Tuesday, December 10, 2019

क्या लिखूँ? (कविता)

रोज काल का ग्रास बन रही आसिफा,

फिर कैसे मैं श्रृंगार लिखूँगा ।

देश चल रहा नफरत से ही,

फिर कैसे मैं प्यार लिखूँगा ।

 

वंचित हैं जो अधिकार से अपने,

उनका मैं अधिकार लिखूँगा ।

दुष्टों को मारा जाता है जिससे,

अब मैं वही हथियार लिखूँगा ।

 

रोज जवान मर रहे सीमा पर,

कब तक मैं उनकी बली सहूँगा ।

मर रही जनता रोज देश की,

कब तक मैं ये अत्याचार सहूँगा ।

 

आसिफा, ट्विंकल ना जाने कौन-कौन ?

अब इनकी चित्कार लिखूँगा ।

हाँ, देश चल रहा नफरत से ही

फिर कैसे मैं प्यार लिखूँगा ।

 

सौरभ कुमार ठाकुर (बालकवि एवं लेखक)

मुजफ्फरपुर, बिहार

गरीब (कविता)


कुछ करना चाहता हूँ,

पर कुछ कर नही पाता हूँ ।

आगे बढ़ना चाहता हूँ, 

पर आगे बढ़ नही पाता हूँ ।

कोई मदद करना चाहे,

तो मदद ले नही पाता हूँ ।

किसी से मदद मांगना चाहता हूँ, 

पर शरमा जाता हूँ ।

अच्छे जगहों पर घूमना चाहता हूँ,

पर जेब खाली पाता हूँ ।

बड़े लोगो को देखता हूँ,

तो अपने नसीब को कोषता हूँ ।

अच्छा-अच्छा भोजन चाहता हूँ, 

पर कभी-कभी भूखे पेट ही सो जाता हूँ ।

बड़े-बड़े अमीरों को देखकर, 

मैं भी अमीर कहलाना चाहता हूँ ।

पर अपने आर्थिक परेशानियों के कारण, 

मैं सिर्फ गरीब कहलाता हूँ ।


 

सौरभ कुमार ठाकुर (बालकवि एवं लेखक)

मुजफ्फरपुर, बिहार

Friday, December 6, 2019

आधुनिक समय और आज की माँ

 

 

         रजनी अपने दो साल के बेटे के साथ बस से ससुराल से मायके के लिए सफर कर रही थी।उसके पिता रजनी को ससुराल से अपने घर ले जा रहे थे।जैसे के आमतौर पर बेटियां अपने माँ बाप से मिलने जाती हैं।

 

          ससुराल से मायके तक बस से तकरीबन तीन घंटे का सफर पिता पुत्री को करना था।बस पूरी तरह यात्रियों से भरी हुई थी और धीरे धीरे अपनी मंजिल की और बढ़ रही थी।


 


          पिता पुत्री आपस मे अपने दुख सुख की बाते कर रहे थे कि अचानक रजनी के दो वर्षीय पुत्र राहुल ने अपनी माँ से दूध पिलाने के लिए कहाँ,राहुल अपनी भूख से इतना व्याकुल था कि वही बस में जोर जोर से रोने लगा।

 

          महिलाओ और पुरुषों से भरी बस में रजनी को बच्चे को दूध पिलाना बहुत ही असहज लग रहा था।वो समझ ही नही पा रही थी कि भूख से व्याकुल अपने पुत्र को भीड़ में दूध कैसे पिलाये।

 

          पिता और पुत्री राहुल को काफी समझाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन राहुल का बाल मन समझ ही नही पा रहा था।इधर बस में बैठे कुछ पुरुषों की नजर बस उस पल को देखने के लिए व्याकुल थी जब एक माँ अपने बच्चे की दूध पिलाएगी।

 

          रजनी ने जिस तरीक़े के वस्त्र पहने हुए थे उन वस्त्रो के साथ बच्चे की दूध पिलाना एक बहुत ही शर्मिंदगी की परिश्थिति का सामना करने के समान था।अचानक उस बस की भीड़ में से एक बूढ़ी अम्मा उठी और रजनी के पिता को उठाकर उनकी जगह बैठ गयी।

 

         अम्मा ने एक बड़ा सा शॉल ओढा हुआ था,उस शॉल को अम्मा ने रजनी को दिया और रजनी से कहाँ कि अब वो बेझिझक अपने पुत्र को दूध पिला सकती है।बूढ़ी अम्मा ने उस के अलावा रजनी से कुछ नही कहाँ।

 

          आधुनिक परिवेश  में ढकी रजनी को बूढ़ी अम्मा का कुछ भी ना कहना ये समझा गया कि आधुनिक होना गलत नही है किंतु कुछ बातों में खुद को जगह के हिसाब से ढालना होता है और रजनी के मौन धन्यवाद को अम्मा ने समझा और उसके सर पर हाथ रखकर वापस अपनी जगह पर बैठ गयी।

 

 

 

नीरज त्यागी

ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

क्या लिखूँ?

रोज काल का ग्रास बन रही आसिफा,

फिर कैसे मैं श्रृंगार लिखूँगा ।

देश चल रहा नफरत से ही,

फिर कैसे मैं प्यार लिखूँगा ।

 

वंचित हैं जो अधिकार से अपने,

उनका मैं अधिकार लिखूँगा ।

दुष्टों को मारा जाता है जिससे,

अब मैं वही हथियार लिखूँगा ।

 

रोज जवान मर रहे सीमा पर,

कब तक मैं उनकी बली सहूँगा ।

मर रही जनता रोज देश की,

कब तक मैं ये अत्याचार सहूँगा ।

 

आसिफा, ट्विंकल ना जाने कौन-कौन ?

अब इनकी चित्कार लिखूँगा ।

हाँ, देश चल रहा नफरत से ही

फिर कैसे मैं प्यार लिखूँगा ।

 

सौरभ कुमार ठाकुर (बालकवि एवं लेखक)

मुजफ्फरपुर, बिहार