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Sunday, September 29, 2019

बुंदेलखंड के 2 लाख बुनकरों का जीवन संकट में, नहीं कोई निदान

वे जो दूसरे की मर्यादा ढकते हैं  जन्म से मृत्यु तक कपड़ा चाहिए। मनुष्य की प्रथम व अंतिम आवश्यकता को पूरा करने वाले बुंदेलखंड के 2 लाख बुनकरों का जीवन संकट में है। जिस हथियार से गांधी जी ने अंग्रेजों से लोहा लिया तथा देश को एक सूत्र में बांधा देश की स्वदेशी तरीके से अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, जिस हथियार से जाति, धर्म का भेद मिटाया। आज उस स्वावलंबी हथियार हथकरघा चरखा के चलाने वाले का जीवन संकट में है उसके चलाने वाले बुनकर आज अपनी मूलभूत जरूरते, जैसे रोटी, मकान, स्वास्थ्य, और शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं गांधी, विनोवा के अंतिम जन आजादी के 7 दशक के बाद भी अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे हैं यदि हमें हैंडलूम को बचाना है। तो गांव गांव में रहने वाले बुनकरों को सुरक्षित रखना होगा। निपुण बुनकरों से बुनकारी सीखने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आना होगा कृषि के बाद हथकरघा ही सबसे बड़ा क्षेत्र है जो सब को रोजगार दे सकता है पढ़ा, अनपढ़ बच्चे, वृद्ध, महिला, पुरुष एवं परिवार के सभी सदस्य एक ही घर में एक ही हथकरघा में कृषि के साथ काम कर सकते हैं और करते भी रहे हैं। इस उद्योग में अपार संभावना है आजादी के पहले हैंडलूम का कार्य सभी जाति के लोग करते थे पावर लूम युग आने के बाद इस परंपरागत हथकरघा के रोजगार को बंदी के कगार पर खड़ा कर दिया।



वर्तमान में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 43 लाख बुनकर पूरे देश में बचे हैं 2011 की हथकरघा जनगणना के अनुसार 7ः बुनकरों की संख्या प्रति वर्ष घट रही है अगर बुनकर कारीगरों ने अपना हुनर छोड़ दिया तो यह कला पूरी तरीके से खत्म हो जाएगी। दुनिया का 85ः हथकरघा वस्त्र उद्योग केवल भारत में होता है वर्ष 2013 में योजना आयोग ने बुनकर को नई तरीके से परिभाषित करने को कहा आज कपड़ा मिल खड़ा हो जाने से 50 बुनकरों का काम एक आदमी एक पावर लूम में करता है जिससे 49 आदमी बेकार हो गए बुनकर हमारे समाज के इंजीनियर हैं जो बिना किसी डिग्री के अपने काम में निपुण है आज कोई भी युवा इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहा क्योंकि इसमें कैरियर नहीं है ऐसा प्रचार प्रसार किया जा रहा है यह हुनर लोगों की इज्जत है  मनुष्य जन्म से के समय नंगा होता है कपड़े से उसे ढाका जाता है बुनाई हमारे देश की संस्कृति का हिस्सा थी, कला थी, साधना थी, स्वतंत्रता संग्राम की वर्दी बनने वाली कला को जीवित रखना मुश्किल हो रहा है। हथकरघा राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है यह हथकरघा सम्मानजनक रोजगार देने का प्रतीक है हथकरघा चरखा कृषि से ही केवल भारत के गांव को समृद्ध किया जा सकता है।इंसान के हाथ इंसान द्वारा बनाई गई छोटी सी मशीन जो बिना बिजली के चलती है सुंदर कपड़ों का सर्जन करती बुनकर कला को जिंदा रखना होगा अभी एक आम आदमी हैंडलूम और पावर लूम के कपड़ों में फर्क नहीं जानता अभी कुछ ही वर्षों पूर्व बुंदेलखंड के झांसी मऊरानीपुर के हैंडलूम का कपड़ा पूरे भारत में दिखता था जिसमें मऊरानीपुर में करीब 2 लाख लोगों को रोजगार मिलता था। किसी जमाने में महोबा, बांदा, छतरपुर, हरपालपुर बुनाई तथा कपास के उत्पादन के केंद्र थे आज के दौर में बंद है जिन्हें पुनः शुरू करने की आवश्यकता है। बुंदेलखंड के 80ः बुनकर अपना परंपरागत हुनर त्याग कर दूसरे धंधे में लग गए हैं यदि बुंदेलखंड का पलायन रोकना है, बेरोजगारी दूर करनी है, तो पुनः हैंडलूम शुरू करना होगा।बुंदेलखंड के निवाड़ी, टीकमगढ़ बांदा के अतर्रा, खुरहंड, में किसी जमाने में बुनाई, कढ़ाई, गोला बनाना, कंघी भरना, रंगाई,धुलाई, सूत खोलना, ताना बनाना कपड़े में गांठ लगाना, धोना, प्रेस करना जैसे अनेक कार्य जो कपड़ा बनाने से एवम् बेचने से संबंधित है। गांव के करीब 300000 परिवार किसी न किसी रूप में हथकरघा रोजगार से जुड़े थे सरकार की उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की नासमझी के कारण पावर लूम युग आया और साथ ही बुंदेलखंड में प्राकृतिक आपदा ने प्रवेश किया। एक ओर जहां बाजार मंदी के दौर से गुजरा वहीं बुंदेलखंड में पानी संकट होने के कारण बुंदेलखंड सूखे की चपेट में आ गया और यहीं से बुनकरों का जीवन संकट में पड़ने लगा। बुंदेलखंड का भू-भाग केवल प्राकृतिक जल वर्षा पर निर्भर है पिछले 20 वर्षों से लगातार बुंदेलखंड सूखे की मार झेल रहा है यहां के निवासियों का जीवन यापन का सबसे बड़ा सहारा केवल कृषि है। सरकार की उदासीनता के कारण ना तो किसानों को समय पर सहयोग मिला और ना ही बुनकरों को अपने जीवन यापन के लिए कोई समाधान हुआ। गरीब किसान और बुनकर अपने परिवार को पलायन के लिए देश के महानगर दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पंजाब आदि दूसरे शहरों में मजबूरी मे मजदूरी करने के लिए पलायन कर रहा है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं केवल वृद्धजन और बच्चे ही गांव में देखने को मिल रहे हैं प्रतिदिन 5000 लोग रेल बस या विभिन्न साधनों से बुंदेलखंड से पलायन कर रहे हैं यदि सरकार बुनकरों को नई तकनीक पर हैंडलूम क्रियाशील पूंजी प्रशिक्षण पुनः दे तो यह परंपरागत रोजगार बुंदेलखंड में खड़ा हो सकता है। किसान की भांति बुनकरों के लिए बुनकर क्रेडिट कार्ड बनाने की जरूरत है बुनकरों द्वारा बुने गए कपड़े का मूल्य बुनकर स्वयं तय करें बुनकर द्वारा बुने गए कपड़े को रोज मिलिट्री हॉस्पिटल, सरकारी स्कूलों, दफ्तरों, मल्टीनेशनल कंपनियों, आंगनबाड़ी जैसे स्थानों पर सरकार  बेचने की की व्यवस्था करें सभी 1 दिन सप्ताह में हैंडलूम के कपड़े पहने नई नई तकनीक के हैंडलूम स्टैंड लूम का आविष्कार होना चाहिए जो सौर ऊर्जा से चल सके। पंजाब में बेटी को दहेज में चरखा दिया जाता है वेदों महाभारत रामायण में भी बुनाई का जिक्र है असम में जिस लड़की को बुलाई नहीं आती उसकी शादी होना मुश्किल होता है। कुरान में भी बुनाई का जिक्र है गांधी,विनोबा को यदि हमें जिंदा रखना है तो हथकरघा चरखा को जिंदा रखना होगा सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मैंने कई गांव का और कई जिलों का भ्रमण किया जहां हजारों लोग बुनाई करते थे और आज भी बुनाई के लिए तैयार है। यह सूचना बहुत ही महत्वपूर्ण है सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए और मीडिया के लिए बुंदेलखंड के किस जिले के किस गांव में कहां पर हथकरघा संचालित था  और कहा बंद हो गया है।इसकी पूरी जानकारी हम दे सकते हैं सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते यह सूचना देना मै अपना कर्तव्य मानता हूं।  


क्या है! एक्यूपंक्चर पद्धति, एक्यूपंक्चर बिंदुओं, एक्यूपंक्चर ट्रीटमेंट, एक्यूपंक्चर के फायदे, और एक्यूपंक्चर साइड इफेक्ट

