा विक्रेताओं और मछली व्यापारियों से साक्षात्कार के आधार पर एकत्रित किए गए।


अध्ययन से पता चला है कि मछली पकड़ना भारतीय मछुआरों का प्राथमिक व्यवसाय है और शार्क व्यापार सिर्फ अतिरिक्त आमदनी का जरिया है। व्यापारी पूरी शार्क एक जगह से ही खरीदते हैं। लेकिन, उसके पंख और मांस अलग- अलग बेचते हैं। पंख बड़े मछली व्यापारियों और ताजा मांस स्थानीय बाजार में बेचा जाता है। शार्क के पंखमालवन से मडगांव और मंगलूरु जैसे दो प्रमुख मछली व्यापार केंद्रों से होते हुए अंततः चीन और जापान में भेजे जाते हैं। इसी तरह, पोरबंदर से ओखा, वैरावल, मुम्बई, कालीकट और कोच्चि से होते हुए सिंगापुर, हांगकांग और दुबई व आबूधाबी तक शार्क के पंख भेजे जाते हैं। शार्क मछलियों के पंखोंका उपयोगचीन, जापान, इंडोनेशियाऔर थाइलैंड जैसे देशों में सूप बनाने और दवाओं में होता है।


महासागर की सबसे बड़ी परभक्षी मछलियों शामिल शार्क की लगभग 4000 प्रजातियां है। भारत में शार्क प्रजातियों के पकड़ने के साथ साथ उनकेसंरक्षण संबंधी नियमों कोकड़ाई से लागू करनेके लिएसभी राज्योंके मत्स्य पालन विभागों, वन विभाग और समुद्री पुलिस के एक संयुक्त समन्वयितप्रयास की आवश्यकता है।स्थानीय मछुआरों एवं व्यापारियों में शार्क प्रबंधन और संरक्षण के प्रति जागरूकता भी कारगर हो सकती है।


यह अध्ययन एम्बिओ जर्नल में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं में डॉ. दिव्या कर्नाड के अलावा दीपानी सुतारिया और रीमा डब्ल्यू. जाबाडो भी शामिल थे। (इंडिया साइंस वायर)



मछली बाजार में शोधार्थियों के साथ डॉ. दिव्या कर्नाड



छोटी शार्क मछलियां



बड़ी शार्क


तिहाड़ जेल यथा नाम तथा काम

पढ़िए एक पत्रकार का सनसनीखेज कथानक


 


कैदी बन्दी आपस मे कैसा बर्ताव करते है सुना है अंदर फोन वगैरा भी मिलता है
● अंदर लड़की और शराब छोड़कर हर सुविधा है बस आप उस सुविधा के लायक हों खूब पैसा हो या आप बढ़िया बदमाश हो हर सम्पन्न है जेल आपके लिए. चरस गांजा अफीम स्मैक से लगाकर मोबाइल तक आपके पास रहेगा . कोई सिपाही सेट कर लीजिए आपको सब कुछ लाकर दे देगा.


 



एक ऐसी जगह जहाँ शायद ही कोई जाना चाहता हो। एक ऐसी जगह जिसे धरती का जीता जागता नरक समझा जाता है। वो घर है जेल, जेल भी ऐसी जो भारत सहित एशिया की बड़ी जेलों में शुमार रखती है। कैसा है वहा का हाल। पुलिस का क्या रवैया रहता है। बंदियों की दिनचर्या कैसी रहती है । आजकल चर्चित पत्रकार मनीष दुबे की तिहाड़ जेल पर लिखी किताब जेल जर्नलिज्म खासा चर्चा में है । इसी कड़ी में दैनिक अयोध्या टाइम्स हिंदी दैनिक के एडिटर इन चीफ श्री ब्रजेश मौर्या ने जर्नलिस्ट मनीष दुबे से उनकी जेल जिंदगी पर विस्तार से बातचीत की और अंदर की दुनिया के हालातों का जायजा लिया
पेश है एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
●आज जब जेल जैसी जगह जाने में लोग कांप उठते है वहा से लौटकर उस सब्जेक्ट पर किसी से चर्चा नही चलाता आप ने जेल जर्नलिज्म जैसी बुक लिख डाली.
मैं भी कांप रहा था जब जेल जा रहा था बाकी अब ये सोचता हूँ कि जेल एक ऐसी जगह है जहाँ सबको एक बार जाना चाहिए. दुनिया की हर रुबाइयों से पर्दा उठ जाता है.
●जेल जाकर किताब लिखने का आईडिया दिमाग मे कब और कैसे आया.
हां ये अच्छा सवाल किया आपने(हंसते हुए) जेल मैं 2012 में 4 जनवरी को गया. दिल्ली में कुछ अननोन आताताइयों की वजह से मुनासिब हुआ था वहां जाना. दिल्ली की एक प्रतिष्टित मीडिया पत्रिका में काम कर रहा था. वहां भी नया नया जॉइन किया था अतएव हाथ खड़े कर दिए तब नियति मान कर चल दिया. साल के आखिर में जमानत हुई छूटकर घर आया 2014 में शादी हो गई एक बेटी हुई सब कुछ भूल भालकर अपनी दुनिया मे मगन था कि फिर उसी केस में सजा हो जाती है तब कीड़ा उठा कि यार ये क्या कर लिया जो लिखा था वो दिखा ही नही अगर दिखाता तो ये आज शायद ना होता. आधी किताब तब उसी कस्टडी में लिख ली थी फिर लिखी वहां से 2018 मध्य में बरी हुआ. फिर बाहर आकर टाइपिंग वाइपिंग करके छपवा मारी .
●सुना है किताब दो पार्ट में है.
जी ये एक नावेल है जो दो भागों में पढ़ने को मिलेगा. ये नावेल जब प्रकाशित हो रही थी तो कुछ सबा साढ़े चार सौ पेजो की हो रही थी. मुझे लगा अबे ये तो ग्रन्थ टाइप हो जाएगा पढ़ेगा कौन. तब पब्लिशर ने आईडिया दिया। भारतीय साहित्य संग्रह(पुस्तक.ऑर्ग) के संस्थापक अम्बरीष शुक्ला जी जो हमारे फैमिली मेम्बर जैसे ही है उन्होंने कहा यार इसे दो भागों में करो.दोनों कस्टडी को अलग अलग दिखाओ. तब ये पार्टबन्दी में हो गई.



