बेतहाशा महंगाई, जनता की रोजमर्रा की जीवनशैली को दे रही भारी शिकस्त हैं...!

 बेतहाशा महंगाई, जनता की रोजमर्रा की

जीवनशैली को दे रही भारी शिकस्त हैं...!
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पेट्रोल-डीजल तो ठीक लो गैस में लग गई आग, आज का यही लोक राग। सभी का यही राग 6 मई को लगाया रसोई गैस का नंबर और 977.5 रूपये ने उछाल मारा रूपये पचास की बढ़ोतरी का दूसरे दिन टंकी आई रुपये 1027.5 किसी ने दिया है पाइंट में पैसा कभी... ?, सभी ने चुकाया राउंड अप में और कीमत चुकाते हैं रुपये 1030 की क्योंकि चिल्लर नहीं मिलती, ना ही स्वीकार की जाती है।

बहुत दुख में जी रहे हैं, फिर भी जूं है कि रेंगती नहीं,
है मगर काटती भी नहीं। कुछ समय पूर्व में जाऐं या दो - तीन - चार साल के पहले की जितनी कीमतें पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस की चुकाते थे आज डबल हो गई या उससे अधिक हो गई और इसे मजबूरन हम सभी चुकाते हैं, रो-गाकर या अंधभक्ति में ताली पिटते हुए, बताऐं
आपकी आय डबल हुई क्या या नौकरी पेशा, पेंशनर्स की आय बढ़ी, नहीं बढ़ी ना तो हासिल में आई महंगाई। अब ठोको ताली या गाल बजाओ या गाल फुलाओ। महंगाई बढ़ा रहे, टेक्स बढ़ा रहे, जीएसटी बढ़ा रहे। इनसे बड़े व्यापारी, बिजनेसमेन कमा रहे हैं, टेक्सों से सरकार अरबों
रूपये कमाती हैं फिर कर्मचारियों, पेंशनरों को महंगाई भत्ता, राहत देने में राज्यों की सरकार जान बूझकर मुंह
चुराती हैं। जो लोग ताली पिटते हैं, महंगाई के विकास पर शायद वो अधिक संपन्न होंगे या वो लोग नौकरी-धंधा करने वाले या घर के किसी पेंशनर्स से इस बारे में पूछ सकते हैं। महंगाई बढ़ रही है, देश तरक्की कर रहा हैं आपका विकास हो रहा है और आपको कैसा लग रहा है।

आज खाद्यान्न महंगे हैं, तेल, अनाज, मसाले यहां तक की ईंधन (रसोई गैस) सब महंगे, इन सबकी कमाई, कहीं न कहीं, किसी न किसी की जेब में जा रही हैं, ये है कि फ्री में
बांटे जा रहे हैं, राहत के नाम पर कुछ प्रतिशत लोगों को,
उन्हें कमाऊ नहीं बनाना हैं, उन्हें फ्री की आदत लगाककर
आलसी बनाना हैं, एक बड़ी आबादी से मिलें करों के राजस्व को बर्बाद करना हैं इससे अच्छा है कि महंगाई कम करें, वस्तुओं की कीमतें कम करेंगे तो सारी जनता
काम भी करेगी और कमायेगी भी तथा खर्च भी करेगी और महंगाई कम होने का, कीमतें कम होने का लाभ सारी जनता को समान रूप से मिलेगा।

आज सब जगह भटकाव हैं जिम्मेदारी से एवं सामंतशाही
वर्तमान में भी मौजूद हैं, नये रंग में, विरोधियों को इसका असर लोकतंत्र में भी साफ नजर आता है। कर्तव्य से ध्यान दूसरी ओर भटकाये रहते हैं और फिर ध्यान किसी
ओर बखेड़े, मुद्दे  जो अनुपयोगी होता है पर डलवा दिया जाता है। आज भी पुराने मुद्दे वृहद ओर बदले स्वरूप में मौजूद हैं वह भी विकराल होकर। सबका साथ लेकर सबका विकास होता है, महंगाई बढ़ती है सब पर समान रुप से और विकास का मौका व्यापारी, बिजनेसमेन, उद्योगपतियों को कमाई करने का मिलता है। फिर फ्री
के चस्के का भुगतान भी जनता से प्राप्त टेक्स से चुकाया जाता है, जो चुकाते हैं उन पर टेक्स और लादकर
होता है, इतना ही नहीं, कर्ज लेकर भी फ्री-फ्री दे दिया जाता हैं और फिर टेक्स पेयी जनता से टेक्स बढ़ाकर
वसूला जाता है। फिर फ्री जो फ्री ले रहा वह था और है और आगे भी फ्री लेता रहेगा, यही विडंबना हैं।

महंगाई, गरीबी, बेकारी, बढ़ती आबादी, पर्यावरण
ऐसी समस्याएं हैं जो थी, है, और आगे भी बढ़ती रहेगी,
कभी खत्म नहीं होगी। जनता पर राज करने वालों से सीखना चाहिए कि बिना ईंधन और माचिस के कैसे आग लगाई जाती है चूल्हों में, पेट में, आंखों में, दिलोदिमाग में,
बिना आग या हीटर, माइक्रोवेव के खाने की थाली कैसे
गरम की जाती ही नहीं हैं बल्कि जलाई जाती है।
पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ाना, किसी समय विपरीत दल की सरकार में आंदोलन करने वाले दल को वर्तमान में क्यों फीलगुड करता हैं। महिलाओं
की रसोई गैस की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि कर करोड़ों
परिवारों को दुखी कर दिया इसका रत्तीभर भी रंजोगम
नहीं। ये कैसा सबका विकास है।

इस बढ़ती महंगाई ने देश की दुखी जनता को निचोड़कर
रख दिया है, जनता ने देखा है कि कोरोना से त्रस्त जनता
की आवश्यकता की वस्तुओं और रोटी, कपड़ा, मकान
की जरूरतें चालीस-पचास फीसदी महंगी हो गई है। ऊपर से प्रदेश के पेंशनरों की राहत नहीं बढ़ी होने से
ये वर्ग भयंकर नाराज और दुखी हैं यह वर्ग नम आंखों से
मध्यप्रदेश सरकार की ओर देख रहा है। सब मिलकर देश की गरीब जनता को महंगाई शिकस्त दे रही है, जीवन शैली बदल गई हैं  और  फिर हो सकता है कि इसका कोई परिणाम भविष्य में या चुनावों में अवश्य दिखाई दे सकता हैं।


- मदन वर्मा " माणिक "
  इंदौर, मध्यप्रदेश

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