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Showing posts from November, 2019

कानपुर का खतरनाक शायर

  तुम्हारे हुस्न के मोतीझील में फंसकर तेरे इश्क में परेड किये जाता है😜 दिल धड़कता था कभी घंटाघर सा अब यादों का भैरवघाट बना जाता है😜 तुम लगती हो जैसे गिलौरी चौरसिया की  यहाँ ठग्गू के लड्डू सा मुंह हुआ जाता है🤣 तेरी सूरत के इस्काँन मंदिर को देख कर मेरा मन भी ब्लूवर्ड सा मचल जाता है🤣 चहकती हो तुम मालरोड की शाम सी मेरा प्यार यहाँ कबाड़ी मार्केट सा हुआ जाता हैं😝 तेरी पतली कमर है जैसे गलियाँ चमनगंज की उस पर मेरा दिल अफीमकोठी के जाम सा रुक जाता है😂 बदन है खूबसूरत तुम्हारा फूलबाग सा    और ये आशिक नौबस्ता की धूल में नहाये जाता है।     नहीं खुलती सोमवार को जब गुमटी तेरी ग़ुस्से से मेरा मन बर्रा जाता है।  हर शाम जब होता है दर्शनपुर्वा तेरा  मन मेरा 80 फ़िट रोड जितना हो जाता है।  ओर जब देख लेता है तेरा बाप कर्नल गंज मुझे  लाठी से उसकी मेरा कल्यानपुर हो जाता है! मेरे कनपुरिया दोस्तों बस तुम्हारे लिये लिखा है,, हो सके तो आगे भी भेज देना🤩🤩🤩🤩🤩🤩

मयखाना

वो  मयखाना  था  या  दवाखाना, मैं  कुछ  भी  समझ  ही  ना पाया।   पता नही क्या था मय के प्याले में, मैं  अपना  हर  गम  भुला  आया।।   आँखो के सामने रंगीनियां छाई थी। हर परेशानी को वहाँ मौत आई थी।।   एक  संगीत  होठो  पर  खुद  ही  आया। दरिया दर्द का , आँखो से छलक आया।।   हर एक वहाँ सच्चाई में नहाया हुआ था। अपने झूठ को सबने दफनाया हुआ था।।   सभी इबादत के दरो पर मैं घबराया था। मयखाने में दर्द मेरा मुझसे घबराया था।।   मयखाने  में  दुःखो  से  सकून  मैंने पाया था। उतरा नशा,दर्द फिर चेहरे पर उतर आया था।।   कुछ ऐसा हो कि नशे में जीवन निकल जाए। शायद  तभी  सभी  दुःखो को मौत आ जाए।।     नीरज त्यागी ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

लहसुन और प्याज

एक बहुत पुरानी कहावत है कि आप जैसा खाते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। अब तो साइंस में भी  इस बात के लेकर खोज हो रही है कि कितना और क्या खाना हमारी सेहत को किस तरह प्र्रभावित करता है। चिकित्सा वैज्ञानियों के अनुसार खाने वाली चीजों और दवा में कोई साफ विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। कोई भी खाने की चीज अच्छी दवा हो सकती है। खाने की कई चीजों में ऐसे रसायन होते हैं जो शरीर में जज्ब हो जाने के बाद दवा जैसा काम करते हैं। वीजसन इंस्टीट्यूट इजरायल के अनुसार लहसुन का गुण कभी भी नष्ट नहीं होता, फिर भी इसका कच्चा इस्तेमाल किया जाए तो ज्यादा लाभदायक है। लहसुन विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं को रोकथाम तथा उन्हें नष्ट करने में सहायक होता है। यदि इनके रस का सेवन प्रत्येक 3 घण्टे के पश्चात किया जाए तो टाइफाइड की गंभीर अवस्था को किसी अन्य जीवाणुनाशक औषधिक की अपेक्षा नियंत्रित किया जा सकता है। प्याज के रासायनिक तत्व श्वास रोग तथा जनन में भी लाभप्रद साबित हुए हैं। प्याज में अनेक अद्भुत गंधक यौगिक होते जो कभी रासायनिक संगठन से बनाये गये थे। अनुसंधानों से यह भी पता चलता है कि प्याज और लहसुन के इस्तेमाल से जानवरों

भारतीय नारी और दहेज

दहेज प्रथा का जब से भारतीय समाज में प्रचलन हुआ है, वह तभी से भारतीय नारी के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है। प्राचीनकाल में विवाह के अवसर पर कन्या के माता पिता वर-पक्ष को दहेज के रूप में गहने, कपड़े और दैनिक उपयोग की अनेक वस्तुएँ देते थे। कन्या की सखी - सहेलियाँ तथा परिवार के संबंधियों की ओर से भेंट स्वरूप दी जाने वाली वस्तुएँ भी दहेज में दिए जाने का प्रचलन था। प्राचीनकाल में दहेज के लिए कोई जोर-जबरदस्ती नहीं थी। परंतु समय में परिवर्तन हुआ, उसी के अनुरूप दहेज के विवाह की अनिवार्य शर्त बन गया। गुणवती कन्याएँ भी दहेज की माँग पूरी न होने के कारण अविवाहित रहने लगीं। कन्याओं को परिवार पर बोझ समझा जाने लगा। इतना ही नहीं, कन्या उत्पन्न होने पर परिवार में उदासी छाने लगी। यहाँ तक कि देश के कई क्षेत्रों में कन्यावध का प्रचलन हो गया। अब तो दहेज की विभीषिका से बचने के लिए गर्भ में ही यह पता कर लिया जाने लगा कि उत्पन्न होने वाली संतान लड़का है या लड़की। लड़की होने की संभावना व्यक्त होने पर गर्भपात करा दिया जाता है। इस प्रकार 'भ्रूण हत्या' की जाने लगी। प्राचीनकाल में माता-पिता का प्रेम और प्रसन्