●अमर जो किरदार है नावेल का कैसे देखता है बाहर की अपेछा अंदर की दुनिया को.
बहोत ही बुरा. अमर तड़पता है छटपटाता है अपनी पहली दो रातें रोकर गुजरता है हर घड़ी दर्द बिल्कुल अलग लोग बेतहाशा गालियां हर चेहरा अक्रूर हर तरफ अय्यार टाइप के लोग, जिन पर आप भरोसा ना कर सको और ना ही करना ही चाहे. अच्छे लोग भी मिलते है ऐसा नही पर हर तरफ की बुराइयों के बीच वो अंतर्ध्यान रहते हैं.
●नावेल मैंने भी पढ़ी है एक जगह आपने एक जेल गीत लिखा है जिसे आपने कोलावेरी डी नाम दिया है वो कहाँ से मिला.


ये गीत मैं अक्सर किसी ना किसी से वहां सुना करता था जिसे गाकर कैदी बन्दी अपनी एक तरह से भड़ास निकालते थे प्रशाशन सरकार के खिलाफ तो मुझे लगा यार ये पूरा कोई सुनाने वाला मिल जाये तो इसको अपनी बुक में शामिल कर लूं. इसके चलते मुझे कइयों के तेल लगाना पड़ा किसी ने नही बताया . फिर एक बन्दी मिला जिसने बिना तेल के ही लिखवा दिया.


https://www.youtube.com/watch?v=MdHUMgPVn8Q



●नावेल में गालियों का बहुलता से इस्तेमाल किया गया है.
ये कहानी की डिमांड थी.अब आप बताइए जेल जैसी विषयवस्तु की कल्पना गालियों बगैर पूरी भी कहा है. सब मीठा मीठा गप्प अपन को आता नहीं.
●प्रशाशन कैसा व्यवहार करता है अंदर.
प्रशाशन तो दुस्सासन है वहा का ना पता कब चीरहरण कर दे इसलिए बचा सम्भाल के रखना पड़ता है खुद को. बिल्कुल तानाशाहों वाला रवैया हर बन्दी कैदी को काटनेकी रोज नई नई तरकीबें इजादते रहते है। .
बुरा बर्ताव जरा जरा सी गलती पे जानवरों की तरह पिटाई. थर्ड डिग्री टॉर्चर हाथपैर बांधकर स्टैंड में टाँग दिया जाता है जिसे झूला कहते है लट्ठ बरसाए जाते है. भिन्न भिन्न उपनामो वाले जल्लाद सरीखे दिखती है जेल पुलिस।


https://www.youtube.com/channel/UClidKi9vEaXzdmtNMeSuNsA मंडल ब्यूरो, ब्यूरो, पत्रकार, छायाकार व मित्रों से अनुरोध है कि समाचार पत्र को बढ़ाने हेतु यूट्यूब चैनल को ज्यादा से ज्यादा सबस्क्राइब करें।


Friday, June 14, 2019

रोजाना लगाया जाता सिंदूर का लेप और कुछ घंटे में काले हो जाते हैं हनुमानजी, वजह कहीं ये तो नहीं


कानपुर,  शहर के प्रसिद्ध सिद्धनाथ मंदिर में शिवलिंग अरघा, हनुमान जी की मूर्ति के साथ ही तांबे का त्रिशूल का रंगा काला होता जा रहा है। रोजाना सफाई और सिंदूर का लेप लगाने के कुछ देर तक सब सही रहता है मगर, कुछ घंटे में ही हनुमानजी का रंग बदलकर काला हो जाता है। इस घटना को लेकर भक्तों में तरह तरह की भ्रांतियां जन्म लेने लगी हैं।


मंदिर में अचानक मूर्तियां काली पडऩे से भक्तों में रोष


शहर के जाजमऊ में सिद्धनाथ मंदिर विशेष आस्था का केंद्र है। यहां शहर ही नहीं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भक्त दर्शन पूजन के लिए आते हैं। गंगा नदी के किनारे बने इस मंदिर की विशेष मान्यता है। यहां पर शिवलिंग, हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है और दर्शन के लिए रोजाना सैकड़ों भक्तों की भीड़ जुटती है। बीते कुछ महीनों से शिवलिंग का चांदी का अरघा काला पड़ गया है।


द्वार पर लगी हनुमानजी की मूर्ति भी काले रंग की हो गई है और तांबे का त्रिशूल का भी रंग बदलकर काला हो रहा है। यहां तक की मंदिर की दीवारों का भी रंग बदल रहा है। रोजाना मंदिर की साफ सफाई की जाती है और हनुमान जी को लाल बंदन का सिंदूर लेप चढ़ाया जाता है। कुछ देर तक रंग लाल रहता है लेकिन बाद में हनुमानजी की मूति काले रंग की हो जाती है। इस घटना के बाद से तरह तरह की भ्रांतियों के जन्म लेने के साथ लोगों में रोष भी पनप रहा है।