एक्यूपंक्चर के फायदे और साइड इफेक्ट


एक्यूपंक्चर । शरीर की विभिन्न बीमारियों को दूर करने के लिए कुछ लोग दवाओं की बजाय प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लेकर ठीक होना चाहते हैं। एक्यूपंक्चर बीमारियों को ठीक करने का एक ऐसा ही माध्यम है जिसमे शरीर के विभिन्न बिंदुओं में सुई चुभाकर दर्द से राहत दिलाई जाती है। इस आर्टिकल में हम आपको एक्यूपंक्चर पद्धति, एक्यूपंक्चर बिंदुओं, एक्यूपंक्चर ट्रीटमेंट, एक्यूपंक्चर के फायदे, और एक्यूपंक्चर साइड इफेक्ट के बारे में पूरी जानकारी देंगे।
एक्यूपंक्चर क्या है? - एक्यूपंक्चर एक चिकित्सीय क्रिया  है जिसमें शरीर के कुछ विशेष प्वाइंट में सूई चुभाकर उन्हें उत्तेजित किया जाता है। सूई आमतौर पर त्वचा में डाली जाती है जो दर्द को कम करने एवं स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जाता है। माना जाता है कि एक्यूपंक्चर व्यक्ति के शरीर में ऊर्जा को संतुलित रखने का कार्य करता है और सिर दर्द, ब्लड प्रेशर, सर्दी जुकाम, खांसी और अन्य बीमारियों से व्यक्ति को दूर रखने में सहायक होता है। हजारों वर्ष पहले एक्यूपंक्चर का उपयोग सबसे पहले चीन में शुरू हुआ था लेकिन धीरे-धीरे बीमारियों को ठीक करने के लिए इसका उपयोग सभी देशों में किया जाने लगा।
एक्यूपंक्चर कैसे काम करता है? - एक्यूपंक्चर शरीर की क्रियाओं को बेहतर बनाने में मदद करता है और शारीरिक संरचना में स्थित विभिन्न प्वाइंट्स को उत्तेजित कर शरीर को बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार करता है। एक्यूपंचर प्वाइंट्स को उत्तेजित करने के लिए आमतौर पर त्वचा में सूई चुभाई जाती है। इसके बाद प्रेशर देकर, तापमान बढ़ाकर उत्तेजना को प्रभावी बनाया जाता है। इसके अलावा हाथ से मसाज करके मोक्जीबश्चन  हीट थेरेपी  कपिंग और हर्बल मेडिसिन देकर भी  एक्यूप्वाइंट को उत्तेजित किया जाता है।
यह पारंपरिक चीनी चिकित्सा एक प्राचीन दर्शन पर आधारित है जो दो विरोधी शक्तियों यिन और यांग  के संदर्भ में ब्रह्मांड और शरीर का वर्णन करती है। जब ये दो शक्तियां या बल संतुलन में होते हैं तो मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहता है। इस चिकित्सा पद्धति में ऊर्जा जिसे चीनी भाषा में ची  कहा जाता है, मेरिडियन नामक विशेष मार्ग से होकर पूरे शरीर में बहती है। ऊर्जा का यह निरंतर प्रवाह यिन और यांग नामक बलों या शक्तियों को संतुलित रखता है। हालांकि जब ऊर्जा का प्रवाह बाधित हो जाता है तो इसके कारण व्यक्ति को दर्द, शारीरिक क्रियाओं में गड़बड़ी और बीमारियां पकड़ने लगती हैं।
एक्यूपंक्चर थेरेपी अवरुद्ध ची को दोबारा से स्रावित करता है और शारीरिक प्रणालियों के माध्यम से  शरीर के अंदर की बीमारियों को ठीक करने में मदद करता है। आधुनिक रिसर्च यह दर्शाता है कि  एक्यूपंक्चर तंत्रिका तंत्र, एंडोक्राइन, प्रतिरक्षा प्रणाली, कार्डियोवैस्कुलर प्रणाली और पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याओं को ठीक करने में बहुत प्रभावी तरीके से काम करता है। शरीर की विभिन्न प्रणालियों को उत्तेजित करने, पीड़ा को दूर करने, पाचन क्रिया को ठीक रखने और संपूर्ण शरीर को स्वस्थ रखने के लिए एक्यूप्वाइंट को उत्तेजित करने में मदद करता है।
शरीर के मुख्य एक्यूपंक्चर प्वाइंट्स 
व्यक्ति के पूरे शरीर में जगह-जगह एक्यूपंक्चर प्वाइंट मौजूद होते हैं जिनकी सहायता से बीमारियों का इलाज किया जाता है। ब्लैडर, पित्ताशय, हृदय, फेफड़ा, किडनी, बड़ी आंत, लिवर, छोटी आंत, पेट, प्लीहा,  पेरीकार्डियम  सहित अन्य कई एक्यूपंक्चर प्वाइंट्स व्यक्ति के शरीर में पाये जाते हैं।
किन बीमारियों के इलाज में एक्यूपंक्चर उपयोगी है - आमतौर पर यह सभी को पता है कि अलग-अलग बीमारियों को दूर करने के लिए अलग-अलग एक्यूपंक्चर प्वाइंट्स का उपयोग किया जाता है। एक्यूपंक्चर शरीर से बीमारियों को दूर करने और एक अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक्यूपंक्चर का उपयोग पित्त संबंधी विकार, पेट के दर्द, अवसाद, सिरदर्द, हाइपरटेंशन, घुटनों के दर्द, ल्यूकोपेनिया  कमर दर्द, चेहरे के दर्द, गर्दन दर्द, मॉर्निंग सिकनेस, गर्भाशय में भ्रूण की स्थिति को ठीक करने, कंधे के दर्द, साइटिका, स्ट्रोक, दंत चिकित्सा, गुर्दे का रोग, मोच, कैंसर का दर्द, शराब की लत, डायबिटीज, अस्थमा, मोटापा, ऑस्टियोआर्थराइटिस, पुरुषों में यौन उत्तेजना की कमी, महिलाओं के स्तन में दूध न आना, अनिद्रा, मांसपेशियों में दर्द सहित सैकड़ों बीमारियों के इलाज में किया जाता है।
चिंता दूर करने में एक्यूपंक्चर के फायदे - स्टडी में पाया गया है कि एक्यूपंक्चर का प्रभाव चिंता को दूर करने में मदद करता है। विशेषज्ञों ने एक्यूपंक्चर और  चिंता के बीच एक सकारात्मक संबंध होने का दावा किया है और कहा है कि  एक्यूपंक्चर का सही तरीके से अभ्यास करने से जो लोग चिंता, तनाव और डिप्रेशन की दवाएं खाते हैं उन दवाओं की खुराक कम हो सकती है। पुराने डिप्रेशन से निजात दिलाने के साथ ही एक्यूपंक्चर माइग्रेन की समस्या को दूर करने में भी मदद करता है।
एक्यूपंक्चर के फायदे नींद की समस्या में - अध्ययनों से पता चला है कि एक्यूपंक्चर रात में  मेलाटोनिन नामक हार्मोन के स्राव को बढ़ाने में मदद करता है जिसके कारण अनिद्रा की समस्या से निजात मिलती है। पांच हफ्तों से भी कम समय तक प्रतिदिन एक्यूपंक्चर का सही तरीके से अभ्यास करने से  व्यक्ति को नींद न आने की परेशानी से छुटकारा मिल जाता है। इसलिए यदि आप नींद के लिए दवा खाते हों तो आपको एक्यूपंक्चर का अभ्यास जल्द शुरू कर देना चाहिए।
उल्टी और मितली से बचाने में एक्यूपंक्चर के फायदे - हर व्यक्ति की कलाई के पास एक विशेष एक्यूपंक्चर प्रेशर प्वाइंड होता है  जिसे दबाने पर यह उत्तेजित होता है और उल्टी एवं जी मिचलाने की समस्या को दूर करने में मदद करता है। सर्जरी के बाद मरीज जब एनेस्थीसिया के प्रभाव से बाहर निकलने की कोशिश करता है तो उस दौरान उसे सबसे ज्यादा उल्टी महसूस होती है। ऐसी स्थिति में एक्यूपंक्चर एंटीमेटिक दवाओं के रूप में कार्य करता है और व्यक्ति के उल्टी और जी मिचलाने की समस्या से बचाने में मदद करता है।
अर्थराइटिस के इलाज में एक्यूपंक्चर के फायदे - यह साबित हो चुका है कि एक्यूपंक्चर गंभीर पीठ दर्द और कमर के दर्द की समस्या को दूर करने में प्रभावी तरीके से कार्य करता है। एक स्टडी में पाया गया है कि आठ हफ्ते तक लगातार एक्यूपंक्चर का अभ्यास करने से  गर्दन का दर्द, अर्थराइटिस, कंधे का दर्द और सिरदर्द से काफी राहत मिलता है। इसके अलावा सही तरीके और सही एक्यूपंक्चर प्रेशर प्वाइंट से इसका अभ्यास करने से ऑस्टियोअर्थराइटिस और मांसपेशियों में दर्द की समस्या से भी निजात मिल जाता है।
एक्यूपंक्चर के फायदे यादाश्त सुधारने में -कुछ शुरूआती शोधों से पता चलता है कि एक्यूपंक्चर पर्किंसन की बीमारी को दूर करने में बहुत प्रभावी तरीके से कार्य करता है। बढ़ती उम्र के कारण व्यक्ति के मस्तिष्क तंत्रिकाएं जैसे पुटामेन  और थैलमस भी प्रभावित होता है जिसके कारण उसकी यादाश्त कमजोर हो जाती है और उसे भूलने की बीमारी लग जाती है। डॉक्टरों का मानना है कि पर्किंसन के रोगियों के इलाज में एक्यूपंक्चर बहुत सहायक होता है।
गर्भावस्था में दर्द से राहत दिलाने में एक्यूपंक्चर के फायदे - गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में स्ट्रेस को कम करने और हार्मोन को संतुलित रखने में एक्यूपंक्चर बहुत लाभदायक होता है। इसके अलावा यह प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले दर्द को भी कम करने में मदद करता है। यह प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के होने वाली सामान्य समस्याओं के लक्षणों को दूर करने में मदद करता है और बच्चे की सेहत को भी ठीक रखता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर महिलाओं को एक्यूपंक्चर का अभ्यास करने की सलाह देते हैं। हालांकि इस अवस्था में डॉक्टर की देखरेख में ही गर्भवती महिलाओं को एक्यूपंक्चर का अभ्यास करना चाहिए।
एक्यूपंक्चर साइड इफेक्ट (नुकसान)- हालांकि एक्यूपंक्चर का अभ्यास करने से एनर्जी बढ़ती है लेकिन कभी-कभी थोड़ी ही देर बाद व्यक्ति को अधिक थकान महसूस होने लगती है। एक्यूपंक्चर के बाद थकान होना कोई चिंता की बात नहीं होती है लेकिन  व्यक्ति को काफी अधिक थकान का अनुभव हो सकता है।
शरीर के जिस भाग में एक्यूपंक्चर सूई  डाली जाती है, सूई निकालने के बाद व्यक्ति को वहां दर्द हो सकता है। यह आमतौर पर  हाथ, पैर, बड़ी आंत और अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच पाये जाने वाले एक्यूपंक्चर प्रेशर प्वाइंट पर अधिक होता है। इसके अलावा जिस हिस्से में सूई डाली जाती है, उस हिस्से के आसपास की मांसपेशियों में भी दर्द हो सकता है।
ज्यादातर व्यक्तियों के शरीर के जिस भाग के एक्यूपंक्चर प्वाइंट में सूई डाली जाती है वहां चोट या घाव का निशान पड़ जाता है। यह निशान लंबे समय तक बना रहता है। इसलिए एक्यूपंक्चर का यह एक नुकसान हो सकता है।
एक्यूपंक्चर के बाद व्यक्ति के सिर में हल्का दर्द हो सकता है और कभी-कभी मरीज बेहोश भी हो सकता है। इसके अलावा एक्यूपंक्चर इलाज के बाद वह खुद को शारीरिक एवं भावनात्मक रूप से कमजोर महसूस कर सकता है।
एक्यूपंक्चर ट्रीटमेंट के बाद व्यक्ति के शरीर के एक्यूपंक्चर प्वाइंट पर खुजली और दर्द हो सकता है। कभी-कभी यह खुजली काफी अधिक बढ़ जाती है जिसके लिए व्यक्ति को अलग से इलाज कराने की जरूरत पड़ती है।


 


