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Showing posts from July, 2019

भारतीय शोधकर्ताओं ने विकसित किया जहरीले रसायनों का डेटाबेस

नई दिल्ली  (इंडिया साइंस वायर): पर्यावरण या फिर दैनिक जीवन से जुड़े उत्पादों के जरिये हर दिन हमारा संपर्क ऐसे रसायनों से होता है, जो सेहत के लिए हानिकारक होते हैं। इस तरह के रसायन उपभोक्ता उत्पादों से लेकर कीटनाशकों, सौंदर्य प्रसाधनों, दवाओं, बिजली की फिटिंग से जुड़े सामान, प्लास्टिक उत्पादों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों समेत विभिन्न चीजों में पाए जाते हैं। भारतीय शोधकर्ताओं ने ऐसे रसायन का एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया है, जो मानव शरीर में हार्मोन की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं, जिससे शारीरिक विकास, चयापचय, प्रजनन, प्रतिरक्षा और व्यवहार पर विपरीत असर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने ऐसे रसायनों को स्वास्थ्य से जुड़ा प्रमुख उभरता खतरा बताया है। इस खतरे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हार्मोन्स के तंत्र को प्रभावित करने वाले ये रसायन पर्यावरण में मौजूद जहरीले रसायनों का सिर्फ एक उप-समूह है। यह डेटाबेस रसायनों की कोई आम सूची नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य पर रसायनों के कारण पड़ने वाले प्रभाव पर केंद्रित शोधों के आधार पर तैयार की गई एक विस्तृत सूची है। इनमें से अध

नैनो तकनीक से बढ़ायी जा सकेगी टायरों की मजबूती

नई दिल्ली | (इंडिया साइंस वायर): किसी उबड़-खाबड़ सड़क पर गाड़ी का टायर अचानक पंक्चर हो जाए तो मुश्किल खड़ी हो जाती है। भारतीय शोधकर्ताओं ने इस मुश्किल से निजात पाने के लिए नैनोटेक्नोलॉजी की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की है, जो टायरों की परफार्मेंस बढ़ाने में उपयोगी साबित हो सकती है। केरल स्थित महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर नैनो-साइंस ऐंड नैनो-टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने रबड़ से बनी हाई-परफार्मेंस नैनो-कम्पोजिट सामग्री विकसित की है, जिसका उपयोग टायरों की भीतरी ट्यूब और इनर लाइनरों को मजबूती प्रदान करने में किया जा सकता है। नैनो-क्ले और क्रियाशील नैनो-क्ले तंत्र के उपयोग से इनर लाइनर बनाने के लिए विकसित फॉर्मूले को गैस अवरोधी गुणों से लैस किया गया है। इससे टायरों के इनर लाइनर की मजबूती बढ़ायी जा सकती है। इंटरनेशनल ऐंड इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर नैनो-साइंस ऐंड नैनो-टेक्नोलॉजी (आईआईयूसीएनएन) ने टायर निर्माता कंपनी अपोलो टायर्स के साथ मिलकर प्रौद्योगिकी का पेटेंट कराया है। कंपनी जल्द ही इस तकनीक का उपयोग हाई-परफार्मेंस टायर बनाने में कर सकती है। प्रो. नंदकुमार कलरिक्कल

वक्त

मौत  ने  भी  अपने  रास्ते बदल डाले, मैं जिधर चला उसने कदम वहाँ डाले।   जब - जब लगा मेरे जख्म भरने लगे, पुराने वक्त की यादों ने फिर खुरच डाले।   मैं बहुत परेशान था पैरो के छालों से, मंजिल ने फिर भी रास्ते बदल डाले।   रौशनी झरोखों से भी आ जाती मगर, वक्त की हवा ने उम्मीद के दिए बुझा डाले।   वक्त  के  हाथों  में  सब  कठपुतली  हैं, उसके धागों के आगे लगते सब नाचने गाने,   मैं मंजर बदलने की आश में चलता रहा। साल दर साल फिर भी बढ़ते रहे राह के जाले।।   धुन्ध दुःखो की इस कदर जीवन पर बढ़ी, खुद ही छूटते चले गए सभी साथ देने वाले,   एक जगह रुककर कभी जीना नहीं शीखा था। मजबूरियों ने एक ही जगह पर कदम बांध डाले,     नीरज त्यागी ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ). मोबाइल 09582488698 65/5 लाल क्वार्टर राणा प्रताप स्कूल के सामने ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश 201001