ये मानी जा रही वजह


मंदिर मूर्ति और अरघा काला पडऩे से भक्तों में बेहद रोष है। इसके पीछे गंगा घाट के किनारे नाले में जमा जहरीला सीवरेज के प्रदूषण को कारण माना जा रहा है। बुढिय़ाघाट और वाजिदपुर में नाला जल निगम ने टैप किया था। वाजिदपुर नाला की टैङ्क्षपग की बोरियां हटने से केमिकलयुक्त सीवरेज बहकर सिद्धनाथ घाट के आगे तक पहुंच गया है। इससे घाट किनारे एक बड़े नाले की शक्ल ले ली है। यहां एक माह से अधिक समय से नाले का सीवरेज जमा है, जिससे अत्यधिक दुर्गंध व गैस उठती है। सीवरेज का रंग भी लाल, हरा व काला हो गया है। माना जा रहा है इस जहरीली गैस के प्रभाव से सिद्धनाथ मंदिर में शिवङ्क्षलग का अरघा, हनुमानजी की मूर्ति और त्रिशूल काला पड़ रहा है। हैंडपंप से आने वाला पानी भी दूषित हो चुका है। यहां आने वाली महिलाओं की पायल व अंगूठियां भी काली पड़ रही हैं।


Thursday, June 13, 2019

वैज्ञानिकों ने उजागर की शीथ ब्लाइट के रोगजनक फफूंद की अनुवांशिक विविधता

उमाशंकर मिश्र



नई दिल्ली, 13 जून (इंडिया साइंस वायर) : भारतीय वैज्ञानिकों ने चावल की फसल के एक प्रमुख रोगजनक फफूंद राइजोक्टोनिया सोलानी की आक्रामकता से जुड़ी अनुवांशिक विविधता को उजागर किया है। नई दिल्ली स्थितराष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में कई जीन्स की पहचान की गई है जो राइजोक्टोनिया सोलानी के उपभेदों में रोगजनक विविधता के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अनुवांशिक जानकारी शीथ ब्लाइट रोग प्रतिरोधी चावल की किस्में विकसित करने में मददगार हो सकती है।


इस शोध में राइजोक्टोनिया सोलानी के दो भारतीय रूपों बीआरएस11 और बीआरएस13 की अनुवांशिक संरचना का अध्ययन किया गया है और इनके जीन्स की तुलना एजी1-आईए समूह के राइजोक्टोनिया सोलानीफफूंद के जीनोम से की गई है। एजी1-आईए को पौधों के रोगजनक के रूप में जाना जाता है।


 


वैज्ञानिकों ने इन दोनों फफूंदों की अनुवांशिक संरचना में कई एकल-न्यूक्लियोटाइड बहुरूपताओं की पहचान की है तथा इनके जीनोम में सूक्ष्म खंडों के जुड़ने और टूटने का पता लगाया है। शोधकर्ताओं ने इन दोनों फफूंदों में विभिन्न जीन्स अथवा जीन परिवारों के उभरने और उनके विस्तार को दर्ज किया है, जिससे राइजोक्टोनिया सोलानीके भारतीय उपभेदों में तेजी से हो रहे क्रमिक विकास का पता चलता है।


 


इस अध्ययन का नेतृत्व कर रहे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ गोपालजी झा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “शीथ ब्लाइट के नियंत्रण के लिए प्राकृतिक स्रोतों के अभाव में इस रोग के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता रखने वाली चावल की किस्मों का विकास कठिन है। हम चावल की फसल और राइजोक्टोनिया सोलानी फफूंद से जुड़ी आणविक जटिलताओं को समझना चाहते हैं ताकि शीथ ब्लाइट बीमारी के नियंत्रण की रणनीति विकसित की जा सके।”


राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान में शोधकर्ताओं की टीम


राइजोक्टोनिया सोलानीके कारण होने वाली शीथ ब्लाइट बीमारी चावल उत्पादन से जुड़े प्रमुख खतरों में से एक है। इस फफूंद के अलग-अलग रूप विभिन्न कवक समूहों से संबंधित हैं जो चावल समेत अन्य फसलों को नुकसान पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। चावल की फसल में इस फफूंद को फैलने की अनुकूल परिस्थितियां मिल जाएं तो फसल उत्पादन 60 प्रतिशत तक गिर सकता है। शीथ ब्लाइट पर नियंत्रण का टिकाऊ तरीका न होना दीर्घकालिक चावल उत्पादन और खाद्यान्न सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख चुनौती है।



डॉ झा ने बताया कि “राइजोक्टोनिया सोलानीके जीन्स के अधिक अध्ययन से इस फफूंद की रोगजनक भूमिका को विस्तार से समझने में मदद मिल सकती है। इससे चावल में रोग पैदा करने से संबंधित जीन्स में अनुवांशिक जोड़-तोड़ करके शीथ ब्लाइट प्रतिरोधी चावल की किस्में विकसित करने में मदद मिल सकती है।”


 


शोधकर्ताओं में डॉ झा के अलावा श्रयान घोष, नीलोफर मिर्जा, पूनम कंवर और कृति त्यागी शामिल थे। यह अध्ययन शोध पत्रिका फंक्शनल ऐंड इंटिग्रेटिव जीनोमिक्स में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)


 


 


 