नैनो फाइबर से बना फ्लोटिंग ब्रिक्स व हेयर कलर पढ़ें कैसे

अब बिहारी का एक और नया आविष्कार अब पानी में तैरेगी ईंट



बिहार । क्या आपने कभी सोचा कि  केले के थंब(तना) और उसके पत्ते से नेचुरल हेयर कलर बनाया जा सकता है. ऐसी  ईंट जो कभी पानी में डूबेगी नहीं. अगर नहीं तो मिलिए नवगछिया, ध्रुवगंज, भागलपुर के गोपाल से जिन्होंने ऐसा कमाल कर दिखाया है. महज 19 साल के गोपाल को 14 साल की उम्र में यंगेस्ट साइंटिस्ट ऑफ इंडिया के खिताब से नवाजा जा चुका है. इनका सपना भारत को अपने आविष्कारों से नोबल प्राइज दिलाना है. उन्हें अपने द्वारा बनाये गये गोपनिम एलॉय के लिए नासा(नेशनल एरोनाॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) की ओर से दो बार चिट्ठी भी भेजी गयी. नासा ने 23 मई को भी गोपाल के साथ काम करने के लिए चिट्ठी भेजी लेकिन उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि उन्हें सिर्फ अपने देश के लिए काम करना है. गोपाल बताते हैं कि उन्होंने कुल दस आ‌विष्कार किये हैं, जिसमें चार पेटेंट के लिए भेजे गये हैं. इनमें पेपर बेस्ड इलेक्ट्रिसिटी(पेटेंट), बनाना बायो सेल(पेटेंट), गोपनियम एलॉय, जी-स्टार पाउडर, हाइड्रोइलेक्ट्रिक बायो सेल, सोलर माइल, गोपा-अलासका, सूडो प्लास्टिक, लीची वाइन  आदि हैं.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके आविष्कार को न सिर्फ सराहा बल्कि गोपाल को 2017 में अहमदाबाद स्थित नेशनल इनोवेटिव फाउंडेशन में भेजा, जहां पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर के सबसे युवा रिसर्च स्कॉलर के तौर पर काम किया.
नैनो फाइबर से बनाया फ्लोटिंग ब्रिक्स व हेयर कलर: फिलहाल गोपाल बनाना(केला) नैनो क्रिस्टल और फाइबर पर काम कर रहे हैं. केले के तने से नैनो फाइबर और फाइबर पहले बनाया गया. ये नैनो फाइबर तरल पदार्थ को सोखने का काम करते हैं. यही वजह है कि इससे ईंट तैयार की जा रही है. ईंट कभी पानी में डूबेगी नहीं, जिसे फ्लोटिंग ब्रिक्स का नाम दिया गया है. इन ईंटों से बनने वाले घर आम घरों से ज्यादा ठंडे होंगे. इसके अलावा नैनो फाइबर का इस्तेमाल बच्चों के डायपर, सेनेटरी नैपकिन, बैंडएड आदि बनाने के प्रयोग में लाया जायेगा. वहीं नैनो फाइबर के इस्तेमाल के बाद जो फाइबर रह जाता उससे बुलेट शीट बनाया जा रहा है. केले के पत्तों से फाइबर शीट बनाया जा रहा है जिसकी मदद से फाइल कवर, टिशू पेपर  और बुक कवर आदि बनेगा. वहीं केले से पत्तों से निकलने वाले रस को फरमेंटेशन कर इथनॉल बनाया जा रहा है. जिसे वेपेराइज कर हेयर कलर बनाया जाया रहा है. इन सभी का लैब में काम किया जा चुका है। गोपाल की झोली में ढेरों इनाम हैं. विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय के द्वारा नेशनल इंस्पायर अवार्ड, बिहार सरकार द्वारा स्टेट लेवल पर इंस्पायर अवार्ड, प्राइड ऑफ भागलपुर अवार्ड, कैरियर टुडे संस्था की ओर से ब्रेन ऑफ बिहार अवार्ड मिले. इसके अलावा अक्तूबर में दिल्ली में इन्हें नेशनल यूथ आइकॉन अवार्ड दिया जायेगा.


गोपाल के पिता किसान हैं और वह केले की खेती करते थे. गोपाल अपने पिता के साथ खेत जाते थे. 2008 में बाढ़ में केले की खेती को काफी नुकसान हुआ. नुकसान की वजह से गोपाल के घर की आर्थिक स्थिति काफी तंग हो गयी. जिसके बाद गोपाल ने ठान लिया  कि केले के सभी बर्बाद होने वाले थंब(तना) से वह जरूर कुछ बनायेंगे, जिससे  बाढ़ के कारण होने वाले नुकसान को पूरा किया जा सके. उन्होंने देखा कि केले के थंब से रस लग जाने से दाग लग जाता है. उसने सोचा कि केले के थंब में भी एसिड का गुण है. इसी दौरान उन्होंने पढ़ा कि एसिड का एलेक्ट्रोलाइसिस कर चार्ज पैदा किया जाता है. वह स्कूल से वोल्ट मीटर और इलेक्ट्रोड लाये और केले के थंब पर यह प्रयोग किया तो उससे चार्ज बना जो बिजली पैदा कर सकती थी. उनके इस प्रयोग को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता पर पुरस्कृत किया गया. उन्हें 2014 में इंस्पायर अवार्ड भी मिला. 


 


भारतीय दण्ड संहिता की महत्वपूर्ण धाराओं के नाम, अपराध और मिलने वाली सजा

भारतीय दण्ड संहिता की महत्वपूर्ण धाराओं के नाम, अपराध और मिलने वाली सजा- भारतीय समाज को कानूनी रूप से व्यवस्थित रखने के लिए सन 1860 में लार्ड मेकाले की अध्यक्षता में भारतीय दंड संहिता बनाई गई थी। इस संहिता में भारतीय संविधान की विभिन्न आपराधिक धाराओं और उनकी सजा का उल्लेख किया गया है।
भारतीय दण्ड संहिता भारत के अन्दर ;जम्मू एवं कश्मीर को छोडकरद्ध भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा व दण्ड का प्रावधान करती है। किन्तु यह संहिता भारत की सेना पर लागू नहीं होती। जम्मू एवं कश्मीर में इसके स्थान पर रणबीर दण्ड संहिता लागू होती है।इस में कुल मिला कर 511 धाराएं हैं। यहाँ कानून की विभिन्न धाराएं और उनकी सजा का वर्णन किया है-
अपराध की विभिन्न धाराओं के नाम और उनकी सजा की सूची-
धाराओं के नामअपराध सजा 13 जुआ खेलना/सट्टा लगाना 1 वर्ष की सजा और 1000 रूपये जुर्माना। 34सामान आशयदृ99 से 106 व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के लिए बल प्रयोग का अधिकारदृ110 दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है -तीन वर्ष120 षडयंत्र रचना दृ141विधिविद्ध जमाव दृ147बलवा करना 2 वर्ष की सजा/जुर्माना या दोनों। 161 रिश्वत लेना/देना3 वर्ष की सजा/जुर्माना या दोनों171चुनाव में घूस लेना/देना। 1 वर्ष की सजा 500 रुपये जुर्माना। 177 सरकारी कर्मचारी/पुलिस को गलत सूचना देना 6 माह की सजा 1000 रूपये जुर्माना।186सरकारी काम में बाधा पहुँचाना 3 माह की सजा 500 रूपये जुर्माना। 191 झूठी गवाही देनादृ193 न्यायालयीन प्रकरणों में झूठी गवाही 3/7 वर्ष की सजा और जुर्माना। 201सबूत मिटानादृ216लुटेरे/डाकुओं को आश्रय देने के लिए दंडदृ224/25विधिपूर्वक अभिरक्षा से छुड़ाना-2 वर्ष की सजा/जुर्माना/दोनों। 231/32जाली सिक्के बनाना-7 वर्ष की सजा और जुर्माना 255सरकारी स्टाम्प का कूटकरण-10 वर्ष या आजीवन कारावास की सजा। 264गलत तौल के बांटों का प्रयोग-1 वर्ष की सजा/जुर्माना या दोनों 267औषधि में मिलावट करना।दृ272 खाने/पीने की चीजों में मिलावट-6 महीने की सजा/1000 रूपये जुर्माना274 /75मिलावट की हुई औषधियां बेचनादृ279सड़क पर उतावलेपन/उपेक्षा से वाहन चलाना 6 माह की सजा या 1000 रूपये का जुर्माना। 292अश्लील पुस्तकों का बेचना 2 वर्ष की सजा और 2000 रूपये जुर्माना। 294 किसी धर्म/धार्मिक स्थान का अपमान 2 वर्ष की सजा। 302हत्या/कत्लआजीवन कारावास/मौत की सजा 306आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण10 वर्ष की सजा और जुर्माना। 309 आत्महत्या करने की चेष्टा करना 1 वर्ष की सजा/जुर्माना/दोनों। 310 ठगी करना आजीवन कारावास और जुर्माना। 312गर्भपात करनादृ। 323जानबूझ कर चोट पहुँचाना। 351हमला करना। 354किसी स्त्री का शील भंग करना 2 वर्ष का कारावास/जुर्माना दोनों 362अपहरण दृ363 किसी स्त्री को ले भागना 7 वर्ष का कारावास और जुर्माना। 366नाबालिग लड़की को ले भागनादृ376 बलात्कार करना 10 वर्ष/आजीवन कारावास। 377अप्राकृतिक अपराध वर्ष की सजा और जुर्माना। 379 चोरी ;सम्पत्तिद्ध करना 3 वर्ष का कारावास /जुर्माना/दोनों। 392 लूट 10 वर्ष की सजा 395 डकैती 10 वर्ष या आजीवन कारावास। 396 डकैती के दौरान हत्या दृ415 छल करना।दृ417 छल/दंगा करना 1 वर्ष की सजा/जुर्माना/दोनों। 420 छल/बेईमानी से सम्पत्ति अर्जित करना 7 वर्ष की सजा और जुर्माना। 445 गृहभेदंनदृ446 रात में नकबजनी करनादृ426किसी से शरारत करना 3 माह की सजा/ जुर्माना/दोनों। 463कूट-रचना/जालसाजीदृ477;कद्ध झूठा हिसाब करना।दृ489 जाली नोट  बनाना /चलाना10 वर्ष की सजा/आजीवन कारावास। 493 पर स्त्री से व्यभिचार करना10 वर्षों की सजा। 494पति/पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना। 7 वर्ष की सजा और जुर्माना। 498;अद्ध अपनी स्त्री पर अत्याचार 3 वर्ष तक की कठोर सजा। 497 जार कर्म करना  5 वर्ष की सजा और जुर्माना। 499 मानहानिदृ500 मान हानि 2 वर्ष की सजा और जुर्माना। 509 स्त्री को अपशब्द कहना। अंगविक्षेप करना, सादा कारावास या जुर्माना। 511 आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों को करने के प्रयत्न के लिए दंड।


 


 