जीवन जीने की कला

विश्व में अन्य जीवधारियों की अपेक्षा मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। प्रत्येक व्यक्ति जीवन को अपनी मनोवृत्ति के अनुरूप ही व्याख्यायित करता है। सामान्यतः जीवन एक 'जय-यात्रा' है, जिसका शुभारंभ जन्म होने से और समाप्ति मृत्यु होने पर होती है। खाने और सोने का नाम जीवन न होकर सदैव प्रगति पथ पर बढ़ते रहने की लगन ही जीवन है। जीवन न तो भोग की वस्तु है और न ही किसी की स्थायी संपदा है। सच तो यह है कि प्रभु की कृपा से ही यह मानव देह केवल उपयोग के लिए ही प्राप्त हुई है। इसलिए व्यक्ति को प्रभु प्रदत्त मानव देह का सदुपयोग करते हुए अपने जवन को सार्थक करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। जीवन एक स्वप्निल संसार न होकर कार्य - युद्ध - क्षेत्र जैसा ही है। जीवन आदर्शवाद न होकर यथार्थ के अधिक निकट है। वह (जीवन) यथार्थ और आदर्श का समन्वित रूप है। यही समन्वित रूप ही मानव - जीवन के सुख की आधारशिला है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पल का अपना महत्व है। व्यक्ति की परिस्थितियों से ही उसकी स्थिति का निर्माण होता है। वास्तविक जीवन तो व्यक्ति के कर्तव्य पालन में ही होता है। अतीत के चिंतन को त्याग कर वर्तमान

मजदूर किसानों अब जागो

इस वसुधा का श्रेष्ठ तपस्वी  पुरुषार्थी- सच्चा - इन्सान। निशिदिन कठिन तपस्या करता, कहलाता मजदूर किसान।।  दिन में दिनकर ज्वाला बरसे,  चाहे हिमकर हिमपात करें।  या ऋतुराज धरा पर आकर  उनके श्रम पर राज करें। अगणित रातों को जाग-जाग जीवन सुख निद्रा, त्याग-त्याग। हल-फल से मिट्टी फाड़-फाड़ नन्हें बीजों को गाड़-गाड़  निज श्रम का ध्वज फहराने हित  उस पर पाटा चलवाते हो।  श्रम सीकर से अभिसिंचित कर,  नव-जीवन उसमें लाते हो।। शीत-शिशिर में ठिठुर-ठिठुर, पानी से खेत पटाते हो। कम्बल, लिहाफ, स्वेटर विहीन। खेतों में निशा बिताते हो।।  मजदूर जो ठंडी रातों में,  अस्थियों को अस्त्र बनाते हैं।  हेमन्त शिशिर ऋतुओं से लड़  गेहूँ-सरसों उपजाते हैं।। सोने सम सुन्दर दानों को, हर महलों तक पहुँचाते हैं। श्रम के फलदान के एवज में बस तिरस्कार ही पाते हैं।  फिर जेठ दोपहरी में तप-तप,  गन्ने की फसल उगाते हैं।  अपने गुड़-शक्कर शीरा खा,  सबको चीनी भेजवाते हैं। पश्चिम से आता गर्म पवन, जब दीरघ दाध बढ़ाता है। तब झुलस-झुल कर खेतों में श्रम-तप का धर्म निभाता है।।  श्रम की गर्मी तन का सम्बल,  जाड़ों में बन जाता कम्बल।  श्रम-श्वेद तरल बन आता ह

‘‘याद्दाश्त के धनी व्यक्ति’’

दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हुए हैं जो अपनी विचित्र व आश्चर्यजनक प्रतिभा के बल पर संसार को आश्चर्यचकित करते रहें। याद्दाश्त के धनी ऐसे लोग ही हैं जिसकी विलक्षण प्रतिभा का दुनिया ने लोहा माना है जिनकी बराबरी आज तक कोई नहीं कर सका। 1.  इजिप्ट के बादशाह नासर के पास 20 हजार गुलाम थे बादशाह को सभी गुलामों के नाम, जन्म, स्थान, जाति, आयु और पकड़े जाने की तारीख सब कुछ जुबानी याद थी। 2. बंगलौर के महादेवन ने 899 अंको की संख्या को दो घंटे 0 मिनट में हल कर दिया। 3.  डेनमार्क के एक बैंक क्लर्क ने लगभग 3 हजार जमाकर्ताओं के बहीखाते जल जाने के बाद जबानी ही उनके नाम, स्थान, धनराशि का हिसाब सही-सही बता दिया। 4. शतरंज का जादूगर अमरीकी खिलाड़ी हैरानैल्सन एक साथ बीस शतरंज के खिलाड़ियों की चालें याद रखता था। 5. राष्ट्रपति रुजवेल्ट के सेक्रेटरी जेसए फिरली को 20 हजार महत्वपूर्ण लोगों के नाम पते, पद जुबानी याद थे। 6.  राजा भोज के दरबारी श्रुतिधर में यह गुण थे कि वह 45 मिनट तक सुने हुए प्रसंग को पुनः ज्यों का त्यों शब्दशः सुना सकते थे।  7. दक्षिण अफ्रीका के फील्ड मार्शल स्मट्स के पुस्तकालय में अत्यंत उच्चकोटि की दस