Tuesday, June 11, 2019

वैज्ञानिकों ने घाव भरने के लिए विकसित किया दही आधारित जैल डॉ अदिति जैन

नई दिल्ली, 11 जून (इंडिया साइंस वायर): दवाओं के खिलाफ बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक
क्षमता के कारण कई बार घावों को भरने के लिए उपयोग होने वाले मरहम बेअसर हो जाते हैं,
जिससे मामूली चोट में भी संक्रमण बढ़ने का खतरा रहता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान
(आईआईटी), खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने अब दही आधारित ऐसा एंटीबायोटिक जैल विकसित
किया है जो संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने के साथ-साथ तेजी से घाव भरने में
मददगार हो सकता है।
दही के पानी में जैविक रूप से सक्रिय पेप्टाइड्स होते हैं, जिनका उपयोग इस शोध में उपचार
के लिए किया गया है। शोधकर्ताओं ने 10 माइक्रोग्राम पेप्टाइड को ट्राइफ्लूरोएसिटिक एसिड
और जिंक नाइट्रेट में मिलाकर हाइड्रोजैल बनाया है। इस जैल की उपयोगिता का मूल्यांकन
दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता रखने वाले बैक्टीरिया स्टैफिलोकॉकस ऑरियस और
स्यूडोमोनास एरुजिनोसा पर किया गया है। यह हाइड्रोजैल इन दोनों बैक्टीरिया को नष्ट करने
में प्रभावी पाया गया है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने पाया कि स्यूडोमोनास को नष्ट करने के लिए
अधिक डोज देने की जरूरत पड़ती है।
आईआईटी, खड़गपुर की शोधकर्ता डॉ शांति एम. मंडल ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि
“बैक्टीरिया समूह आमतौर पर किसी जैव-फिल्म को संश्लेषित करके उसके भीतर रहते हैं जो
उन्हें जैव प्रतिरोधी दवाओं से सुरक्षा प्रदान करती है। इस जैव-फिल्म का निर्माण बैक्टीरिया की
गति पर निर्भर करता है। हमने पाया कि नया हाइड्रोजैल बैक्टीरिया की गति को धीमा करके
जैव-फिल्म निर्माण को रोक देता है।”
घावों को भरने में इस हाइड्रोजैल की क्षमता का आकलन करने के लिए वैज्ञानिकों ने
प्रयोगशाला में विकसित कोशिकाओं का उपयोग किया है। इसके लिए त्वचा कोशिकाओं को
खुरचकर उस पर हाइड्रोजैल लगाया गया और 24 घंटे बाद उनका मूल्यांकन किया गया। इससे
पता चला कि हाइड्रोजैल के उपयोग से क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की प्रसार क्षमता बढ़ सकती है।
इसी आधार पर शोधकर्ताओं का मानना है कि यह जैल घाव भरने में उपयोगी हो सकता है।


शोधकर्ताओं में डॉ मंडल के अलावा, सौनिक मन्ना और डॉ अनंता के. घोष शामिल थे। यह
अध्ययन शोध पत्रिका फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया
साइंस वायर)
Keywords: Wounds, antibiotic resistance, bioactive peptides, curd, IIT-
Kharagpur
भाषांतरण : उमाशंकर मिश्र


Friday, June 7, 2019

नई इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल स्टेम सेल अपटेक में सुधार कर सकती है

सुशीला श्रीनिवास द्वारा



बेंगलुरू, 7 जून (इंडिया साइंस वायर): पुनर्योजी चिकित्सा में स्टेम कोशिकाओं का उपयोग एक चुनौती भरा कार्य है क्योंकि प्रतिरोपित कोशिकाओं के जीवित रहने से जुड़ी समस्याएं हैं। स्टेम सेल, जब एक घाव स्थल पर प्रत्यारोपित किया जाता है, तो पैरासरीन कारकों नामक रसायन छोड़ता है जो ऊतक पुनर्वृद्धि को शुरू करने के लिए आसपास के अन्य कोशिकाओं को उत्तेजित करता है। भारतीय वैज्ञानिकों के एक समूह ने एक इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल विकसित किया है जो प्रत्यारोपण कोशिकाओं को लंबे समय तक जीवित रहने में मदद कर सकता है।