नई तकनीक से चुनौतियों के हल खोजने वाले उद्यमियों को पुरस्कार

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उमाशंकर मिश्र नई दिल्ली, 18 जुलाई (इंडिया साइंस वायर): किसी दिव्यांग को ऐसा कृत्रिम अंग मिल जाए जो दिमाग के संकेतों से संचालित हो तो इसे तकनीक पर आधारित एक महत्वपूर्ण सामाजिक योगदान माना जाएगा। बिट्स पिलानी के कंप्यूटर साइंस के दो छात्रों उज्ज्वल कुमार झा और सिद्धांत डांगी ने ऐसे ही बायोनिक हाथ का नमूना पेश किया है, जो दिमाग के संकेतों से संचालित होता है। इस बायोनिक हाथ के प्रोटोटाइप को इंडिया इनोवेशन ग्रोथ प्रोग्राम 2.0 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित यूनिवर्सिटी चैलेंज प्रतियोगिता में 10 लाख रुपये का पुरस्कार मिला है। इन दोनों छात्रों ने बताया कि उनका प्रोटोटाइप फिलहाल विकास के दूसरे चरण में है और इस पुरस्कार राशि की मदद से वे इसे अधिक बेहतर बना सकेंगे। सामाजिक एवं औद्योगिक समस्याओं के समाधान के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित ऐसे नवाचारों के लिए इस वर्ष इंडिया इनोवेशन ग्रोथ प्रोग्राम के तहत ओपन इनोवेशन चैलेंज में 16 स्टार्ट-अप कंपनियों और यूनिवर्सिटी चैलेंज के अंतर्गत 20 अकादमिक संस्थानों की टीमों को क्रमशः 25 लाख रुपये और 10 लाख रुपये का पुरस्कार दिया गया है। इन विजेताओं को 240

ग़ज़ल

आइना क्या देखकर शरमा रहा है। यूँ मिली जब आंख तो घबरा रहा है।   बंद पलकों से कहो ना दर्द  कुछ भी, दिल अभी नादान हँसा जा रहा है।   खनखनाकर शोर उठती चूड़ियों की, क्या शिकायत मुझको बतला रहा है।   आज से पहले नही इतना हँसा वो राज कुछ है साज जो छिपा रहा है।   ये अँधेरे ढूँढ ही लेते हैं 'मुझको', रौशनी जो आंख में जलता रहा है।     ------–----------------------- ------------ नाम - ऋषिकांत राव शिखरे पता - पुलसावां, अकबरपुर, अम्बेडकर नगर (उत्तर प्रदेश)। शिक्षा - बी.एस. सी. (Bachelor of Science) मो. न. -    +919793477165

16-17 जुलाई 2019 चंद्र ग्रहण, सम्पूर्ण जानकारी

यह खंडग्रास चंद्रग्रहण है| तो आइये जानते है 16 जुलाई 2019 को पड़ने वाले खंडग्रास चंद्रग्रहण की पूरी जानकारी कि किस समय दिखेगा और कहाँ दिखाई देगा| चंद्रग्रहण कैसे होता है चंद्रग्रहण एक अद्भुत आकाशीय घटना है| वैज्ञानिकों के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है| इस अवस्था में पृथ्वी चंद्रमा को ढक लेती है, और चंद्रमा का प्रकाश धरती पर नहीं आ पाता और अँधेरा छा जाता है| इसी को चंद्रग्रहण होता है| खंडग्रास चन्द्र ग्रहण 16 जुलाई 2019 को साल का दूसरा चंद्रग्रहण पड़ेगा| यह खंडग्रास चंद्रग्रहण है| इसमें पृथ्वी चन्द्रमा को आंशिक रूप से ढक लेगी| इस अवस्था को खंडग्रास चंद्रग्रहण कहते है| चन्द्र ग्रहण कहाँ दिखाई देगा दोस्तों 2019 का यह दूसरा चंद्रग्रहण भारत सहित अगानिस्तान, यूक्रेन, टर्की, ईरान, इराक, सऊदी अरब, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, अन्टार्कटिका में दिखाई देगा| चन्द्र ग्रहण किस समय दिखाई देगा साल का दूसरा चंद्रग्रहण 16 जुलाई 2019 को लगने वाला है| यह आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को दिन मंगलवार को लगने वाला है| यह खंडग्रास चंद्रग्रहण के रूप में दिखाई देगा| यह चंद्रग्रहण 16 जुलाई