सिर का दर्द

सर्दी लगने से दर्द होता है तो तुलसी की चाय पिलायेें और केसर, जावित्री, सोंठ, बालछड़ को मिलकर सिर पर लेप करें। गर्मी में होता हो तो मिश्री मिलाकर सौंफ का अर्क या गुलाब का अर्क पिलाए और बादाम, चन्दन, कपूर, कलमी शोरा, गेरू पीसकर सिर पर लेप करें। बालों के रोग 1. सिर में रूसी होना (1) नारियल के तेल में नीबू मिलाकर बालों में लगायें। (2) 700 ग्राम नारियल तेल में  ग्राम कपूर मिलाकर सूखे बालों में लगायें। 2. बालों के झड़ने पर (1) रीठें के पानी या शैम्पू से बालों को धायें। (2) एक चम्मच नींबू के रस में दो चम्मच नारियल तेल मिलाकर उंगलियों से बालों की          जड़ में धीरे-धीरे लगायें। बालों का झड़ना रुक जायेगा। 3. बालों का सफेद होना (1) एक या दो चम्मच सूखे - आंवले का चूर्ण रात में सोने से पूर्व लें बालों में सफेदी     आना रुकेगा। (2) नीबू के रस से सिर में मालिश करने से बालों का सफेद होना बंद हो जाता है। 

ठहाका

गाँव की एक नई नवेली दुल्हन अपने पति से अंग्रेजी भाषा सीख रही थी, पर वह अभी 'सी' अक्षर पर ही अटकी हुई थी क्योंकि उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि 'सी' को कभी 'च' कभी 'क' तो कभी 'स' क्यों बोला जाता है। एक दिन वह अपने पति से बोली आपको पता है चलचत्ता के चुली भी च्रिचेट खेलते हैं।  उसके पति ने यह सुनकर समझाया कि यहाँ सी को 'च' से नहीं 'क' से बोलते हैं। ऐसे कहते हैं कलकत्ता के कुली भी क्रिकेट खेलते हैं। पत्नी ने अपने पति से पूछा वह कुन्नीलाल कोपड़ा तो फायरमैन है न? तो पति ने फिर समझाया यहाँ सी को 'च' बोलते हैं चुन्नीलाल चोपड़ा तो चेयरमैन है न।  थोड़ी देर बाद पत्नी बोली आपका चोट चैप दोनों चाॅटन के हैं। पति अब जरा तेज आवाज में बोला तुम समझती क्यों नहीं यहाँ 'सी' को 'क' बोलते हैं, कोट, कैप, दोनों काॅटन के है। पत्नी फिर बोली कंडीगढ़ में कंबल किनारे कर्क है। पति को गुस्सा आ गया, वह बोला बेवकूफ यहाँ सी को च बोलते हैं चण्डीगढ़ में चम्बल किनारे चर्च है। पत्नी सहमते हुए धीरे से बोली चरेन्ट लगने से चंडक्टर और च्लर्क मर गए। पति ने

अपने शरीर की क्रियाएँ

क्या आप जानते हैं कि हमारी आँखों की माँस-पेशियाँ एक दिन में कितनी गति करती हैं। या फिर लार ग्रन्थियों से रोजाना कितनी बार लार निकलती है। आमतौर पर लोगों को अपने शरीर की ऊपरी बनावट के बारे में पता होता है, परन्तु उसकी सूक्ष्म या फिर उसकी अंदरूनी बनावट की जानकारी नहीं होती है। तो आइए जाने मनुष्य के शरीर से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी...... हमारी लार ग्रन्थियों से 1.5 लीटर लार प्रतिदिन निकलती है। मानव शरीर का कवच त्वचा है। अपने जीवन काल में हर व्यक्ति लगभग 18 किलोग्राम त्वचा धारण करता है। उंगलियों के नाखून -0.05 से. मीटर एक सप्ताह में बढ़ते हैं। हमारा मस्तिष्क विभिन्न प्रकार की दस हजार गंधो का भंडारण पहचान और स्मरण रख सकता है। मानव शरीर की सबसे लम्बी हड्डी फीमर और सबसे छोटी हड्डी स्टिप है, जो कान की हड्डी होती है। पुरुष या स्त्री के शरीर पर बालों की संख्या औसतन पाँच मिलियन होती है।  हमारे गुर्दे प्रतिमिनट 100 मि.ली. रक्त छानते हैं। इस प्रकार एक दिन में पूरे शरीर का रक्त बीस बार छाना जाता है। छीक का वेग सौ मील प्रति घंटा तक होती है। उसके जोर के कारण शरीर को गहरा धक्का लगता है।  फेफड़े में कुल तीन ल