Dr. Deepa Ghosh (Centre) withresearch team


मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनोसाइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल में मेसेनचाइमल स्टेम सेल (MSC) नामक स्टेम सेल को एनकैप्सुलेटेड्टल सेल बनाने की विधि तैयार की है। प्रारंभिक अध्ययनों में, यह पाया गया है कि हाइड्रोजेल सेल व्यवहार्यता प्रदर्शित करता है और स्टेम कोशिकाओं के दीर्घकालिक अस्तित्व का समर्थन कर सकता है।
इंजेक्टेबल हाइड्रोजेल को सेल्यूलोज और चिटोसन (सीशेल्स में पाया जाने वाला) जैसे प्राकृतिक पदार्थों से प्राप्त किया गया है और यह लगभग एक महीने में बायोडिग्रेड हो जाता है। हाइड्रोजेल को शिफ आधार प्रतिक्रिया नामक एक विधि को नियुक्त करके एक अमीनो समूह के साथ एक एल्डिहाइड समूह को जोड़कर बनाया गया था।
“हाइड्रोजेल नकली संस्कृतियों में वयस्क स्टेम कोशिकाओं के दीर्घकालिक अस्तित्व के मुद्दे को संबोधित करता है जो वास्तविक शरीर के ऊतकों की नकल करते हैं। हमने देखा कि कोशिकाएं जीवित रहती हैं और एक महीने की अवधि के लिए गुणा करती हैं, जो ऊतक पुनर्वसन के लिए पर्याप्त समय है, ”भारत विज्ञान तार से बात करते हुए, अध्ययन की प्रमुख अन्वेषक डॉ दीपा घोष ने बताया।
कोशिकाओं के सामान्य कामकाज। आरोपण के बाद, हाइड्रोजेल में वयस्क स्टेम कोशिकाएं विकसित होती हैं और क्षतिग्रस्त ऊतकों में आसन्न ऊतकों से कोशिकाओं के प्रवास को प्रेरित करके ऊतक की मरम्मत को प्रोत्साहित करने के लिए पेरासिन कारक जारी करती हैं।
“हाइड्रोजेल में ऊतक कोशिकाओं के समान 95% पानी की सामग्री होती है, जो कोशिकाओं को ऊतक संरचना में व्यवस्थित करने की क्षमता का संकेत देती है। इसके अलावा, जेल आत्म-चिकित्सा है, जिसका अर्थ है कि यह घाव के बाद ऊतक को समरूपता और आसंजन प्रदान करने वाली घाव की जगह का आकार ले सकता है, ”अध्ययन के पहले लेखक, जीजो थॉमस ने कहा।
प्रयोगशाला अध्ययनों से पता चलता है कि हाइड्रोजेल में सेल व्यवहार्यता है और स्टेम कोशिकाओं की बायोएक्टिविटी का समर्थन करता है। सेल संगतता और हीमोलिसिस परख का उपयोग क्रमशः कोशिकाओं और रक्त में हाइड्रोजेल की संगतता का मूल्यांकन करने के लिए किया गया था। हाइड्रोजेल को इन संस्कृतियों में स्टेम कोशिकाओं के विकास का समर्थन करने के लिए देखा गया था।
खरोंच घाव परख नामक एक परीक्षण विधि ने स्थापित किया कि हाइड्रोजेल अछूता स्टेम कोशिकाओं से पेरासिन कारकों की रिहाई की जैविक गतिविधि की सुविधा देता है। उपयुक्त लैब मॉडल की मदद से, हाइड्रोगेल के प्रदर्शन को क्रमशः फाइब्रोब्लास्ट्स और चोंड्रोसाइट्स - त्वचा और उपास्थि की कोशिकाओं के साथ परीक्षण किया गया था, जो मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जारी किए गए पेराक्राइन कारकों के जवाब में, मरम्मत कोशिकाओं ने घाव क्षेत्र में पलायन करना शुरू कर दिया, और इस प्रवासन की निगरानी एक मुखर माइक्रोस्कोप से की गई।
डॉ। घोष ने कहा, "नकली परिस्थितियों में सफल परिणामों के साथ, हम अब पशु मॉडल में हाइड्रोजेल का परीक्षण करने के लिए आगे की खोज कर रहे हैं।"
दीपा घोष और जीजो थॉमस के अलावा, टीम में अंजना शर्मा, विनीतापंवर और वियानी चोपड़ा शामिल थीं। अध्ययन के परिणाम जर्नलएसी एप्लाइड बायोमैटेरियल्स में प्रकाशित हुए थे। (इंडिया साइंस वायर)
कीवर्ड: वयस्क स्टेम सेल, पैरासरीन कारक, हाइड्रोजेल, नैनोसाइंस


