काल की चाल

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 

जीना भी एक कला है। काश यह विज्ञान होता। कम से कम इसमें दो और दो जोड़ने से चार तो होते। कम से कम हाइड्रोजन के दो परमाणु और ऑक्सीजन का एक परमाणु मिलकर जल का अणु तो बनता। यहाँ तो जिंदगी कागज की नाव की तरह बही जा रही है। जमाना बाढ़ बनकर हमेशा पीछे लगा रहता है। जब देखो तब डुबोने के चक्कर में। शायद औरों की झोपड़ियाँ जलाकर उस पर भोजन पकाने से खाने का मजा दोगुना हो जाता होगा। भूख से बिलखती जिंदगियों की अंतर्पीड़ाओं के बैकग्राउंड में एक अच्छा सा संगीत बजा देने से शायद वह कर्णप्रिय लगने लगे। हो सकता है ऊटपटांग गानों के बीच यह भी जोरों से धंधा कर ले। चलती का नाम गाड़ी है और इस गाड़ी में मुर्दों के बीच सफर करना जो सीख जाता है तो समझो उसकी बल्ले-बल्ले है। वैसे भी यहाँ कौन जिंदा है। सब के सब मरे हुए तो हैं। कोई जमीर मारकर जी रहा है। कोई किसी का मेहनताना खाकर जी रहा है। कोई झूठों वादों से बहलाकर जी रहा है तो कोई मैयत की आग पर रोटी सेककर जी रहा है। यहाँ उल्टा-सीधा जो भी कर लो, लेकिन जीकर दिखाओ यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है। या फिर कहलो आठवाँ अजूबा है।

सिर उठाने के लिए नहीं झुकाने के लिए होता है। सिर उठाना तो हमने कब का छोड़ दिया। इतनी ही उठाने की ताकत होती तो दिन को रात, अनपढ़ को विद्वान, सूखी रोटी को मक्खन का टुकड़ा नहीं कहते। एक आदत सी हो गयी है बुरे को अच्छा कहने की, झूठे वादों को सच समझने की। बेरोजगारी को कलाकारी मानने की। जैसे पेड़ कटते समय कुल्हाड़ी में लगी लकड़ी को अपनी बिरादरी समझकर खुश होता है ठीक उसी तरह हम भी अपनी जाति-बिरादरी के मुखिया को चुनकर उनके हाथों गला घोंटवाने का परम आनंद प्राप्त करते हैं। शायद ऐसे ही लोग इस दुनिया में जीने के सच्चे हकदार होते हैं। दुनिया में कीड़े-मकौड़ों से भला किसे शिकायत हो सकती है? कीड़े-मकौड़े तब तक जीवित रहते हैं जब तक किसी के बीच दखलांदाजी नहीं करते। दखलांदाजी करने वालों का जवाब तो सारा जमाना मसलकर ही देता है।

यहाँ चुपचाप चलने वालों की टांग में टांग अड़ाया जाता है। इतना होने पर भी वह अगर चलने लगता है, तो उसकी एक टांग काट दी जाती है। हालत यह होती है कि चलने वाला बची हुई एक टांग को अपना सौभाग्य समझकर टांग काटने वाले को शुक्रिया अदा करता है। जो होता है होने दो, जैसा चलता है चलने दो कहकर आगे बढ़ने की आदत डाल लेनी चाहिए। नहीं तो तुम से तुम्हारा भोजन, पानी, बिजली छीन लिया जाएगा। तब तंबूरा बजाने के लायक भी नहीं बचोगे। यह हवा, आकाश, पानी, आग, धरती सब बिकने लगे हैं। वह दिन दूर नहीं जब चंद सांसों के लिए भी इन्हें खरीदना होगा। तब चंद सांस देने वाला दुनिया का सबसे बड़ा दानी कहलाएगा। अपने लिए आहें भरवाएगा। यहाँ तुम्हारा कुछ नहीं है। तुम एकदम ठनठन गोपाल हो। इसलिए सिर उठाने, सवाल पूछने, परेशानी बताने जैसे देशद्रोही काम बिल्कुल मत करो। यह एक आभासी दुनिया है। यहाँ केवल अपना आभास मात्र रहने दो। इसे हकीकत समझने की भूल बिल्कुल मत करना। वरना किसी आरोप में सरेआम लटका दिए जाओगे।

Comments

Popular posts from this blog

सकारात्मक अभिवृत्ति

तुम मेरी पहली और आखरी आशा

बस और टेंपो की जोरदार टक्कर में 16 की मौत, कई लोग घायल