जीवन और संगीत 

साहित्य संगीत कला विहीनः, साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीनः। जीवन से तात्पर्य मानव जीवन से है। पशु-पक्षी जीवन से नहीं। संगीत से तात्पर्य केवल शास्त्रीय-संगीत ही नहीं, बल्कि भाव संगीत, चित्रपपट संगीत, लोक संगीत आदि से भी है। खास तौर से भारतीय जीवन के पग-पग में संगीत बना रहता है। जन्म से मृत्यु तक यह हमारे साथ बना रहता है। जिस क्षण बालक इस संसार से प्रथम परिचय प्राप्त करता है तो वह संगीत द्वारा (रोने के रूप में) अपना आभार प्रकट करता है और जिस समय मनुष्य इस संसार से विदा लेता है, संगीत के द्वारा उसे पावन राम-नाम की महिमा बताई जाती है। इतना ही नहीं, मानव के इतिहास में जब भाषा का जन्म तक नहीं हुआ था, उस समय आपस मे भावो का आदान-प्रदान संगीत द्वारा ही सम्भव था मैक्समूलर ने ठीक ही कहा है कि संगीत का जन्म भाषा से कही पूर्व हुआ है यहाँ पर संगीत का व्यापक अर्थ लिया गया है भारतीय जीवन मे 16 संस्कार माने गये हैं, जैसे नामकरण, कर्ण-छेदन, मुन्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत (जनेऊ), विवाह आदि। इनमें से प्रत्येक का प्रारम्भ और अन्त संगीत से होता है। ऐसा कोई त्यौहार नहीं है जहाँ संगीत न हो, बल्कि संगीत के बिना त्

ठग दोस्त

करीम एक नेक इनसान था, वह रहीम को अपना दोस्त समझता था। एक दिन करीम ने देखा कि रहीम बड़ा परेशान दिख रहा है। करीम ने रहीम से उसकी परेशानी का कारण पूछा। रहीम ने कहा मेरे दोस्त मुझे दो सौ रुपयों की सख्त जरूरत है। रहीम को पता था कि करीम आज ही अपने खेत की सब्जी बेच कर दो सौ रुपया लाया है। करीम उसकी बात सुनकर बोला, दोस्त इसमें परेशानी की क्या बात है मेरे पास दो सौ रुपये है और अभी मुझे उनकी कोई आवश्यकता नहीं मैं रुपये तुम्हें दे देता हूँ जब मुझे आवश्यकता होगी तब लौटा देना। इस घटना को कई माह गुजर गये। अब करीम को फसल बोने के लिए बीज लाने थे, उसने रहीम से कहा, दोस्त मुझे बीज खरीदने के लिए पैसों की जरूरत है मेरे दो सौ रुपये मुझे लौटा दो। पैसों की बात सुनकर रहीम खामोश हो गया और बोला कैसे पैसे? मेरे पास तो कोई पैसे नहीं हैं, फिर मैंने तुम से पैसे कब लिए थे कोई गवाह लाओ। ये सुनकर करीम को बड़ा कष्ट हुआ उसने कहा हाँ! दोस्त गवाह है व बड़ा पीपल का पेड़, जिसके पास तुम मुझे परेशान मिले थे और मैंने तुम्हे रुपये दिये थे। इस पर रहीम हँसकर बोला मूर्ख, पेड़ भी कहीं गवाही देता है? इस पर करीम चिन्तित हो गया और उसने कहा

जीवन का तत्व

 ''जोश और जोखिम किए जब जिन्दगी के नाम, तूफानी लहरें भी कर गयी झुक कर सलाम।''  अमिट दुस्साहस की भावना ने मानस के जीवन को जोश से ओत - प्रोत कर रखा है। कहा गया है जिंदगी जिंदादिली का नाम है मुर्दादिल क्या खाक जिया। संघर्ष करने वाला हो या मात्र मूक-दर्शक रोमांच की लहरों से स्पंदित कर देता है। मानव जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है इस तथ्य का श्रोत यह पद हो सकता है। ''जीवन के हर पथ पर माली पुष्प नहीं बिखरता है प्रगति का पथ अवसर, पथरीला ही होता है।''  जोखिम उठाने की यह साहस - भावना ही नित नयी खोजों और आविष्कारों की जननी है और ये नये आविष्कार ही हमें दुनिया के उस पार के दृश्यों से परिचित कराते हैं। वह जीवन ही क्या जो पानी के समान समतल भूमि पे बहता ही रहे। जीवन में आने वाले - चढ़ाव ही जीवन को नित नया रोमांस प्रदान करते हैं। ''आसान है हर लक्ष्य, समान जब स्वप्न हो पूरे दिल कें  तू लेना तारों को, उड़ना ऊपर तुम बादल के।''

आखिर क्यों होती है भ्रूण हत्या?

भ्रूण हत्या देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। विश्व बैंक द्वारा कराए गये एक शोध के अनुसार भारत में हर साल 50 लाख बच्चियों को विकसित हुए बिना ही मार दिया जाता है। इन आँकड़ों की मानें तो हर 25 में से एक बच्ची की हत्या हो रही है। अगर दो दशकों के आँकड़े इकट्ठे करें तो कन्या भ्रूण हत्या के मामले एक करोड़ की संख्या पार कर चुके हैं, जोकि दिल्ली की कुल जनसंख्या के लगभग बराबर है। इस समस्या से निपटने के लिए देश में कई कानून बनाए गये। भारतीय दंड संहिता समेत विशेष कानून लाए गये लेकिन भू्रूण हत्या पर लगाम कसी नहीं जा सकी है। आज भी अजन्मी बच्चियों की हत्याएँ हो रही हैं। वैसे कानून की बात करें तो गर्भ की जाँच रोकने पर एक्ट (प्री. नटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स एक्ट) बनने के बाद 12 साल में चार हजार मामले सामने आने के बाद पहली बार 28 मार्च 2006 को हरियाणा के एक डाॅक्टर को दो साल की जेल की सजा सुनाई गई। क्या कहता है कानून---------  यदि स्त्री की सहमति से किए गये गर्भपात के दौरान उसकी मृत्यु हो जाए तो दोषी को दस वर्ष तक जेल के सलाखों के पीछे रहना पड़ सकता है और यदि ऐसा बिना स्त्री की सहमति के किए जा रहे गर्भपात