Thursday, June 6, 2019

एस्ट्रोसैट जेलीफ़िश आकाशगंगा के दिल में स्थित है


सरिता विग द्वारा
तिरुवनंतपुरम, 4 जून (इंडिया साइंस वायर): भारत के अंतरिक्ष वेधशाला, एस्ट्रोसैट पर पराबैंगनी इमेजिंग टेलिस्कोप ने जेलीफ़िश आकाशगंगा के दिल में काम करने की प्रक्रियाओं पर एक अंतर्दृष्टि प्रदान की है।
जो201 नामक एक जेलीफ़िश आकाशगंगा के शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया है कि इसमें एक उज्ज्वल टूटी हुई अंगूठी जैसी उत्सर्जन संरचना से घिरे एक केंद्रीय उज्ज्वल क्षेत्र शामिल हैं। बीच में रखा गया एक गुहा या शून्य है जैसा कि बेहोश पराबैंगनी उत्सर्जन का क्षेत्र है। उज्ज्वल अंगूठी से पराबैंगनी प्रकाश पिछले 200 से 300 मिलियन वर्षों में बने युवा सितारों के कारण है।
विभिन्न तरंगों पर अन्य दूरबीनों की छवियों के साथ इसकी तुलना करके, शोधकर्ताओं ने दिखाया कि गुहा युवा सितारों की कमी के कारण है। इसका मतलब है कि इस गुहा क्षेत्र में कम से कम पिछले 100 मिलियन वर्षों से कोई नए सितारे नहीं बने हैं।
आकाशगंगाएं गुरुत्वाकर्षण द्वारा धारण किए गए अरबों सितारों के बहुत बड़े समुच्चय हैं। माना जाता है कि मिल्की वे, हमारी होम गैलेक्सी को माना जाता है कि सूर्य के साथ लगभग दस बिलियन तारे हैं। बड़े पैमाने पर, यह पाया गया है कि आकाशगंगाओं के सैकड़ों के समूह में गुरुत्वाकर्षण के कारण भी आकाशगंगाएं एक साथ झुंड में चलती हैं, जिन्हें आकाशगंगा समूह के रूप में जाना जाता है।
इन आकाशगंगाओं के बीच का क्षेत्र बहुत गर्म गैस से भरा होता है जिसका तापमान लाखों डिग्री तक हो सकता है। जैसे ही एक आकाशगंगा इस गर्म गैस के माध्यम से आगे बढ़ती है, आकाशगंगा के बाहरी क्षेत्रों में ठंडी गैस में से कुछ को वापस खींचा जा सकता है, जिससे संरचनाओं में तारों का निर्माण होता है जो पूंछ या जाल के समान होते हैं। इससे उन्हें जेलिफ़िश की उपस्थिति मिलती है, और इसलिए, उन्हें जेलिफ़िश आकाशगंगा कहा जाता है। ऐसी ही एक जेलीफ़िश आकाशगंगा है JO201, जिसका अध्ययन GASP नामक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के एक भाग के रूप में भारत और विदेश के खगोलविदों द्वारा किया गया है।
"आकाशगंगाएँ दो किस्मों में आती हैं - जो नीले रंग की दिखाई देती हैं उनमें युवा सितारे होते हैं और स्टार बनाने वाली विविधता होती है, जबकि लाल वाले वे होते हैं जिनके पास पुराने सितारे होते हैं और उनमें हाल ही में सितारों का कोई गठन नहीं हुआ है," के। जॉर्ज ने समझाया इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स, बैंगलोर में अध्ययन किया।
यदि तारों का बनना बंद हो जाए तो एक नीली आकाशगंगा लाल हो सकती है। आकाशगंगा के भीतर विभिन्न प्रक्रियाओं के कारण आकाशगंगाएँ तारों को बनाना बंद कर सकती हैं जैसे कि केंद्र में सुपरमासिव ब्लैक होल का प्रभाव; एक आयताकार बार जैसी संरचना की उपस्थिति जो तारों से बनी है और केंद्र के पास स्थित है; या सुपरनोवा नामक तारकीय मृत्यु के साथ बड़े पैमाने पर विस्फोट। एक क्लस्टर में आकाशगंगाओं के बीच गर्म गैस में इसकी गति के कारण आकाशगंगा से गैस का निकलना भी सितारों के गठन को बाधित कर सकता है।इस आकाशगंगा में तारा-निर्माण पर अंकुश लगाने के संबंध में, शोधकर्ता सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक (AGN) की परिकल्पना का पक्ष लेते हैं। माना जाता है कि अधिकांश बड़ी आकाशगंगाओं को उनके केंद्रों पर सुपरमैसिव ब्लैक-होल होते हैं। इन सुपरमैसिव ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से सैकड़ों-हजारों गुना अधिक हो सकता है। पड़ोस से निकलने वाली गैस और धूल बहुत अधिक वेग से सुपरमासिव ब्लैकहोल में घूमती है, जिससे मध्य क्षेत्र की चमक कई गुना बढ़ जाती है, और आकाशगंगा को AGN चरण से गुजरने के लिए कहा जाता है।
JO201 में, यह बताया गया है कि केंद्रीय क्षेत्र AGN की वजह से पराबैंगनी में उज्ज्वल है, और युवा सितारों के कारण नहीं। AGN से निकलने वाली ऊर्जा ठंडी गैस के बादलों को करीब से गर्म करती है। चूंकि ठंडी गैस के बादलों से तारे बनते हैं, इसलिए गैस के गर्म होने से तारे का निर्माण रुक जाता है। इसके परिणामस्वरूप, एजीएन के चारों ओर आकाशगंगा को गुहा जैसी दिखने वाली युवा सितारों की कमी का परिणाम मिलता है।
चमकदार अंगूठी के बाईं ओर पराबैंगनी की कमी के साथ देखी गई अपूर्ण रिंग संरचना को इस क्षेत्र में युवा सितारों की कमी के कारण समझाया गया है। हालांकि, इस मामले में, स्टार-गठन के इस समाप्ति को बाहरी प्रभावों के कारण समझाया गया है, जिसके परिणामस्वरूप आकाशगंगा से गैस छीनी जा रही है। ध्यान दें कि यह वही पक्ष है जिसमें संरचना जैसी पूंछ है, जो आकाशगंगा में बहुत दूर है।
लेखकों के अनुसार, यह आकाशगंगा अद्वितीय है क्योंकि यह आकाशगंगा में तारों के निर्माण को रोकने के लिए काम पर आंतरिक और बाहरी तंत्र का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करती है।
शोध के परिणामों को रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी के मासिक नोटिस में प्रकाशित करने के लिए स्वीकार किया गया है। टीम में जीएएसपी सहयोग और भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिक शामिल थे। JO201 की तस्वीर एस्ट्रोसैट पिक्चर ऑफ़ द मंथ (APOM) श्रृंखला का विषय है। एस्ट्रोसैट भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा सितंबर 2015 में शुरू किया गया भारत का पहला बहु तरंगदैर्ध्य वेधशाला है (भारत विज्ञान तार)
[सरिता विग एक खगोल भौतिकीविद और भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST), तिरुवनंतपुरम में एक एसोसिएट प्रोफेसर हैं]
कीवर्ड: एस्ट्रोसैट, जेलिफ़िश आकाशगंगा, इसरो, अंतरिक्ष दूरबीन


एनई से ऑरेंज ककड़ी विटामिन ए का भंडार है: अध्ययन

डॉ। अदिति जैन द्वारा
 नई दिल्ली, 6 जून (इंडिया साइंस वायर): कृषि वैज्ञानिकों की एक टीम ने पाया है कि देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र से आने वाली नारंगी-मांसल ककड़ी की किस्में सफेद मांस से कैरोटीनॉयड सामग्री (विटामिन-ए) में चार से पांच गुना अधिक समृद्ध होती हैं। देश के अन्य भागों में व्यापक रूप से उगाई जाने वाली किस्में।



ऑरेंज-फ्लेशेड खीरे उत्तर-पूर्व के आदिवासी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। फलों का सेवन पकी हुई सब्जी या चटनी के रूप में किया जाता है। लोग इसे 'फंग्मा' और मिज़ोरम में 'हम्ज़िल' और मणिपुर में 'थाबी' कहते हैं।


किस्मों ने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया, जब वे नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिसोर्स (NBPGR) में जमा ककड़ी के स्वदेशी जर्मप्लाज्म की विशेषता बता रहे थे। आगे के निरीक्षण पर, उन्होंने पाया कि उन्हें मणिपुर और मिजोरम से एकत्र किया गया था। यह देखते हुए कि पौधों का नारंगी रंग उच्च कैरोटीनॉयड सामग्री के अनुरूप हो सकता है, उन्होंने अपनी विशेषताओं और पोषक तत्व का विस्तार से अध्ययन करने का निर्णय लिया।