देश के कानून के अंतर्गत आने वाले 5 महत्वपूर्ण तथ्य

ये वो महत्वपूर्ण तथ्य है, जो हमारे देश के कानून के अंतर्गत आते तो है पर हम इनसे अंजान है। हमारी कोशिश होगी कि हम आगे भी ऐसी बहोत सी रोचक बाते आपके समक्ष रखे, जो आपके जीवन में उपयोगी हो।
1. शाम के वक्त महिलाओं की गिरफ्तारी नहीं हो सकती- कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर, सेक्शन 46 के तहत शाम 6 बजे के बाद और सुबह 6 के पहले भारतीय पुलिस किसी भी महिला को गिरफ्तार नहीं कर सकती, फिर चाहे गुनाह कितना भी संगीन क्यों ना हो। अगर पुलिस ऐसा करते हुए पाई जाती है तो गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत ;मामलाद्ध दर्ज की जा सकती है। इससे उस पुलिस अधिकारी की नौकरी खतरे में आ सकती है।
2. सिलेंडर फटने से जान-माल के नुकसान पर 40 लाख रूपये तक का बीमा कवर क्लेम कर सकते है- पब्लिक लायबिलिटी पालिसी के तहत अगर किसी कारण आपके घर में सिलेंडर फट जाता है और आपको जान-माल का नुकसान झेलना पड़ता है तो आप तुरंत गैस कंपनी से बीमा कवर क्लेम कर सकते है। आपको बता दे कि गैस कंपनी से 40 लाख रूपये तक का बीमा क्लेम कराया जा सकता है। अगर कंपनी आपका क्लेम देने से मना करती है या टालती है तो इसकी शिकायत की जा सकती है। दोषी पाये जाने पर गैस कंपनी का लायसेंस रद्द हो सकता है।
3. आप किसी भी होटल में फ्री में पानी पी सकते है और वाश रूम इस्तमाल कर सकते है- इंडियन सीरीज एक्ट, 1887 के अनुसार आप देश के किसी भी हॉटेल में जाकर पानी मांगकर पी सकते है और उस हॉटल का वाश रूम भी इस्तमाल कर सकते है। होटल छोटा हो या 5 स्टार, वो आपको रोक नही सकते। अगर होटल का मालिक या कोई कर्मचारी आपको पानी पिलाने से या वाश रूम इस्तमाल करने से रोकता है तो आप उन पर कारवाई कर सकते है। आपकी शिकायत से उस होटेल का लायसेंस रद्द हो सकता है।
4. गर्भवती महिलाओं को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता-मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 के मुताबिक गर्भवती महिलाओं को अचानक नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। मालिक को पहले तीन महीने की नोटिस देनी होगी और प्रेगनेंसी के दौरान लगने वाले खर्चे का कुछ हिस्सा देना होगा। अगर वो ऐसा नहीं करता है तो उसके खिलाफ सरकारी रोजगार संघटना में शिकायत कराई जा सकती है। इस शिकायत से कंपनी बंद हो सकती है या कंपनी को जुर्माना भरना पड़ सकता है।
5. पुलिस अफसर आपकी शिकायत लिखने से मना नहीं कर सकता- आईपीसी के सेक्शन 166ए के अनुसार कोई भी पुलिस अधिकारी आपकी कोई भी शिकायत दर्ज करने से इंकार नही कर सकता। अगर वो ऐसा करता है तो उसके खिलाफ वरिष्ठ पुलिस दफ्तर में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। अगर वो पुलिस अफसर दोषी पाया जाता है तो उसे कम से कम 6 महीने से लेकर 1 साल तक की जेल हो सकती है या फिर उसे अपनी नौकरी गवानी पड़ सकती है।


अदालत का अधिकार 

यदि अभियोग पक्ष बार-बार अवसर मिलने पर भी अपने गवाहों को भी पेश नहीं कर पाता है तो मजिस्ट्रेट क्रिमिनल प्रोसीजर के तहत अभियोग को समाप्त कर सकता है ।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अगर दो वर्षों और साथ में तीन और महीनों के बाद भी यदि पुलिस चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती तो यह माना जा सकता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं है, सरकार ऐसे केसों को वापस ले सकती है ।
क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 की धारा 468 की उपधारा 2 के मुताबिक वे कैदी जिनके खिलाफ पुलिस चार्जशीट दाखिल नहीं करती उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और उन्हें तुरंत छोड़ दिया जाना चाहिए,  क्योंकि उन्हें जेल में रखना गैरकानूनी होगा और साथ ही अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए उनके मूलभूत अधिकारों का खंडन भी होगा ।
क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 की धारा 167 (5) में कहा गया है कि यदि किसी मुकदमे के बारे में मजिस्ट्रेट सोचता है कि यह सम्मन मुकदमा है और जिस तारीख से अभियुक्त गिरफ्तार हुआ है उससे 6 महीने के अंदर तहकीकात समाप्त नही होती, मजिस्ट्रेट अपराध के बारे में और तहकीकात को रुकवा सकता है , लेकिन अगर जो अधिकारी तहकीकात कर रहा है वह मजिस्ट्रेट को इस बात के लिए संतुष्ट कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में तहकीकात 6 महीनों के बाद चालू रहे तो तहकीकात चालू रह सकती है । 
क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 (2) में दी गयी शर्त के मुताबिक मजिस्ट्रेट अभियुक्त को 15 दिन से ज्यादा जेल में रखने का आदेश दे सकता है अगर वह इस बात से संतुष्ट है कि ऐसा करने के पर्याप्त कारण हैं । कैदियों को समय-समय पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करते रहना चाहिए।हाईकोर्ट को यह अधिकार है कि वो विचाराधीन कैदियों के मुकदमों का निरीक्षण करे यह देखने के लिए कि किसी राज्य में मजिस्ट्रेट संहिता के प्रावधानों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक यदि किसी बच्चे के अपराध की सजा सात साल से अधिन न हो , शिकायत दर्ज होने की तारीख या एफआईआर दर्ज होने की तारीख से तीन महीने का समय तहकीकात के लिए अधिकतम समय माना जायेगा और चार्जशीट दाखिल करने के बाद 6 महीने का समय है जिसमें बच्चे का मुकदमा हर हाल में पूरा हो जाना चाहिए । यदि ऐसा नही किया जाता है तो बच्चे के खिलाफ अभियोग रद्द किया जा सकता है ।अनुच्छेद 21 के अनुसार यदि मृत्युदण्ड को पूरा करने में देरी हो जाती है , जिससे मृत्युदण्ड पाने वाले को मानसिक कष्ट व यंत्रणा मिलती है तो यह अनुच्छेद 21 का खंडन है । इसलिए मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है ।
सरकार का कर्तव्य
अनुच्छेद 39-। के मुताबिक सरकार समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ावा दे तथा उचित कानून व योजना बनाकर निरूशुल्क कानूनी सहायता दे और यह भी देखे कि आर्थिक विपन्नता या दूसरी कमियों के कारण किसी भी नागरिक को न्याय मिलने के अवसर से वंचित नहीं रहना पड़े ।
गरीबों को निःशुल्क कानूनी सेवा न केवल संविधान का समान न्याय का आदेश है जो अनुच्छेद 14 में दिया गया है और जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार जो अनुच्छेद 21 में दिया गया है बल्कि संवैधानिक निर्देश है जो अनुच्छेद 39-। में दिया गया है ।


Thursday, September 26, 2019

ट्रैक्टर खा गया गांव की  बेलगाड़ी

सोचो, ट्रैक्टर खा गया गांव की  बेलगाड़ी को उसके पहिया बनाने वाले कारीगरों के हाथों को बुंदेलखंड के 13 जिलों के 11000 गांव में 9 लाख 50 हजार बैलगाड़ी थी। हर गांव में 95 बैलगाड़ी थी इसको बनाने वाले कारीगर या तो बूढ़े हो गए अथवा काम न मिलने के कारण पलायन कर गए गांव से |