हमें तो हमारा हिंदुस्तान चाहिए

हमें तो हमारा हिन्दुस्तान चाहिए। न धरा न हमें आसमान चाहिए, न ही हमें ऐ सान जहान चाहिए। इच्छा न टूटे फूटे घर की हमें, पुरवों का देश वो महान चाहिए। हमें तो हमारा हिन्दुस्तान चाहिए।  हमें न छिछोरी राजनीति चाहिए,  न ही कपटी जनों की प्रीति चाहिए,  दुख सुख में, जीते ही रहेंगे,  हमें न किसी की दया - दान चाहिए।  हमें तो हमारा हिन्दुस्तान चाहिए। महाराणा जैसा देशभक्त चाहिए, अन्याय पर उबले वो रक्त चाहिए। जन्मभूमि हित, धन लाभ त्याग दें, भामाशाह वाला वो ईमान चाहिए।। हमें तो हमारा हिन्दुस्तान चाहिए।  इस माअी के लिए जो जिए और मरे,  पंथ की कुपन्थियों से न कभी डरें!  भाव सदा शयता का सब में भरें,  जायसी, रहीम, रसखान चाहिए।।  हमें तो हमारा हिन्दुस्तान चाहिए। 

‘‘जान बची तो लाखो पाए’’

1.  वैसे तो मैं बहुत गरीब इन्सान हूँ  मगर बाईं आँख से परेशान हूँ  अपने आप चलती है। 2. लोग समझते हैं कि चलाई गई है  एक बार क्लास में  एक लड़की बैठी थी पास में। 3. नाम था सुरेखा उसने हमें देखा  और मेरी बाईं आँख चल गयी  लड़की हाय-हाय करके क्लासें निकल गई। 4. थोड़ी देर बाद हमें है याद  प्रिंसिपल ने हमें बुलाया, लम्बा चैड़ा लेक्चर सुनाया  हमने कहा हमसे भूल हो गई। 5. तो बोले ऐसा भी होता है भूल में,  शर्म नहीं आँख चलाते हो स्कूल में।  इससे पहले कि हम हकीकत बयान करते। 6. फिर चल गयी, प्रिंसिपल को खल गई।  हुआ यह परिणाम  स्कूल से कट गया नाम। 7. मुश्किल थी तमाम  मिला एक काम  तो इन्टरव्यू में खड़े थे। 8. एक लड़की थी आगे खड़ी, उसकी नजर हम पर पड़ी  और मेरी बाईं आँख चल गई,  लड़की उछल गयी। 9. दूसरे उम्मीदवार चैंके   लड़की का पक्ष लेकर भौंके,  फिर क्या था मार-मार कर जूते चप्पल तोड़ दिया। 10. हम सिर पर पाँव रखकर भागे  लोग पीछे हम आगे  घबराहट में घुस गये एक घर में, 11. भयंकर पीड़ा हो रही थी सर में।  बुरी तरह हाँफ रहे थे  हाथ पैर -काँप रहे थे। 12. तभी पूछा घरवाली ने कौन?  हम खड़े रहे मौन,  वो फिर से पूछी कौन, 13. वह बो

आधुनिक शिक्षा प्रणाली 

हमारे देश की शिक्षा प्रणाली भी अजीब है। सभी को एक ही साँचे में ढालती चली जाती हैं। सभी के दिमाग का स्तर, सोचने समझने, विचारने एवं स्मरण करने की शक्ति में विभिन्नताएँ है परन्तु किसी एक विषय - वस्तु को लेकर हमारे व्यक्तित्व एवं बौद्धिक स्तर का आकलन करना उचित नहीं। वर्तमान में उच्च से उच्च अंक प्राप्ति ही विद्यार्थियों का एक मात्र लक्ष्य रह गया है। अब कुछ विद्यालय इस तरह के खुलने लगे हैं जिसमें वैज्ञानिक, तकनीकी, वाणिज्य आदि की शिक्षा दी जाने लगी है। ये विद्यालय भी दो प्रकार के होते हैं एक जिससे परीक्षा लेने के पश्चात दाखिला होता है और दूसरे जिनमें एक लम्बी रकम लेकर दाखिल होना है। जिन्दगी में सफल होने के लिए कुछ गुणों की आवश्यकता होती है। यह न तो परिस्थितियों को समझने की सूझ-बूझ देती है और न उनसे संघर्ष करने की शक्ति/सत्य यह है कि जब पढ़ाई समाप्त हो जाती है तब जिन्दगी को असली पढ़ाई ठोकरे खा-खाकर आदमी सीखता है और वह ही सच्ची पढ़ाई होती है। शिक्षा तो वह होती है जिसका एक - दो वाक्य भी यदि कान में पड़ जाए और मनुष्य उसे जीवन में ग्रहण कर ले तो उसका यह जीवन ही सफल न हो जाए बल्कि संसार-सागर से भी उद