युवा अन्वेषकों के हाइटेक नवाचारों को पुरस्कार

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उमाशंकर मिश्र  नई दिल्ली, जुलाई (इंडिया साइंस वायर): खेत में कीटनाशकों का छिड़काव करते समय रसायनिक दवाओं के संपर्क में आने से किसानों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस ऐंड रिजेनेरेटिव मेडिसिन, बेंगलूरू के छात्र केतन थोराट और उनकी टीम ने मिलकर डर्मल जैल नामक एक ऐसी क्रीम विकसित की है, जिसे त्वचा पर लगाने से कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। आईआईटी, दिल्ली की रोहिणी सिंह और उनकी टीम द्वारा विकसित नई एंटीबायोटिक दवा वितरण प्रणाली भी देश के युवा शोधकर्ताओं की प्रतिभा की कहानी कहती है। इस पद्धति को विकसित करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि शरीर में दवा के वितरण की यह प्रणाली भविष्य में कैंसर के उपचार को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। आईआईटी, खड़गपुर की शोधार्थी गायत्री मिश्रा और उनकी टीम ने एक ई-नोज विकसित की है, जो अनाज भंडार में कीटों के आक्रमण का पता लगाने में उपयोगी हो सकती है। इसी तरह, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलूरू के छात्र देवल करिया की टीम द्वारा मधुमेह रोगियों के लिए विकसित सस्ती इंसुलिन पंप युवा वैज्ञानिकों की प्रतिभा का एक अन्य उदाहरण है।

पौधों की विविधता के लिए पर्याप्त पानी सबसे महत्वपूर्ण है

मोनिका कुंडू श्रीवास्तव द्वारा नई दिल्ली, 9 जुलाई (इंडिया साइंस वायर): भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र लगभग 329 मिलियन हेक्टेयर है। जलवायु उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक बदलती रहती है। हालांकि, इस विविधता के बावजूद, थोड़ा इस बारे में जाना जाता है कि जलवायु किसी विशेष क्षेत्र में बढ़ने वाले पौधों की विविधता को कैसे प्रभावित करती है। डॉ। पूनम त्रिपाठी और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), खड़गपुर की टीम द्वारा हाल ही में एक अध्ययन, यह दर्शाता है कि किसी स्थान पर वर्षा की मात्रा और तापमान प्रमुख पौधों की विविधता को कैसे प्रभावित करते हैं भारत के बायोग्राफिकल जोन। अनुसंधान के तहत एकत्र पौधों की प्रजातियों की समृद्धि डेटा का उपयोग किया राष्ट्रीय परियोजना 'लैंडस्केप स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय स्तर की जैव विविधता विशेषता'। पिछले 100 वर्षों के आंकड़ों से एक स्थान के तापमान और वर्षा की मात्रा की गणना की गई। हालांकि सबसे शुष्क महीने (न्यूनतम वर्षा) के लिए वर्षा की मात्रा का सबसे अधिक प्रभाव था, ए न्यूनतम वर्षा और न्यूनतम तापमान का संयोजन वांछनीय पाया गया। यह था पानी और ऊर्जा संयंत्र की

युवा अन्वेषकों के हाइटेक नवाचारों को पुरस्कार

उमाशंकर मिश्र नई दिल्ली, 8 जुलाई (इंडिया साइंस वायर): खेत में कीटनाशकों का छिड़काव करते समय रसायनिक दवाओं के संपर्क में आने से किसानों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस ऐंड रिजेनेरेटिव मेडिसिन, बेंगलूरू के छात्र केतन थोराट और उनकी टीम ने मिलकर डर्मल जैल नामक एक ऐसी क्रीम विकसित की है, जिसे त्वचा पर लगाने से कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। आईआईटी, दिल्ली की रोहिणी सिंह और उनकी टीम द्वारा विकसित नई एंटीबायोटिक दवा वितरण प्रणाली भी देश के युवा शोधकर्ताओं की प्रतिभा की कहानी कहती है। इस पद्धति को विकसित करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि शरीर में दवा के वितरण की यह प्रणाली भविष्य में कैंसर के उपचार को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। आईआईटी, खड़गपुर की शोधार्थी गायत्री मिश्रा और उनकी टीम ने एक ई-नोज विकसित की है, जो अनाज भंडार में कीटों के आक्रमण का पता लगाने में उपयोगी हो सकती है। इसी तरह, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलूरू के छात्र देवल करिया की टीम द्वारा मधुमेह रोगियों के लिए विकसित सस्ती इंसुलिन पंप युवा वैज्ञानिकों की प्रतिभा का एक अन्य उदाहरण है।