“बहुत सारे फल उपलब्ध हैं जो बीटा कैरोटीन / कैरोटिनॉइड के दैनिक सेवन की सिफारिश कर सकते हैं। हालांकि, वे विकासशील देशों में गरीबों की पहुंच से परे हो सकते हैं। खीरा पूरे भारत में एक सस्ती कीमत पर उपलब्ध है। डेंटी and केटेशन और कैरोटेनॉइड रिच लैंडरेज का उपयोग, पोषण प्रयासों के क्षेत्र में हमारे प्रयासों में उल्लेखनीय रूप से बदलाव लाएगा, ”एनबीपीजीआर के एक वैज्ञानिक और अध्ययन दल के एक सदस्य डॉ। प्रगति रंजन ने समझाया। इंडिया साइंस वायर से बात की।


इस अध्ययन के लिए, वैज्ञानिकों ने मिजोरम और ओन (KP-1291) मिजोरम से (IC420405, IC420422, और AZMC-1) मणिपुर से अपने दिल्ली कैम्पसुलोंग में पूसा उदय के साथ, उत्तर भारत में आमतौर पर उगाए जाने वाले एक सफेद मांस की किस्म को विकसित किया। नारंगी मांसल किस्मों ने कुल शर्करा की समान सामग्री और सामान्य लोगों की तरह एस्कॉर्बिक एसिड की थोड़ी अधिक सामग्री दिखाई। हालांकि, ककड़ी के चरण के साथ कैरोटीनॉयड सामग्री भिन्न होती है। एक स्तर पर जब इसे सलाद के रूप में खाया जाता है, तो नारंगी के मांसल किस्मों में कैरोटीनॉयड की मात्रा सामान्य किस्म से 2-4 गुना अधिक थी। आगे की परिपक्वता पर, हालांकि, नारंगी ककड़ी में सफेद किस्म की तुलना में 10-50 गुना अधिक कैरोटीनॉयड सामग्री हो सकती है।


इसके बाद, शोधकर्ताओं ने 41 व्यक्तियों को स्वाद लेने और उन्हें स्कोर करने के लिए कहकर स्वाद की स्वीकार्यता के लिए पौधों का मूल्यांकन किया। सभी प्रतिभागियों ने इन खीरों की अनूठी सुगंध और स्वाद की सराहना की और स्वीकार किया कि इसे सलाद के रूप में या रायता में खाया जा सकता है।


डॉ। रंजन ने अपनी भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हुए कहा, “उच्च कैरोटीनॉयड युक्त पदार्थों का उपयोग सीधे या ककड़ी सुधार कार्यक्रमों में एक अभिभावक के रूप में किया जा सकता है।
शोध टीम में अंजुला पांडे, राकेश भारद्वाज, के। के। गंगोपाध्याय, पवन कुमार मालव, चित्रा देवी पांडे, के। प्रदीप, अशोक कुमार (ICAR-NBPGR, नई दिल्ली) शामिल थे; ए। डी। मुंशी और बी.एस. तोमर (आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान)। अध्ययन के परिणाम जर्नल जेनेटिक रिसोर्स एंड क्रॉप इवोल्यूशन में प्रकाशित हुए हैं। (इंडिया साइंस वायर)
कीवर्ड: एनबीपीजीआर, ककड़ी, कैरोटीनॉयड, विटामिन ए, जैव विविधता, आईसीएआर, आईएआरआई


Monday, June 3, 2019

वैज्ञानिकों ने बनाया फूलों को सुखाने के लिए नया सोलर ड्रायर

उमाशंकर मिश्र



 नई दिल्ली, 3 जून (इंडिया साइंस वायर): भारत से निर्यात होने वाले फूल उत्पादों में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी सूखे फूलों और पौधों के अलग-अलग भागों की होती है। लेकिन सूखे फूल उत्पादों के वैश्विक बाजार में भारत की भागीदारी सिर्फ पांच प्रतिशत है। भारतीय शोधकर्ताओं ने अब एक सोलर ड्रायर विकसित किया है जो गुलाब और गेंदे जैसे अधिक मूल्यवान फूलों के सौन्दर्य और गुणों को नुकसान पहुंचाए बिनासुखाने में उपयोगी हो सकता है।
इस सोलर ड्रायर को विकसित करने वालेशोधकर्ताओं में शामिल नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ पी.के. शर्मा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “सोलर ड्रायर और सीधे धूप में सुखाए गए फूलों के रंग, रूप और आकार का मूल्यांकन करने पर हमने पाया कि बाहरी वातावरण की अपेक्षा सोलर ड्रायर में तापमान स्थिर रहता है। इसमें सुखाने की दर 65 से 70 प्रतिशत तक अधिक पायी गई है। बाहरी तापमान में उतार-चढ़ाव होता रहता और दोपहर के समय तो तापमान सबसे अधिक हो जाता है। इस कारण, खुली धूप में फूलों को सुखाने से उनके रंग, रूप और आकार पर बुरा असर पड़ता है। जबकि, सोलर ड्रायर में फूलों की गुणवत्ता बनी रहती है।”

सोलर ड्रायर, ड्राइंग चैंबर्स औरसौर ऊर्जा से संचालितएग्जास्ट फैन
इस सोलर ड्रायर को जस्ते की परत युक्त लोहे की चादर, हल्के स्टील, लोहे के एंगल, ग्रिलआदि के उपयोग से बनाया गया है।ड्रायर में हीटिंग और ड्राइंग दो चैंबर हैंऔर इसका कुल आयतन 1.04 घन मीटर है।ड्राइंग चैंबर में सामग्री के भंडारण के लिए 0.57 वर्ग मीटर केचार खंड बनाए गए हैंऔर ड्रायर का कुल भंडारण क्षेत्रफल 3.4 वर्ग मीटर है। ड्रायर को ढंकने के लिए कांच की शीट लगायी गई है, जिससे सौर विकिरण भीतर प्रवेश करके गरमी पैदा कर सके। ऊष्मा के अवशोषण को बढ़ाने के लिएड्रायर के भीतरी हिस्से को काले रंग से पेंट किया गया है।