संगीत एवं स्वर  

संगीत   -  स्वर   सा  -  समझ   रे  -  रिआज   गा  -  ज्ञान, गुण   म  -  माया   प  -  परमेश्वर   ध  -  ध्यान   नि.  -  निर्गुण, निराकार   सा  -  साज संगीत के ये स्वर मात्र संगीत तक सीमित न होकर वरन् सम्पूर्ण सृष्टि एवं जीवन को अपने इन स्वरों में समाहित किए हुए हैं। प्रकृति के हर रूप में मानों यही स्वर गूँज रहे हो, चाहें वह वर्षा की पहली बूँद का धरा से मिलन हो, चाहे उगते हुए सूर्य की पहली किरण हो या ढलते हुए सांझ की लुप्त होती प्रभा। प्रकाशित होते चांद की चंद्रिका या फिर बदली में छिपते हुए से सितारों की आभा, खिलती हुई कलियों को माधुर्य हो या सागर से मिलती निर्झर सी जल-धारा। प्रकृति के हर रूप में बस यही संगीत-स्वर। इस सृष्टि के रचनाकार श्री ब्रह्मा जिनके साथ वीणावादिनी माँ सरस्वती विद्मान है जिनकी वीणा से उद्ीण्त ये स्वर जिसने जीवन में रस भर दिया।  संगीत के प्रारम्भिक स्वर की अपनी ही परिभाषा है इन्हें यही सूक्ष्म तथा गहराई के साथ विचारा जाए तो जिस प्रकार मनुष्य जीवन में किसी भी विषय वस्तु को पाने की अभिलाषा रखता है, जिज्ञासा पनपती है जिससे उसमें सं. समझ होती है जब किसी विषय - वस्तु की समझ

कन्या भ्रूण हत्या एक सामाजिक अपराध

  ''जन्म दिया समाज को जिसने,     कोई सम्मान नहीं इस तल पे। बन गई वह भी अछूती,    पैदा हुई जो लड़की बनके।।'' यह बहुधा कहा गया है कि जीवन के युद्ध में जिसको कि मनुष्य परिस्थितियों के विरुद्ध लड़ता है, नारी की भूमिका द्वितीय पंक्ति की रहती है, यह बात निश्चित ही महत्वपूर्ण है किन्तु आज हम पुरुष और नारी में कोई भेद नहीं करते हैं। जहां तक दोनों की क्षमता का प्रश्न है, यह सिद्ध हो चुका है कि नारी की क्षमताओं का कुल योग पुरुष की क्षमताओं के कुल योग से कम नहीं, किन्तु हम देखते हैं कि हमारे समाज में नारी की स्थिति वह नहीं है जो होनी चाहिए।  वही महज पुत्र की चाहत में कन्या भू्रणों की गर्भ में हत्या होने लगी है। परिवार में बच्ची का जन्म एक निराशा का अवसर होता है जबकि लड़के का जन्म आनंद और उत्सव मनाने का 1 सामाजिक जीवन का रथ एक पहिए से नहीं चल सकता, किन्तु फिर भी न जाने क्यों दूसरे पहिए के महत्व की पहचान कम है। सामाजिक प्रभाव - कन्या भ्रूण हत्या एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। कन्या भ्रूण हत्या पर प्रशासन अंकुश लगाने में नाकाम है। स्त्री - पुरुष का आनुपातिक संतुलन बि

विश्वशांति और भारत

भारत एक अध्यात्मवादी और शांतिप्रिय देश रहा है। यह अलग बात है कि आज का भारतीय अधिकाधिक मौलिक साधनों को पाने के लिए आतुर हो और दीवाना बनकर अपनी मूल अध्यात्म चेतना से भटकता जा रहा है और उससे हर दिन, हर पल दूर होता जा रहा है परन्तु जहाँ तक शांतिप्रियता का प्रश्न है, वह आज भी व्यर्थ के लड़ाई - झगड़ों में न पड़कर सहज शांति से ही जीवन जीना चाहता है। यही वह मूल कारण है कि अपने आरंभ काल से ही भारत शांतिवादी और निरंतर शांति बनाए रखने का आदी रहा है। भारत ने कभी ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे विश्वभर की शांति भंग हो। भारत ने तो आक्रमणकारियों के प्रति भी उदारता बरती। जयशंकर प्रसाद ने स्पष्ट कहा है- विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम। यहां के राजाओं नें अत्याचार, दमन, और संघर्ष का रास्ता छोड़कर त्याग और तपस्या का रास्ता अपनाया है। भारत सदा से 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना पर बल देता है। विश्व शांतिः एक चुनौती- शांति का अर्थ अन्याय - अत्याचार चुपचाप सहन करना नहीं है। इसी प्रकार शांति का अर्थ निष्क्रियता भी नहीं है। इसका अर्थ और प्रयोजन जानबू

‘‘सरल और समृद्ध भाषा है अपनी हिंदी’’