यह गाड़ी बैलों से खींची जाती है।इसका नाम बैलगाड़ी हुआ यह विश्व का सबसे पुराना यातायात का साधन है, सामान ढोने का साधन है, पहिया मात्र बैलगाड़ी नहीं है जीवन है, जीवन जीने की युक्ति है। इन पहियों से जीवन की नई शुरुआत होती है पहिया हमें संदेश देता है निरंतर चलते रहो यह लकड़ी के पहिया आपको मंजिल तक पहुंचाते हैं यह गांव गरीब की रेलगाड़ी है जो बिना पेट्रोल के बिना इंजन की चलती है बगैर बिजली के यहां तक कि बिना ड्राइवर के, यह पहिया घर से बीज खेत को देते हैं। खेत से खलियान को देते हैं, खलिहान से घर को देते हैं, घर से बाजार को देते हैं, बाजार से फिर घर लाते हैं आपकी इच्छा पूरी कर के।बुंदेलखंड में लकड़ी के पहिया लकड़ी की गाड़ी स्थानीय बढ़ाई कारीगरों द्वारा बनाई जाती थी यह कारीगर 12 महीने बबूल की लकड़ी से बैल गाड़ी के पहिए बनाते थे जब ट्रैक्टर नहीं था। लंबी दूरी की यात्रा बैलगाड़ी से होती थी। इमरजेंसी के लिए एक पहिया अलग से गाड़ी में रखा जाता था इस बैलगाड़ी की त्योहारों में नजर उतारी जाती थी। साफ-सुथरा कर रंग रोशन कर पूजा की जाती थी बैलों को रंगो से रंगा जाता था गले में घंटी बांधी जाती थीगाड़ी को चमकाया जाता था पहियों को तेल पिलाय जाता था। मनुष्य ने खेती कब शुरू की इसका उत्तर सहज नहीं है शायद आदिमानव जब मानव बना तबसे सभी समस्याओं का हल उसने लकड़ी के हल से ढूंढा, सहायता के लिए लकड़ी की गाड़ी बनाई, गाड़ी में पहिया लगाए ना तो हल में लोहा लगाया, ना पहिया में लोहा लगाया न, गाड़ी में लोहा लगाया कितनी बड़ी तकलीफ थी उस जमाने के महापुरुषों में इस गाड़ी को बनाने वाले को विश्वकर्मा की उपाधि थी। तब जातियां नहीं थी जिनके हाथों से विशव का निर्माण हुआ  विश्व के मानव जाति को कर्म करने की प्रेरणा दी विश्वकर्मा आज अपने जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस ट्रैक्टर युग ने गांव के उन इंजीनियरों को भागने पर मजबूर कर दिया जो बैल गाड़ी का पहिया, हल, चारपाई, वखर, हसिया, खुरपी, कुदाली, फावणा,  आटा पीसने का जतवा, अनाज कूटने का मुंसर, कृषि से  संबंधित वे सभी औजार गांव में ही बनाते थे। जो आज अच्छे से अच्छे इंजीनियर शहर में नहीं बना सकता, मेरे गांव के बढाई चाचा, लोहार चाचा को मैं बचपन से देखते चला रहा हूं। वह गांव के किसानों का काम ईमानदारी से करते थे किसान भी इनका बहुत सम्मान करते थे किसानी के औजार के सबसे बड़े डॉक्टर थे। हर गांव में पूरे बुंदेलखंड में इनकी संख्या 96612 थी। प्रत्येक गांव में कम से कम पांच पांच परिवार इन कारीगरों के हुआ करते थी। सबसे अधिक बैलगाड़ी बांदा जिले के गांव में थी ऐसा उल्लेख गजट ईयर में किया गया है आज किसी भी गांव में, वा शहर में ना तो नई बैल गाड़ी के पहिया बनाने वाले हैं, ना ही बैलगाड़ी मै कई गांव मे सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते  घुमा कई दिनों के बाद मुझे बबेरू में जो अतर्रा रोड पर 78 वर्ष उम्र के शिव गुलाम बढ़ाई विश्वकर्मा जो झोपड़ी में रह कर कार्य करते हैं मिले जो आज भी बैल गाड़ी का पहिया बनाते हैं। बड़े दुख के साथ कहते हैं कि यह हमारा पैतृक धंधा है, कई पीढ़ियों से कर रहे हैं उस जमाने में बैल गाड़ी के पहिया की 20 अंगुल, ₹20 जोड़ी मे बिकती थी, 2005 में 28 अंगुल परिया की कीमत ₹3000 थी, साल भर में 50 जोड़ी पहिया बिक जाते थे वर्तमान में 4 माह से एक जोड़ी पहिया नहीं बिका। ट्रैक्टर हमारी रोजी रोटी खा गया, भविष्य की पीढ़ी का हुनर खा गया, हमको भी कलाकारों की भांति जीवन यापन के लिए पेंशन चाहिए ना जमीन है, ना कोई दूसरा धंधा जानते हैं। यही एक उदाहरण है लगभग बुंदेलखंड के हर गांव के कारीगरों की यही दशा है जो बुजुर्ग हैं, इनके हुनर से देशभर का पेट भरा गया आज यह खुद भूखे हैं, इनकी कौन सुनेगा और क्यों सुनेगा मशीन के युग में बहुत बुद्धिमान समाज को अब क्या जरूरत है। यही एक बड़ा प्रश्न है? हमारा देश गांव की कुटीर उद्योग से चलता था। कुटिर उद्योग में इनका बड़ा भारी योगदान है खेत खलियान गांव के विकास में यह पूरे सहभागी थे। भारत के गांव के लकड़ी की सबसे पुराने जहाज को बनाने वाले कारीगर की बदौलत हर गरीब से गरीब किसान के पास अपना बगैर बैंक कर्ज का निजी हल था, बैल था, बैलगाड़ी थी।इनको बनवाने व खरीदने के लिए बैंक से लोन नहीं लेना पड़ता था आज हर किसान के पास ट्रैक्टर नहीं है, लेकिन जिसके पास है लाखों रुपए बैंक का कर्ज है, जमीन बिक रही है किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्योंकि शायद इसलिए कि हल बैल गाड़ी बनाने वाले की कीमत तुम्हारे समझ में नहीं आई। क्योंकि वह सस्ता था सुलभ था आज भी बचाया जा सकता है, भविष्य में इनकी जरूरत पड़ेगी। मैं बचपन में अपनी बाबा के साथ बैल गाड़ी में बैठ कर दीपावली के समय पास के गांव में मेला देखने जाता था। हजारों बैलगाड़ियां हुआ करती थी, बाबा दाई  किस्से कहानी सुना करते थे। अपनी बैलगाड़ी को साफ सुथरा करते थे मेरे गांव में कई प्रकार के लकड़ी के हाल बना करते थे पहले छोटे, बड़े, मझोले बना करते थे। बैलगाड़ी भी कई प्रकार की बनती थी लकड़ी की, आज सब खत्म हो गया। यह सूचना में आप सबसे इस अनुरोध के साथ साझा कर रहा हूं कि इस दिशा में प्रयास किया। जाए यदि एक सूचना ठीक लगे तो आगे तक ले जाएं गलत हो तो क्षमा कर दे। जय जगत उमाशंकर पांडे सर्वोदय कार्यकर्ता बांदा बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश।
    मुझे एक कहानी याद आती है जो 1991 में एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में छपी थी अमेरिका के कुछ लोग खजुराहो के पास एक गांव में घूमने के लिए गए उन्होंने गांव के कारीगर को लकड़ी की बैलगाड़ी का पहिया बनाते देखा।उनके मन में प्रश्न उठा कि भारत के कारीगर कितने योग्य कि पूरे पहिए में कहीं भी एक कील लोहा नहीं लगा कील भी लकडी की, उसे बैलगाड़ी में लगाया और उसके ऊपर 1 टन वजन रखा 10 कुंटल रखा और खुद गाड़ी के ऊपर 10 किलोमीटर बैठकर यात्रा की। उनके समझ में आ गया कि भारत के गांव के यही असली इंजिनियर है। जिन्होंने एक भी लोहे की कील नहीं लगाई पहिए में, यह अमेरिका के इंजीनियरों से ज्यादा बुद्धिमान है। क्योंकि अमेरिका में तांगा, इक्का, खेती के औजार में लकड़ी कम, लोहा ज्यादा लगता है। भारत के कृषि औजारों में लकड़ी ही लगती है, लोहा नाममात्र का है  वे इस तकनीक को अमेरिका ले जाने के लिए 2 जोड़ी लकड़ी के पहिया अमेरिका ले जाने के लिए 15 दिन खजुराहो में पड़े रहे। एयरपोर्ट अथॉरिटी भारत सरकार ने जब अनुमति दी तब वह अपने साथ भारत से बैलगाड़ी के पहिया ले गए यह एक उदाहरण है। आचार्य विनोबा जी, गांधीजी सर्वोदय विचारधारा ने गांव के किसान की गाड़ी  को सबसे उत्तम आवागमन का साधन माना। हम सब मिलकर इस दिशा में काम करने के लिए आगे आए गांव के पहिए के इंजीनियरों को बजाएं। सोचे वंदे मातरम


आतंक की खैर नहीं

 

आतंक की अब खैर नही

दहाड़ रहा हिन्दुस्तान 

आतंक के परवरिशकर्ताओं को

निर्णायक सबक देगा हिन्दुस्तान

 

भरी महफिल में उतर रहा शुरूर

फिर भी न तेरा कम हुआ गुरूर

चुन चुन कर तेरा बखान हुआ

देख लो पाक दुनियां में 

हिन्दुस्तान का कितना सम्मान हुआ।

 

एक तरफ आतंकिस्तान

दूसरे तरफ विकासीस्तान

तू साजिश करता गया

और तेरा दिवाला निकल गया।

मदद करने वाला हिन्द देखो

तुमसे कितना आगे निकल गया।

 

अब तो खाने के भी 

दाने नही तेरे पास

त्राहि त्राहि कर रहा 

तेरे देश की अवाम।

 

बूरे कर्म का बूरा नतीजा

तो होना ही था

पाला पोशा दहशतगर्द को

तुझे तबाह तो होना ही था।

 

                                आशुतोष

Tuesday, September 24, 2019

पान के किसानों का प्राकृतिक आपदा, प्रशासनिक व जनप्रतिनिधियों द्वारा उपेक्षा


बांदा के इस गांव में पान की आढत लगती थी इस गांव का पान देश के कई महानगरों के साथ नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान सहित कई देशों में बेचा जाता था। इस गांव में सरकार भी पान पैदा कर बेचती थी। महाभारत काल से पुराना है।यह गांव केवल पान के किसानों का था जो प्राकृतिक आपदा, प्रशासनिक व तत्कालीन जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण पूरी तरह पान व्यवसाय समाप्त हो गया है। पान के किसान बकरी, भैंस चरा, सड़क पर पूजा सामग्री बेचकर अपना जीवन काट रहे हैं किसी समय 5000 की आबादी से अधिक के गांव में वर्तमान में 600 व्यक्ति बचे हैं। बाकी पान के किसान महानगरों में अपने बच्चो वा बड़ों के उधर पोषण के लिए पलायन कर गए। यह गांव बराई मानपुर जो ब्लाक महुआ तहसील नरैनी  जिला बांदा के अंतर्गत आता है और इस गांव में केवल चैरसिया जिन्हें पूर्व में बरई कहा जाता था। उनका एक मात्र गांव इतिहास कालीन यह है। यहां के चैरसिया उत्तर प्रदेश मे मध्य प्रदेश मे वा भारत के कई राज्यों में बस गए हैं स्वरोजगार के कारण यह गांव इतिहास में राजा नल की पत्नी दमयंती के मौसा चेदि राज्य के राजा थे उनकी राजधानी सूक्तिमती नगरी थी।राजा नल राम के पूर्वज ऋतु पर्ण के समकालीन थे।उनके बाद राम यहाँ आए।महाभारतकालीन राजा शिशुपाल यहाँ के राजा थे।जो महाभारत काल से पुराना है सुक्त मती नगरी थी। मुगलकालीन सल्तनत का राज्य यही से संचालित होता था। कालिंजर और महोबा से शायद यह नगर पुराना है। ऐसा पुरातत्व खोजकर्ता माननीय श्री विजय कुमार जी अपर पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश बताते हैं केन के किनारे जल मार्ग से बड़ा व्यापारिक केंद्र भी सेवडा रहा है। आज मात्र खंडहर बचे जिन्हें देखा जा सकता है राम सोनू चैरसिया बताते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पान पौधशाला नर्सरी खोली गई थी। जिसमें इसमें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों कर्मचारी पान के साथ काम करते थे और इस पान की नर्सरी से प्रतिदिन पान बिकने के लिए बाहर जाता था। प्रशासनिक उपेक्षा के कारण पिछले 15 वर्ष से यह पान की नर्सरी पूरी तरह से बंद है उजड़ गई है जो कई एकड़ में थी केवल लोहे के खंभे और बोर्ड लगा है। महावीर चैरसिया बताते हैं कि इस गांव में 100 से अधिक कुआं है 500 परिवार केवल पान की खेती करता था। पान की मंडी थी हमारे गांव में लखनऊ, कानपुर, बरेली, बेंगलुरु, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई के व्यापारी आढ़तियों के माध्यम से गांव से पान खरीदते थे हमारे गांव में उच्च क्वालिटी का देसी पान पैदा होता था। जो हमारी कई सौ वर्ष पुरानी पीढ़ी ने हमें पान की बेल व जड़ें हमें दी थी। मुनीलाल चैरसिया बताते हैं कि मैं 200 देसी पान 2 में बेचता था 20 वर्ष पहले तक प्रतिवर्ष 20000 का पान बेच लेता था पूरा धंधा चैपट हो गया युवा किसान सोनू चैरसिया बताते हैं कि 100 बरेजा मेरे सामने लगे थे जिसमें लाखों पान रोज तोड़ा जाता।
कुछ पान किसान अपने बरेजे में सब्जी पैदा कर रहे हैं इन किसानों के भाई भतीजे चाचा प्रत्येक परिवार से अपने जीवन यापन के लिए पान व्यवसाय बंद हो जाने से पलायन कर गया है। इस गांव से किसानों द्वारा पैदा किया गया पान ट्रक व रेल के माध्यम से गलले की भांति बाहर बिक्री के लिए जाता था करोड़ों रुपए का व्यापार यहां के पान के किसान करते थे। हजारों लोगों को रोजगार मिलता था जिस गांव में स्वयं सरकार पान पैदा कर व्यापार करने लगे खुद समझिए कितना संपन्न गांव था। यहां के बुजुर्ग 5 किसान कहते हैं कि यदि सरकार हमें सहयोग करें तो पुनः एक बार हम पान की खेती करके दिखाना चाहते हैं जो हमें सपना लग रही है। जिसे खाकर सैकड़ों लड़ाई लड़ी गई उस पान के बीड़ा को जो वीरों को थाल में दिया जाता था। उसे बचाने के लिए संकट है पान एक औषधि है देसी पान वह पान है जो जमीन में गिर जाए और टुकड़े टुकड़े हो जाए पान का पत्ता पान की जड़ दोनों औषधि है। इस गांव के 3000 परिवार ने पान की खेती छोड़ दी है सरकार आम जनप्रतिनिधियों से अनुरोध है कि हमारी हजारों बरस पुरानी पान की खेती फिर शुरू कराने की योजना बनाएं।  सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मौके पर जाकर जो देखा किसानों ने चर्चा की बताया वह सब आपकी सेवा में। 
 इस व्यवसाय को खत्म करने के लिए मौसम की मार के साथ सरकारी नीतियां जिम्मेदार है।बीमा का लाभ पान के किसानों को नहीं मिलता इसे उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग में सम्मिलित किया जाना चाहिए पान के किसानों को बॉस,बल्ली तार, पॉलीथिन, पानी पाइपलाइन किसान क्रेडिट कार्ड की भांति, पान किसान क्रेडिट कार्ड बनना चाहिए। एकमुश्त अनुदान पानी के लिए ट्यूबवेल, पान अनुसंधान केंद्र के अधिकारियों कर्मचारियों को लगातार इन पान किसानों के संपर्क में रहना चाहिए तभी हम शाम के किसानों को खड़ा कर सकते हैं। 


