कला ही जीवन है और जीवन ही कला

 कला हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है इसके बिना जीवन सम्भव नही है। कला का दूसरा नाम सांस्ड्डतिक जीवन है।
 कला 'कल' धातु से बना हुआ संस्कृत का वह शब्द है जिसका अर्थ सुन्दर एवं मधुर है 'कल' आनन्द यति ''इतिकला'' अर्थात् जो मानव के मन मस्तिष्क और आत्मा को आनन्द विभोर कर दे वह कला कहलाती है। अंग्रेजी और फ्रेंच  में 'आर्ट' लैटिन में आर्टम और आर्स शब्द से कला को व्यक्त किया गया है। लैटिन में आर्स शब्द का वही तात्पर्य है जो संस्ड्डत की धातु 'अर' का। अर अर्थात बनाना, रचना करना या पैदा करना।
 कला को अभिव्यक्ति, आनन्द प्राप्ति सत्यम् शिवम् और सुन्दरम् की भावनाओं को अनुभूति कराने का साधन कहा गया है। यदि कला को सूक्ष्म रूप से देखे तो तीन भेद स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते है।
आचरण विषयक कला- इसके माध्यम से व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है। इस कला को उपदेशात्मक कला भी कह सकते हैं।
 ललित कला- इसके अन्तर्गत आनन्द देने वाली संगीत कला जो श्रोता को भाव विभोर सांस्ड्डतिक सांसारिक संतापो से विमुक्त कर ब्रह्मलीन कराती है। मूर्तिकला और चित्रकला में जान फूंकने वाले कलाकारों के माध्यम से हमें उस ब्रह्म का ज्ञान होता है, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है।
उदार कला- शेष सभी विषय जो मानव मात्र के लिए हितकर है और उसके लिये उपयोगी होते हुए भी आनन्द की अनुभूति कराते हैं, इसके अन्तर्गत आते हैं।
 विज्ञान, काव्य और साहित्य विद्या के अन्तर्गत आते है। सभी प्रकार की कलाएं एवं समस्त ज्ञान जिससेे रसानुभूति के साथ-साथ कौशल का भी हमें आभास होता है, उपविद्या के अन्तर्गत आती है। हमारा लोक जीवन बहुत विशाल है साथ ही साथ गहराई लिए हुए भी। भारतीय इतिहास का कोई भी युग ऐसा नहीं है जिसमें पुरातत्व की सामग्री कहीं न कहीं कला रूप में दृष्टि गोचर न हो, )ग्वेद में कला के व्यापक प्रयोग के साथ-साथ रामायण में महाराजा दशरथ के महल को कला शिल्पियों द्वारा सुसज्जित करना तथा इन्द्रजीत ;मेघनादद्ध के रथ पर कला का मोहक चित्रण किया गया। महाभारत में फर्श इस प्रकार बनवाये गये थे, जहाँ पानी भरे होने का भ्रम होता था दीवारों पर द्वार होने का भ्रम उत्पन्न होता था। अजन्ता एवं एलोरा गुफाओं की चित्रकला, प्राचीन भारत की विकसित कला का बेजोड़ नमूना है। मुगलकालीन युग में अकबर चित्रकला का विशेष प्रेमी था तथा शाहजहां भी अच्छे कलाकारों को पसन्द करता था।
 कला एवं संस्कृति, सृजनात्मकता एवं सौन्दर्य को प्रत्यक्ष करने का साधन है। प्रत्येक कलात्मक रचना में सौन्दर्य की अनुभूति होती है। और उसमें हमें श्री भी दृष्टिगोचर होती है। श्री और सौन्दर्य को देखने के लिए सहृदय होने की आवश्यकता है।
रूप भेदाः, प्रमाणान्ति, भाव, लावण्य योजनम्।
सदृश्य वार्णिका भंग इति चित्र शडांगकम्।।
 वास्तव में कला सत्य की खोज के समय ज्ञान का विश्लेषण करने और जीवन का मूल्यांकन करने में पूर्ण सहयोग करती है।


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