भाषा विभिन्न सार्थक ध्वनियों के संयोग से भावों की अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। जैसे - जैसे किसी भाषा का प्रयोग बढ़ता जाता है नई अवधारणाओं का समावेश होता जाता है और उसका प्रसार बढ़ता है। किसी भी भाषा का कठिन या सरल होना कोई अनिवार्य गुण नहीं है बल्कि यह पाठक की मानसिकता, रुचि, जिज्ञासा, तत्परता एवं प्रयोग पर निर्भर करता है कि कोई भाषा प्रयोगकर्ता के लिए सरल है या कठिन। बहुभाषी जनता ने ही अपनी आवश्यकता के अनुरूप भारतीय भाषाओं के मिले - जुले रूप को हिन्दी भाषा का नाम दिया और उसे विकसित किया। चूँकि हिन्दी भाषा का उद्गम, विकास एवं समृद्धि बढ़ती ही गई और आज हिन्दी एक समृद्ध भाषा के रूप में सभी क्षेत्रों में प्रयोग हेतु सुलभ है। इस प्रकार हिन्दी संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए और यह भारतीय जनता की एक अपरिहार्य आवश्यकता है। किसी भी हालात में अंग्रेजी संपर्क भाषा हिंदी का विकल्प नहीं बन सकती। हिन्दी का साहित्यिक रूप तो पहले से ही समृद्ध था अब इसका व्यावहारिक स्वरूप (अनुप्रयुक्त स्वरूप) भी समृद्ध हो चुका है और तकनीकी एवं गैर-तकनीकी क्षेत्रों में इसका प्रयोग बढ़ रहा है। सूचना प्रौद्योगिक

स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के लिए दो नए समझौते

  उमाशंकर मिश्र नई दिल्ली, 14 नवंबर (इंडिया साइंस वायर): स्वास्थ्य के क्षेत्र में अत्याधुनिक शोध को बढ़ावा देने के लिए चंडीगढ़ स्थित सूक्ष्‍मजीव प्रौद्योगिकी संस्‍थान (इम्टेक) ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-बॉम्बे के साथ समझौता किया है। इस पहल से विचारों के आदान-प्रदान, नए ज्ञान के विकास और दोनों संस्थानों के शोधकर्ताओं और शिक्षकों के बीच उच्च गुणवत्ता के शोध कौशल को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। आईआईटी-बॉम्बे के शोध एवं विकास विभाग के डीन प्रोफेसर मिलिंद अत्रे और इम्टेक, चंडीगढ़ के कार्यवाहक निदेशक डॉ मनोज राजे ने नई दिल्ली के केंद्रीय वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) मुख्यालय में इस संबंध समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस मौके पर सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे भी मौजूद थे। आईआईटी-बॉम्बे और सीएसआईआर-इम्टेक के पदाधिकारी एवं वैज्ञानिक डॉ मांडे ने कहा कि “इन दोनों संस्थानों को अपने-अपने क्षेत्रों में महारत हासिल है। आईआईटी-बॉम्बे देश के शीर्ष संस्थानों में शुमार किया जाता है तो इम्टेक का फोकस भारत की मेडिकल जरूरतों को पूरा करने रहता है। इन दोनों संस्थान

समाजकी भलाई पर केंद्रित विषय चुनें पीएचडी शोधार्थी

  उमाशंकर मिश्र   नई दिल्ली, 14 नवबंर (इंडिया साइंस वायर) : विज्ञान के पास देश की हर अनसुलझी समस्या का समाधान है। लेकिन अर्थपूर्ण वैज्ञानिक शोध के लिए जरूरी है कि पीएचडी विषय का चयन करते समय उसमें निहित समाज की भलाई और कुछ नया करने की संभावना का ध्यान रखा जाए। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्ष वर्धन ने ये बातें बुधवार को वैज्ञानिक और नवीकृत अनुसंधान अकादमी (एसीआईआर) के उत्कृष्ट पीएचडी शोध प्रबंध पुरस्कार और पदारोहण समारोह के दौरान कही हैं।   एसीआईआर राष्ट्रीय महत्व कीएक मेटा-यूनिवर्सिटी है, जिसके अध्ययन केंद्र भारत के 23 शहरों में फैली वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की 37 प्रयोगशालाओं और छह इकाइयों में स्थित हैं। इस संस्थान का उद्देश्य भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नवीन पाठ्यक्रम, बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण और मूल्यांकन के जरिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नेतृत्व क्षमता का विकासकरना है। नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर मुख्यालय में आयोजित समारोह में दस विज्ञान शोधार्थियों को उत्कृष्ट शोध प्रबंध के लिए पुरस्का

स्मॉग से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने बनाया नया स्प्रेयर

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स र्दियों की दस्तक के साथ दिल्ली और आसपास के इलाके एक बार फिर स्मॉग की चपेट में हैं। चंडीगढ़ स्थित केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संस्थान (सीएसआईओ) के वैज्ञानिकों ने एक वाटर स्प्रेयर विकसित किया है, जो स्मॉग को कम करने में कारगर हो सकता है। यह स्प्रेयर स्थिरवैद्युतिक रूप से आवेशित (इलेक्ट्रोस्टैटिक-चार्ज) कणों के सिद्धांत पर काम करता है। वाटर स्प्रेयर में स्थिरवैद्युतिक रूप से आवेशित पानी के कण पीएम-10 और पीएम-2.5 को नीचे धकेल देते हैं, जिससे स्मॉग का शमन किया जा सकता है। स्प्रेयर से एक समान पानी के कण निकलते हैं जो हवा में मौजूद सूक्ष्म धूल कणों के लगभग समान अनुपात में होते हैं। हवा में सूक्ष्म कणों के आपस में टकराने, सूर्य की किरणों और ब्रह्मांडीय विकिरणों आदि के कारण आवेश पैदा होता है। जब छिड़काव की गई बूंदों पर ऋणात्मक चार्ज डाला जाता है, तो वे धनात्मक सूक्ष्म कणों की ओर आकर्षित होती हैं। इसी तरह, धनात्मक रूप से चार्ज सूक्ष्म कणों पर ऋणात्मक चार्ज युक्त पानी की बूंदों की बौछार करने पर वे एक दूसरे की आकर्षित होते हैं। इस कारण पानी की बूंदें और हवा में मौजूद कणों के संपर्क में आती हैं