गोबर के कंडे का इतिहास


धरोहर, गोबर कंडे का होली से क्या रिश्ता है, गोबर की राख में सोना, चांदी, बिजली, धुआं से  देवता पुरखे के प्रसन्न क्यों होते हैं। गोबर शब्द का प्रयोग गाय, बैल, भैंस के मल को कहते हैं। घास भूसा खली जो कुछ चैपाया जानवर खाते हैं उनके पाचन से निकले रासायनिक प्रक्रिया को गोबर कहते हैं, ठोस या पतला होता है, रंग पीला काला होता है इसमें घास के टुकड़े अन्न के कुछ  कर्ण होते हैं सूख जाने के बाद भी है कंडे के रूप में जाना जाता है। गाय का गोबर कंडे के लिए ज्यादा अच्छा होता है, गोबर में खनिजों की मात्रा अधिक होती है इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन, चूना, पोटाश, मैग्नीज, लोहा, सिल्कन, एलमुनियम, गंधक कुछ आंशिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं। आयोडीन की मात्रा भी होती है इसीलिए गोबर को खेत में डाला जाता है जिन कारणों से मिट्टी को उपजाऊ बनाने में खेत के लिए मदद मिलती है गोवर में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो मिट्टी को जोड़ते हैं अंदर हवा देते हैं जैसे कंपोस्ट खाद केंचुआ खाद, जैविक खाद, गोबर की खाद से धूप अगरबती तैयार होती है। गोबर के कंडों को ईंधन के रूप में प्रयोग करते हैं जिससे खाना बनता है गोबर का महत्व इस बात से लगाया जा सकता है कि सृष्टि के देवता भगवान गणेश, माता गौरी की पूजा की मूर्ति गोबर की होती है। हर शुभ कार में जमीन को गोबर से लीपा जाता है  जीवन का समय हो, मृत्यु का समय हो, शमशान जाने का समय हो, सुख का समय हो, दुख का समय हो हरित क्रांति के दौरान अधिक फसल लेने के उद्देश्य खेतों में आता अधिक फर्टिलाइजर डाला गया है।मिट्टी  में जैविक तत्व की कमी हो गई है खेत बीमार हो गए हैं उसकी बीमारी दूर करने के लिए केवल गोबर ही इलाज है गोबर की खेती से उपजे गेहूं, धान, दाल, दलहन का स्वाद व प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। यह अनाज के साथ दवा है गोबर के कंडे का धुआं शरीर के लिए फायदेमंद है कंडे के धुए से देवता प्रसन्न होते हैं ग्रह कलेश शांत होता है, कंडे का धुआं लकड़ी के अपेक्षा अधिक फायदेमंद है गाय के गोबर के कंडे ई-कॉमर्स मार्केटिंग के माध्यम से बेचे जा रहे हैं 12 कंडे 120 से अधिक में बिकते हैं। एक अध्ययन से सिद्ध हो गया है कि जिस घर में प्रतिदिन गाय के गोबर से नियमित धुआं किया जाता है उस घर में देवताओं का वास हो जाता है बीमारियां उस घर के पास तक नहीं आती उस घर का वातावरण शुद्ध होता है। परिवार के सभी सदस्य प्रसन्न रहते हैं, कंडे की आग दूध, घी, रोटी, दाल, सब्जी सबके के लिए फायदेमंद है कंडे की आग में में बनाया गया भजन सबसे अधिक पाचक होता है। एक अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार विश्व स्तरीय प्रयोगशाला ने 19 सितंबर 2016 को रिपोर्ट के दौरान यह पाया है, कि गोबर में तथा उसकी राख में सोना चांदी लोहा के साथ अन्य मिनरल पाए जाते हैं और यह शरीर के लिए फायदेमंद है इसलिए गोबर के कंडे की राख की रोटी आयुर्वेदिक विधि के अनुसार फायदेमंद है। गोबर से लीपा गया भवन वैदिक महत्त्व से मूल्यवान है। बालू, प्लास्टिक, सीमेंट की अपेक्षा 100 गुना अच्छा है यह वैदिक प्लास्टर है, गोबर में बिजली होती है जिसे सौर ऊर्जा प्लांट कहते हैं। लगभग कई गांव में चल रहे हैं कंडे की आंच से उठने वाले धुए से पुरखे प्रसन्न होते हैं, अतृप्त आत्मा तृप्त हो जाती हैं, मनुष्य का गोबर से तब तक रिश्ता रहता है जब तक वह जीवित रहता है अंतिम समय जिस तरह गोबर का कंडा राख जाता है उसी तरह मनुष्य भी राख हो जाता है। बचपन में हमारी अम्मा भोजन करने के बाद राख खाने के लिए दिया करती थी और कहती थी कि इससे खाया गया भोजन पच जाएगा। पीतल के बर्तन राख सेस साफ किए जाते थे, गोबर की होली शरीर के लिए इसलिए फायदेमंद है क्योंकि गोबर में वह सारे विटामिन पाए जाते हैं जिनके शरीर में पढ़ते ही रोग ठीक हो जाते हैं। होली का पूरा त्यौहार गोबर के विज्ञान पर आधारित है चाहे होलिका दहन हो, हर घर में गोबर के चंद्रमा, सूर्य बल्ले बनाए जाते हैं गोबर की होली खेली जाती है यह हमारी परंपरा रही है हमारे गांव जहां पर प्रकृति ने भोजन बनाने के लिए पूरे गांव में कंडे के बड़े-बड़े भट्टे बनाए रखें यह प्रकृति की देन है। आज पशुधन खत्म हो जा रहा है।भविष्य में शायद एक कंडे की भट्टी देखने को ना मिले सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मैंने जो अपने गांव में देखा आपके साथ साझा कर रहा हूं। शायद युवा पीढ़ी कुछ समझे होली सबकी शुभ हो। गोबर की होली की शुरुआत वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन उठाकर ग्वाल बालों के साथ शुरू किए क्योंकि सबसे अधिक गाय माता वहीं पर थी। हमारे बुंदेलखंड में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा होती है, गाय के गोबर से लोक देवता बनाए जाते हैं जिन्हें बासी भोजन कराया जाता है कई दिनों तक उस गोबर को पूजा के बाद खेतों में डाला जाता इससे धन, धान की वृद्धि होती है। गोबर के महत्व पर चित्रकूट कामदगिरि के प्रमुख महंत मदन गोपाल दास जी महाराज कहते हैं की हर व्यक्ति को एक गाय पाली चाहिए, गाय के गोबर से बने कंडे से रोटी बनानी चाहिए प्राकृतिक पर्यावरण दृष्टि से, गाय के गोबर की बनी रोटी से लकड़ी बचेगी पेड़ हम नहीं बना सकते पेड़ जल के लिए आवश्यक है, पर्यावरण के लिए आवश्यक है। होली पर संकल्प लें कि अगले वर्ष हम अपने गाय के गोबर से बने कंडो से दहन कर होली खेलेंगे। महोबा के प्रसिद्ध समाजसेवी श्री मनोज तिवारी जी कहते हैं कि गांव की खेती किसानी मे गोबर का बहुत महत्व है गोबर में प्राकृतिक घास फूस के गुण हैं औषधियां है किसान का मित्र है।
आयुर्वेद के जानकार प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ सचिन उपाध्याय कहते हैं कि गाय के गोबर में वे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी है। गोबर में, कंडे में, धुए मे, आग में, राख में, अलग अलग औषधि गुण है। गोबर से स्नान करने पर निरोगी जीवन के लिए बड़ा महत्व है, गोबर एक रहस्य है जिसकी अनुसंधान की बड़ी आवश्यकता है खेती के लिए , शारीरिक बीमारी के लिए, भोजन बनाने के लिए, हमारे पूर्वज  हजारों वर्षों से  गोबर के कंडे की आग पर रोटी बना रहे हैं,  वे हम से अधिक जानकार थे।


Sunday, September 22, 2019

जिसके पास लाइसेंस उसके नाम वाहन 

केंद्र सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम लागू क्या किया देश में गजब की हलचल मच गई। इसमें यातायात सुरक्षा के साथ-साथ यातायात स्वच्छता और स्वस्थता दिखाई पड़ी। कानून के मुताबिक नियम, कायदों को तोड़ने पर सक्त कार्रवाई और भारी जुर्माने का कड़ा प्रावधान है।  यह पहले भी कम सीमा में थे, किंतु ना जाने क्यों अमलीजामा पहनाने में ना-नूकर की जा रही थी। इसके लिए सरकारों को दोष दे या हुक्मरानों को या अफसरों को किवां अपने आप को?