डॉ शर्मा ने बताया कि “यह अक्षय ऊर्जा से संचालित ड्रायर है जिसके भीतर काले पेंट से रंगे हुए छोटे आकार के गोल पत्थर रखे गए हैं जो रॉक-बेड की तरह काम करते हैं और हीटिंग चैंबर में ऊष्मा बनाए रखते हैं। ड्राइंग चैंबर से नम हवा हटाने के लिए इसमें सौर ऊर्जा से संचालित एग्जास्ट फैन लगाए गए हैं जो फूलों एवं पौधों के विभिन्न हिस्सों को तेजी से सुखाने में मदद करते हैं। रात के समय और बादल होने की स्थिति में सौर ऊर्जा इस ऊष्मा को बनाए रखने में मदद करती है। सोलर ड्रायर और सामान्य वातावरण के तापमान में करीब 26 डिग्री सेल्सियस का अंतर देखने को मिला है।”
सोलर ड्रायर के परीक्षण से पहले फूलों को पत्तियों तथा पौधों के अन्य भागों से अलग करके इन नमूनों का व्यास, लंबाई और वजन दर्ज किया गया है। फूलों में मौजूद नमी की मात्रा कम करने के लिए उन्हें 3-4 मिनट तक माइक्रोवेव में सुखाया गया और फिर उन्हें सिलिका जैल में डुबोकर नमूने तैयार किए गए हैं। इन नमूनों को सोलर ड्रायर में सुखाने के लिए रख दिया जाता है।
खुले में गुलाब के फूलों को सुखाने में करीब 54 घंटे लगते हैं, वहीं सोलर ड्रायर में इसकी गुणवत्ता बरकरार रखते हुए इसे लगभग 33 घंटों में ही सुखाया जा सकता है। इसी तरह, गेंदे को धूप में सुखाने में 48 घंटे से अधिक समय लगता है और गुणवत्ता कायम नहीं रह पाती। जबकि सोलर ड्रायर में करीब 27 घंटे में गेंदे के फूलों को सुखाकर बेहतर गुणवत्ता प्राप्त की जा सकती है।
सोलर ड्रायर की मदद से फूलों, पौधों की शाखाओं, टहनियों, पत्तों इत्यादि को सुखाकर लंबे समय तक उनकी ताजगी बनाए रखा जा सकता है। सुखाने से पहले ध्यान रखा जाता है कि फूलों या पौधों के हिस्सों का मूल आकार तथारंग नष्ट न होने पाएं ताकि इनका उपयोग आंतरिक सजावट के लिए किया जा सके।
इस तरह सुखाए गए फूल और पत्तियों का इस्तेमाल ग्रीटिंग कार्ड, वॉल प्लेट्स, लैंडस्केप और कैलेंडर जैसी कलात्मक सजावटी वस्तुएं बनानेमें किया जा सकता है।सोलर ड्रायर का उपयोग फूलों के अलावा फल, सब्जियों और औषधीय फसलों को सुखाने के लिए भी कर सकते हैं। यह अध्ययन शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं में डॉ पी.के. शर्मा के अलावा पी. पचपिंदे और डॉ इंद्र मणि शामिल थे। (इंडिया साइंस वायर)
 


 


अदभुत अविश्वसनीय महात्मा सती प्रसाद जी महाराज जो विज्ञान के लिए बने रहस्य---

अमेठी
अदभुत अविश्वसनीय महात्मा सती प्रसाद जी महाराज जो विज्ञान के लिए बने रहस्य---


आज के युग में जहां इंसान जंक फूड खा कर अपने स्वस्थ के नुकसान पहुंचा रहा है अगर कोई व्यक्ति बीमारी में डॉक्टर के पास जाता है तो डॉक्टर उन्होंने साफ पानी पीने सलह देते हैं और साफ-सुथरा भोजन करने की सलाह देते हैं वहीं इस मामले में एक महात्मा ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवन का आधा से ज्यादा समय सिर्फ नदी का पानी कंकड़ नदी की बालू मिट्टी खाकर बिताया है आज यह विज्ञान के लिए एक चुनौती है|


https://www.youtube.com/watch?v=5DOI5ZT8CPE&feature=youtu.be
आज न्यूज़ कवरेज के दौरान एक ऐसे संत महापुरुष से भेंट हुई जिन्होंने अपने जीवन के लगभग 100 वर्ष गोमती नदी के किनारे और पूरे देश के भर्मण में लगा दिया ग्रामीणों की माने तो उनसे देश का कोई भी तीर्थ स्थल बाकी नहीं जहां वह ना गए हो और वह महात्मा नेपाल भूटान बर्मा देश का भी पैदल यात्रा कर चुके हैं।
लोकसभा क्षेत्र अमेठी की पावन धरती पर जन्मे संत श्री सती प्रसाद जी महाराज जोकि विज्ञान को कड़ी चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने अपने जीवन का आधे से ज्यादा हिस्सा कंकड़ पत्थर मिट्टी बालू खाकर जीवन यापन कर रहे हैं और आज तक उनको किसी प्रकार की बीमारी वह परेशानी नहीं है वह पूर्णतया स्वस्थ हैं लगभग 100 वर्ष की अवस्था में आज भी दिन में एक से दो बार कंकड़ पत्थर का सेवन करते हैं अमेठी के ग्राम सभा गौरा प्राणी पिपरी में जन्मे इस महापुरुष की अद्भुत गाथा गांव के बच्चों बूढ़ों से भी भली बात जाना जा सकता है यह अद्भुत दृश्य विज्ञान को किसी चुनौती से कम नहीं है।



निर्देश--
कंकड़ पत्थर खाने की कोशिश घर पर ना करें यह आपके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है|