पाकिस्तान का नया फार्मूला अब महात्मा के वेश में घूमेंगे पाकिस्तानी एजेंट

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इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, आध्यात्मिक गुरु या बाबा के रूप में संवेदनशील जानकारी साझा करने के लिए सैनिकों या उनके परिवारों को लुभाने के लिए पाकिस्तान इंटेलिजेंस ऑपरेटिव्स (पीआईओ) द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली यह नवीनतम विधि है। एक आंतरिक दस्तावेज में सेना ने अपने कर्मियों को इस जासूसी तकनीक में न फंसने की चेतावनी जारी की है। भारतीय सेना ने अपने सैनिकों को नकली बाबाओं और आध्यात्मिक गुरुओं से सावधान रहने की चेतावनी जारी की है। सेना ने कहा है कि ये पाकिस्तानी खुफिया एजेंट हो सकते हैं, जो उन्हें फंसाने और गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। सैन्य अधिकारियों के अनुसार पाकिस्तानी खुफिया एजेंट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि यूट्यूब, व्हाट्सएप और स्काइप का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि सेवारत सैनिकों को निशाना बनाया जा सके। सेना ने लगभग 150 सोशल मीडिया प्रोफाइल की पहचान की है, जिन पर पाकिस्तानी एजेंट होने का संदेह है। ये सभी एजेंट संवेदनशील जानकारी एकत्र करने के लिए सेवारत और सेवानिवृत्त कर्मियों और उनके आश्रितों को अपने जाल में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ सोशल मीडिया प्

सर्वोच्च न्याय का सर्वोच्च न्यायालय

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आखिरकार! सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सबसे ऐतिहासिक, मौलिक, महत्वपूर्ण, बड़े और प्राचीन अयोध्या विवाद का सर्वोच्च न्याय कर दिया। जो भारतीय न्यायपालिका के इतिहास और आमजन के मानस पटल में युगे-युगिन स्वर्ण अक्षरों में अमिट रहेगा। दिव्य न्याय में किसी की हार है ना जीत, फैसला है समुचित और सुरक्षित। या कहें ना हिंदू का, ना मुस्लमान का, ये फैसला है हिंदुस्तान का। जीता तो कानून जीता, न्याय  व्यवस्था जीती, संविधान जीता, इंसानियत जीती, देश जीता और हारा कोई भी नही। यही है सच्चा हिंदुस्तान। स्त्तुय देश ने इसे दिल से लगाया। चाहे वह पक्ष हो या विपक्ष सभी ने इंसाफ का मन से सम्मान किया। बेहतर शीर्ष अदालत ने देश की जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को रेखांकित करते हुए वतन की गंगा-जमुना तहजीब को और अधिक प्रगाढ़ किया है। जिसके के लिए देश का संविधान सदा वंदनीय और न्याय का मंदिर प्रार्थनीय रहेगा। प्रत्युत, सरजमीं में अनादिकाल से प्रचलित पंच-परमेश्वर की न्याय पंरपरा को आगे बढ़ाते हुए उच्चतम न्यायालय के पंच न्यायमूर्तियों ने पंचनिष्ठा से अपने सर्व सम्मत फैसले में अयोध्या की विवादित ढा

क्यों कायस्थ 24 घंटे के लिए नही करते कलम का उपयोग

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जब भगवान राम के राजतिलक में निमंत्रण छुट जाने से नाराज भगवान् चित्रगुप्त ने रख दी  थी कलम !!उस समय परेवा काल शुरू हो चुका था |  परेवा के दिन कायस्थ समाज कलम का प्रयोग नहीं करते हैं  यानी किसी भी तरह का का हिसाब - किताब नही करते है आखिर ऐसा क्यूँ  है ? कि पूरी दुनिया में कायस्थ समाज के लोग  दीपावली के दिन पूजन के  बाद कलम रख देते है और फिर  यमदुतिया के दिन  कलम- दवात  के पूजन के बाद ही उसे उठाते है I इसको लेकर सर्व समाज में कई सवाल अक्सर लोग कायस्थों से करते है ? ऐसे में अपने ही इतिहास से अनभिग्य कायस्थ युवा पीढ़ी इसका कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती है I जब इसकी खोज की गई तो इससे सम्बंधित एक बहुत रोचक घटना का संदर्भ हमें किवदंतियों में मिला I कहते है जब भगवान् राम दशानन रावण को मार कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत ने  गुरु वशिष्ठ को भगवान् राम के राज्यतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की  व्यवस्था करने को कहा I गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राज्यतिलक की तैयारी शुरू कर दीं I ऐसे में जब राज्यतिलक में सभी देवीद