खैर! दोषारोपण के चक्कर में अब अपना आज ना गंवाए। जो बीत गया सो बीत गया अब आगे की सुध ले। लापरवाही से नियमों को तोड़कर हमने आज तक जितनी जाने गवाई है वह वापस तो नहीं आ सकती लेकिन सीख में आगे सुरक्षा, सतर्कता, सजगता, नियमब्धता, कर्तव्यता और दृढ़ता से नियमों का पालन करते हुए बे मौतों से बचा जा सकता है।  दुर्भाग्य जनक स्थिति ये है कि जितने लोग बीमारियों से जान नहीं गवाते उससे कहीं अधिक वाहनों की दुर्घटना से असमयक काल के गाल में समा जाते हैं। हादसों में सड़कों का भी बड़ा योगदान है, जिसके के लिए व्यवस्थाएं दोषी नहीं अपितु जुर्मी है। बावजूद सबक लेने के बेखौफ आज भी बैगर या फर्जी लाइसेंस, पंजीयन, परमिट, इंश्योरेंस और नाबालिक वाहनों की सवारी केरोसिन से गढ्डों की सड़कों पर बेधड़क कर रहे हैं। इनमें बाईकर्स की तेजी तो ऐसी है जैसे लाखों रूपए घंटे कमाते हो वैसे जान हथेली पर रखकर और लेकर कर्कश ध्वनि से कोहराम मचाते रहते हैं। 


ऊपर से नौसिखिया, नियमों से बेखबर ऑटो, टैक्सी और ट्रैक्टर चालक राह चलतों की इस कदर आफत खड़ी कर देते हैं कि वाहनों से चलना तो छोड़िए कदमताल भी अवरूद्ध कर देते हैं। बरबस फिलवक्त सड़को पर सरपट दौड़ रहे वाहनों के मुकाबले लाइसेंस, बीमा, परमिट और पंजीयन कमतर ही है। यहां यह भी समझ से परे है कि लाइसेंस ना हो तब भी बड़ी आसानी से वाहन खरीदा जा सकता है। इस पर रोक हर हाल में लगना चाहिए। जिसके पास लाइसेंस उसके नाम वाहन का प्रचलन हो। उसके लिए जिले में मौजूद एकमात्र परिवहन कार्यालय के भरोसे सबकी लाइसेंस बनने और वाहनों के पंजीयन में काफी समय बीत जाएगा। लिहाजा कमशकम ब्लाक स्तर पर शिविर आदि लगाकर इसकी पुक्ता व्यवस्था बनाई जाए। 


दरअसल, इस नये मोटर वाहन अधिनियम को  अपने राज्यों में वोट बैंकों के खातिर जमीन पर लाने सरकारें कतरा रही है, इनमें भाजपानित प्रांत भी शामिल हैं। हां! यह कानून कड़ा जरूर है। इसे भारत जैसे देश में मनवाना दांतों तले चने चबाने के समान है, पर जीवन बचाने के वास्ते इसे चबाना भी पड़ेगा और हजम भी करना होगा। तभी हमारी सेहत सलामत रहेगी। अगर हम कानून के फंडे और पुलिस के डंडे के बिना नियमों का पालन कर लिए होते तो आज इस कानून की जरूरत ही ना पड़ती। कुछ सोच भी ऐसी अख्तियार हो चुकी है कि पुलिस को दिखाने मात्र के लिए वाहनों के कागजात और सुरक्षा पात्र होते हैं। यहां यह ना भूले की पुलिस तो जैसे तैसे छोड़ देगी अलबत्ता यमराज कैसे छोड़ेंगे? क्योंकि नजर हटी, दुर्घटना घटी जगजाहिर है। इसलिए चाकचौबंद रहने में सब की भलाई है।


अंतोगत्वा, मोटर वाहन अधिनियम का प्रभाव यह पड़ा  कि देश में लाइसेंस, बीमा, प्रदूषण प्रमाण पत्र, परमिट, पंजीयन और हेलमेट की बिक्री में  वृद्धि तथा दुर्घटनाएं भी कम हुई। असरकारक डिजिटल दस्तावेजों को मान्य करते हुए आवश्यक कागजात, सुरक्षात्मक सामग्री समेत जो भी कमी हो उसे मौके पर ही पूरी करवाने की पहल हो। पुनश्चय, प्रावधानों के नाम पर माकुल सुविधाएं, मजबूत सड़क देकर जितने की गाड़ी नहीं उससे अधिक का जुर्माना वसूला मुनासिब नहीं। हालातों के हिसाब से कार्यवाही हो तो बने बात। यथा देश में जबरदस्ती के जगह जबरदस्त तरीके से नियमों का पालन होने में अभी और समय लगेगा।


हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक


पर्यावरण संरक्षण में बाधक प्लास्टिक पर प्रतिबंध सराहनीय कदम

प्रकृति एवं मानव ईश्वर की अनमोल एवं अनुपम कृति हैं। प्रकृति अनादि काल से मानव की सहचरी रही है। लेकिन मानव ने अपने भौतिक सुखों एवं इच्छाओं की पूर्ति के लिये इसके साथ निरंतर खिलवाड़ किया और वर्तमान समय में यह अपनी सारी सीमाओं की हद को पार कर चुका हैं। स्वार्थी एवं उपभोक्तावादी मानव ने प्रकृति यानि पर्यावरण को पॉलीथीन के अंधाधुंध प्रयोग से जिस तरह प्रदूषित किया और करता जा रहा हैं उससे सम्पूर्ण वातावरण पूरी तरह आहत हो चुका हैं। आज के भौतिक युग में पॉलीथीन के दूरगामी दुष्परिणाम एवं विषैलेपन से बेखबर हमारा समाज इसके उपयोग में इस कदर आगे बढ़ गया हैं मानो इसके बिना उनकी जिंदगी अधूरी हैं। वर्तमान समय को यदि पॉलीथीन अथवा प्लास्टिक युग के नाम से जाना जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में यह पॉली अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना चुका हैं और दुनिया के सभी देश इससे निर्मित वस्तुओं का किसी न किसी रूप में प्रयोग कर रहे हैं। सोचनीय विषय यह है कि सभी इसके दुष्प्रभावों से अनभिज्ञ हैं या जानते हुए भी अनभिज्ञ बने जा रहे हैं। पॉलीथीन एक प्रकार का जहर है जो पूरे पर्यावरण को नष्ट कर देगा और भविष्य में हम यदि इससे छुटकारा पाना चाहेंगे तो हम अपने को काफी पीछे पाएँगे और तब तक सम्पूर्ण पर्यावरण इससे दूषित हो चुका होगा। हालाँकि प्लास्टिक निर्मित वस्तुएँ गरीब एवं मध्यवर्गीय लोगों का जीवनस्तर सुधारने में सहायक हैं, लेकिन वहीं इसके लगातार उपयोग से वे अपनी मौत के बुलावे से भी अनभिज्ञ हैं। यह एक ऐसी वस्तु बन चुकी है जो घर में पूजा स्थल से रसोईघर, स्नानघर, बैठकगृह तथा पठन-पाठन वाले कमरों तक के उपयोग में आने लग गई है। यही नहीं यदि हमें बाजार से कोई भी वस्तु जैसे राशन, फल, सब्जी, कपड़े, जूते यहाँ तक तरल पदार्थ जैसे दूध, दही, तेल, घी, फलों का रस इत्यादि भी लाना हो तो उसको लाने में पॉलीथीन का ही प्रयोग हो रहा है। आज के समय में फास्ट फूड का काफी प्रचलन है जिसको भी पॉली में ही दिया जाता है। आज मनुष्य पॉली का इतना आदी हो चुका है कि वह कपड़े या जूट के बने थैलों का प्रयोग करना ही भूल गया है। अर्थात दुकानदार भी हर प्रकार के पॉलीथीन बैग रखने लग गए है और मजबूर भी हैं रखने के लिये, क्योंकि ग्राहक ने उसे पॉली रखने को बाध्य सा कर दिया है यह प्रचलन चार पाँच दशक पहले इतनी बड़ी मात्रा में नहीं था तब कपड़े, जूट या कागज से बने थैलों का प्रयोग हुआ करता था जोकि पर्यावरण के लिये लाभदायक था। लेकिन जब से पॉलीथीन प्रचलन में आया, पुरानी सभी पद्धतियाँ धरी रह गईं और कपड़े, जूट व कागज की जगह पॉलीथीन ने ले ली। पॉलीथीन या प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का एक बार प्रयोग करने के बाद दुबारा प्रयोग में नहीं लिया जा सकता है लिहाजा इसे फेंकना ही पड़ता है। और आज तो यत्र-तत्र सर्वत्र पॉली ही पॉली दिखाइ देती है जो सम्पूर्ण पर्यावरण को दूषित कर रही है यह पॉली निर्मित वस्तुएँ प्रकृति में विलय नहीं हो पाती हैं यानि यह बायोडिग्रेडेबल पदार्थ नहीं है। खेत खलिहान जहाँ भी यह होगा वहाँ की उर्वरा शक्ति कम हो जाएगी और इसके नीचे दबे बीज भी अंकुरित नहीं हो पाएँगे। अत: भूमि बंजर हो जाती हैं। इससे बड़ी समस्या नालियाँ अवरुद्ध होने को आती हैं। जहाँ-तहाँ कूड़े से भरे पॉलीथीन वातावरण को प्रदूषित करते हैं। खाने योग्य वस्तुओं के छिलके पॉली में बंदकर फेंके जाने से, पशु इनका सेवन पॉलीथीन सहित कर लेते हैं, जो नुकसानदेय है और यहाँ तक की पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है। पशुओं की अकाल मौत में प्लास्टिक का महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। जहाँ-जहाँ भी मानव ने अपने पाँव रखे वहाँ-वहाँ पॉलीथीन प्रदूषण फैलता चला गया। यहाँ तक यह हिमालय की वादियों को भी दूषित कर चुका हैं। यह इतनी मात्रा में बढ़ चुका है कि सरकार भी इसके निवारण के अभियान पर अभियान चला रही हैं बहुत ही सराहनीय कदम हैं भारत देश में सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा पर्यावरण संरक्षण के प्रति सराहनीय व कारगर कदम साबित होगा। प्लास्टिक से पर्यटक व दर्शनीय स्थल व सैर सपाटे वाले सभी स्थान इससे ग्रस्त हैं। संपूर्ण भारत में आज लगभग दस से पंद्रह हजार इकाइयाँ पॉलीथीन का निर्माण कर रही हैं। सन 1990 के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में इसकी खपत 20 हजार टन थी जो अब बढ़कर तीन से चार लाख टन तक पहुँचने की सूचना हैंं जोकि भविष्य के लिये खतरे का सूचक हैं। भारत सरकार की ओर से माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र जी मोदी की सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन या प्रतिबंध लगाना बहुत ही सराहनीय व महत्वपूर्ण कारगर कदम साबित होगा। मुझे आशा व विश्वास है कि सब भारतीय नागरिक  अपना कर्तव्य समझकर प्लास्टिक मुक्त भारत बनाने में अपना सहयोग कर  देश को इससे मुक्ति दिलाकर पर्यावरण संरक्षण में अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर अपने को देश के प्रति कर्तव्यपालक जिम्मेदार जागरूक  नागरिक के रूप में परिभाषित करेंगे। 

 

-✍🏻 सूबेदार रावत गर्ग उण्डू 

(सहायक उपानिरीक्षक -रक्षा सेवाऐं और 

स्वतंत्र लेखक, रचनाकार, साहित्य प्रेमी, आकाशवाणी श्रोता )

Wednesday, September 18, 2019

‘एक राष्ट्र एक संविधान’ और ‘एक राष्ट्र एक राशन कार्ड’ के समान ही ‘एक राष्ट्र एक मानक’ भी होना चाहिएः राम विलास पासवान

केन्द्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री राम विलास पासवान ने आज 14 मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की मानक निर्माण प्रक्रिया और उसको लागू करने के लिए एक बैठक की अध्यक्षता की। इस बारे में विस्तृत चर्चा हुई कि मानक कैसे निर्धारित किए जाते हैं और उनका कार्यान्वयन कैसे किया जाता है। श्री पासवान ने कहा कि 'एक राष्ट्र एक संविधान' और 'एक राष्ट्र एक राशन कार्ड' के समान ही 'एक राष्ट्र एक मानक' भी होना चाहिए।



बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए श्री पासवान ने कहा कि इस बैठक में सभी हितधारकों, नियामकों और अधिकारियों के साथ 'मानक निर्माण की प्रक्रिया' की समीक्षा की गई  और निर्धारित मानकों के कार्यान्वयन/निष्पादन में सुधार लाने के बारे में भी विचार-विमर्श किया गया। श्री पासवान ने सभी हितधारकों से 17 सितम्बर 2019 तक इस संबंध में अपने सुझाव देने का आग्रह किया। श्री पासवान ने यह भी कहा कि मानकों को तय करने और उनके लागू करने का उद्देश्य 'इंस्पेक्टर राज' को वापस लाना नहीं है बल्कि देश के सभी उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध कराना है।


 श्री पासवान ने कहा कि भारतीय मानक वैश्विक मानदंड के अनुसार निर्धारित होने चाहिए और अन्य देशों की तरह ही आयातित उत्पादों पर अपने मानकों को लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा अंतर्राष्ट्रीय वस्तुओं के लिए पारस्परिक आधार पर किया जाना चाहिए और प्रभावी निगरानी तथा जांच के लिए एक प्रणाली बनानी चाहिए।


उपभोक्ता मामलों के विभाग में सचिव श्री अविनाश के. श्रीवास्तव ने इस बात पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि मानक निर्माण की प्रक्रिया को पूरा करने में लगने वाले समय को अब 24 महीने से घटाकर 18 महीने कर दिया है।


नीति आयोग के सदस्य डॉ. डीके पॉल ने मीडिया को बताया कि नीति आयोग वर्तमान में चिकित्सा उपकरण विधेयक के मसौदे पर काम कर रहा है जो बाजार में आने वाले गैर-मानक चिकित्सा उपकरणों की समस्या से निपटने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि 23 श्रेणियों के उपकरणों को दवाओं के तहत विनियमित या अधिसूचित किया गया है और यह प्रयास व्यापक पैमाने पर किया जाना है।


इस सभा में यह भी बताया गया कि भारत में बुलेट प्रूफ जैकेट के लिए मानक वैश्विक मानदंडों से बेहतर है और भारत दुनिया में चौथा देश है जिसके पास अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन के बाद ऐसा मानक उपलब्ध है।




*हिन्दी है जन - जन की भाषा*

- राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित" कवि,साहित्यकार

14 सितम्बर ,हिन्दी दिवस

 

महात्मा गांधी ने कहा था "ह्रदय की कोई भाषा नहीं है। ह्रदय ह्रदय से बातचीत करता है। और हिंदी ह्रदय की भाषा है। "हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय को 14 सितम्बर 1949 को लिया गया था। हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित एवम प्रचारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा द्वारा अनुरोध किया गया जिसे स्वीकार किया गया। वर्ष 1953 से सम्पूर्ण भारत मे 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष इसीलिए हिन्दी दिवस मनाया जाता है।1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने की कहा था। इसे गाँधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था।

  भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय 343(1) में इस प्रकार लिखा है कि " संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ कर राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अन्तराष्ट्रीय रूप होगा।" ये निर्णय 14 सितंबर को हुआ था इसी कारण इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में हम सभी मनाते हैं।

  हिन्दी दिवस के दिन शिक्षालयों में छात्र छात्राओं को हिन्दी भाषा मे बोलने व लिखने की शिक्षा दी जाती है। साहित्यिक संस्थाएं भी हिन्दी के प्रसार हेतु हिन्दी लाओ देश बचाओ जैसे कार्यक्रम आयोजित करती है। विद्यालयों में वाद विवाद प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, काव्य पाठ आदि होते हैं। साहित्यिक कार्यक्रमों में हिन्दी सेवियों को सम्मानित किया जाता है। हिन्दी की ओर प्रेरित करने हेतु भाषा सम्मान भी दिए जाते हैं। जिसमे एक लाख एक हजार रुपये उस रचनाकार को दिए जाते है जिसने हिन्दी के लिए प्रचार प्रसार कार्य किया हो।साहित्य मण्डल श्रीनाथद्वारा राजस्थान द्वारा प्रतिवर्ष दो दिवसीय कार्यक्रम हिन्दी दिवस पर होता है।

   राजभाषा सप्ताह का आयोजन भी होता है।जिसमे सात दिन तक हिन्दी भाषा के कार्यक्रम होते है । आजकल लोग हिन्दी दिवस के दिन भी अंग्रेजी में ट्वीट करते हैं। कई लोग आम बोलचाल की भाषा मे अंग्रेजी शब्द बोलकर दिखावा करते हैं ऐसे लोग हिन्दी का अपमान कर रहे हैं। हिन्दी भाषा के विकास हेतु अधिक से अधिक हिन्दी मे बोलने का प्रचार करने की आवशयकता है।

   हिन्दी को आज तक भी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका। हिन्दी का सम्मान अपने ही देश ने कम किया है। आओ मिलकर हिन्दी के विकास की बात करें।

  आज हम नोनिहालों को अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। समाज के आयोजनों में ये अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चे रटी हुई कविताएं बोल देते हैं। समाज तालियाँ बजा देता है। माँ बापू बड़े खुश होते हैं। इसीलिये अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ा है।

   हमारी भाषा हमारी संस्कृति व संस्कारो की पहचान है। हमारे गीता रामायण वेद पुराण जितने भी हिन्दू शास्त्र है सभी हिन्दी मे लिखे गए। प्राचीन कवियों लेखकों  ने हिन्दी मे लिखा। यदि हम उन्हें भूल कर अंग्रेजी के पीछे चले तो ये हमारी मूर्खता ही है। आज विश्व  के कई देशों के विद्यार्थी इन शास्त्रों को हिन्दी भाषा मे पढ़ने हेतु भारत आकर ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं और हम विपरीत दिशा में भाग रहे हैं। हिन्दी ही ऐसी भाषा है जो भारतवासी को एक सूत्र में बांध सकती है। 

  आज कॉन्वेंट स्कूल व ईसाई मिशनरी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाया जा रहा है। शहरों व गांवों में अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में विद्यार्थी हर वर्ष बढ़ते जा रहे हैं। जो निजी विद्यालय चला रहे है वे बताते है कि कोई प्रवेश नहीं आते अब हिन्दी माध्यम में पढ़ने वालों के इसीलिए अंग्रेजी माध्यम खोल दिया।

   जहाँ तक मानसिकता नहीं बदलेगी हिन्दी के प्रति हमारा सम्मान नहीं जागेगा तब तक हिन्दी का हाल नहीं सुधरेगा। हिन्दी देश की सबसे बड़ी भाषा है।  लोगों को सहसा ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है हिन्दी।

हिन्दी सहज रूप में समझ में आ जाती है। यह राष्ट्रीय चेतना की संवाहक है। दुनिया मे हिन्दी का प्रचार प्रसार करने के उद्देश्य से 1975 में नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था।  इस सम्मेलन में विश्व के  30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विदेशों में हिन्दी दिवस के दिन दूतावासों में हिन्दी भाषा के विशेष कार्यक्रम होते हैं। हिन्दी विश्व की दस ताकतवर भाषाओं में से एक है।

   आज भी पाकिस्तान नेपाल बांग्लादेश अमेरिका ब्रिटेन जर्मनी न्यूजीलैंड संयुक्त अरब अमीरात युगांडा गुयाना अमीरात सूरीनाम त्रिनिदाद मॉरीशस साउथ अफ्रीका सहित कई देशों में हिंदी बोली जाती है। विश्व आर्थिक मंच ने हिन्दी को संसार की दस ताकतवर भाषा मे शामिल किया है। विश्व के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में आज भी हिन्दी पढ़ाई जा रही है। पूरी दुनिया मे करोड़ो लोग हिन्दी बोलते हैं। चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व मे सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हैं।वेब सिनेमा संगीत विज्ञापन आदि क्षेत्रों में हिन्दी की माँग बढ़ती जा रही है। विदेशों में कई पत्र पत्रिकाएं हिंदी में प्रकाशित हो रही है।

   आज की हिन्दी मैथिली मगही अवधी ब्रज खड़ी बोली छतीसगढ़ी आदि 17 बोलियों का सामूहिक नाम है। आज कनाडा जर्मनी इंडोनेशिया में भी हिन्दी भाषी बढ़ रहे हैं।

 

-राजेश कुमार शर्मा "पुरोहित"

98 पुरोहित कुटी

श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी

जिला झालावाड राजस्थान

Saturday, September 7, 2019

|।चौपाई।।

 

गुरु की मार सहैं जो काया । उसने निर्मल रूप को पाया ।।

सहता  नहीं  जो  घट थापा । कैसे कुटिलता गांवावत आपा ।।

सुन्दर वस्त्र होय जब गन्दा । मसलैं रजक पीटे स्वछन्दा ।।

निर्मल होय जब वस्त्र शरीरा । मानव धारण करत अधीरा ।।

कटैं  वस्त्र जो  दर्जी  हाथे । मानव उसे चढ़ावत माथे ।।

ईंट   सहैं   मार  रजगीरू । सुन्दर बुर्ज बनावत भीरू ।।

बढ़ई   मार  सहैं जो  काठा । मार अखाड़ा सह बनैं पाठा ।।

सुंदर  स्वर्ण  सुनार   तपावत । पीट-पीट बहु भांति बनावत ।।

सहते मार न स्वर्ण सुनारू । बनता कैसे कुण्डल हारू ।।

लौह  गर्म कर  हनैं  लुहारा । विविध भांति बनैं औजारा ।। 

 

ऋषिकान्त राव शिखरे

अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश।