Tuesday, October 29, 2019

विपत्तियों से डरिये नहीं जूझिये

 मनुष्य की इच्छा हो या न हो जीवन में परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आती रहती हैं। आज उतार है तो कल चढ़ाव। चढ़े हुए गिरते हैं और गिरे हुए उठते हैं आज उँगली के इशारे पर चलने वाले अनेक अनुयायी हैं, तो कल सुख-दुख की पूछने वाला एक भी नहीं रहता। रंक कहाने वाला एक दिन घनपतिबन जाता है तो धनवान निर्धन बन जाता हैं। जीवन मं इस तरह की परिवर्तनशील परिस्तिथया आते जाते रहना नियति चक्र का सहज स्वाभाविक नियम है। अधिकांश व्यक्ति सुख सुविधा, सम्पन्नता, लाभ-उन्नति आदि में प्रसन्न और सुखी रहते हैं किन्तु दुःख कठिनाई, हानि आदि में दुःखी और उद्विग्न हो जाते हैं यह मनुष्य के एकांगी दृष्टिकोंण का परिणाम है और इसी के कारण कठिनाई, मुशीबत, कष्ट आदि शब्दों की रचना हुई वस्तुतः परिवर्तन मानव जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण सहज और स्वाभाविक है। जितना रात और दिन का होना, ऋतुओं का बदलना, आकाश में ग्रह-नक्षत्रो का विभिन्न स्थितियों मंे गतिशील रहना। किेन्तु केवल सुख, लाभ अनुकूल परिस्थियाँ की ही चाह के एकांगी दृष्टिकोण के फल स्वरूप मनुष्य दुःख कठिनाई और विपरीतताओं में रोता है, दूसरों को अथवा ईश्वर को अपनी विपरीतताओं के लिए को सता है, शिकायत करता है किन्तु इससे तो उसकी समस्याएँ बढ़ती हैं, घटती नहीं है। कठिनाइयाँ जीवन की एक सहज स्वाभाविक स्थिति है जिन्हें स्वीकार करके मनुष्य अपने लिए उपयोगी बना सकता है जिन कठिनाइयों मंे कई व्यक्ति रोते हैं। मानसिक क्लेश अनुभव करते है। उन्हीं कठिनाइयों मंे दूसरे व्यक्ति नवनी प्रेरणा, नवउत्साह पाकर सफलता का वरण करते हैं। सबल मन वाला व्यक्ति बड़ी कठिनाइयों को भी स्वीकार करके आगे बढ़ता है तो निर्बल मन वाला सामान्य सी कठिनाई में भी निश्चेष्ट हो जाता है। परीक्षा की कसौटी पर प्रतितिष्ठ हुए बिना कोई भी वस्तु उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर सकती न उसका कोई मूल्य ही होता है। कड़ी धूप में तपने पर ही खेतों में खड़ी फसल पकती है आग की भयानक गोद में पिघलकर ही लोहा साँचे में ढलने के उपयुक्त बनता है परीक्षा की अग्नि में तपकर ही वस्तु शक्तिशील, सौंदर्ययुक्त और उपयोगी बनती है। कठिनाइयाँ मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इन्हें खुले मन से स्वीकार मानसिक विकास प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसे जीवन मंे कभी मुसीबतों का सामना न करना पड़ा हों। दिन और रात के समान सुख-दुख का कालचक्र सदा घूमता ही रहता है। जैसे दिन के बाद रात आना आवश्यक है वैसे ही सुख के बाद दुख आना भी अनिवार्य है। इससे मनुष्य के साहस, धैर्य, सहिण्णुता और आध्यामित्कता की परीक्षा होती है। विपत्तियाँ साहस के साथ कर्म क्षेत्र में बढ़ने के लिए चुनौती है। हम उनसे घबरायें नहीं बहुत सी मुसीबतें तो केवल काल्पनिक होती है। छोटी-मोटी बातों को तूल देकर हम व्यर्थ ही चारों और भय का भूत खड़ा करते हैं। सुबोधराय का जन्म 4 बंगाल में हुआ 6 वर्ष की आयु में एक दिन लेटे-लेटे उनकी नेत्र ज्योति चली गई, उन्होंने निश्चय किया कि ज्ञान चक्षुओं का उपयोग करेगे। अंध विंघालय से उन्होंने एम. ए. प्रथम श्रेणी में किया। छात्रवृति मिली तो अमेरिका, इंग्लैण्ड पढ़ने चले गये। उनकी कुशाग्र कृषि देख कर एक बंगाली विदुषी ने उनसे विवाह कर लिया। डा. सुबोधराय ने पी. एच. डी करने के उपरान्त अपना जीवन उन्धों के विद्यालय बनाने तथा उनके कल्याण की संस्थाएँ बनाने में लगाया। याद रखिए विपत्तियाँ केवल कमजोर कायर और निठल्ले को ही डराती हैं। और उन लोगों के वश में रहती है। जो उनसे जूझने के लिए कमर कस कर तैयार रहते है। इस प्रकार दृढ़ संकल्प वालें व्यक्ति कभी निराश नहीं होते, वरन् दूसरे के लिए प्रेरणा के केन्द्र बन जाते हैं। राम, कृष्ण, महावीर, ब ुद्ध, ईसा, मोहम्मद साहब, दयानन्द, महात्मा गांधी आदि महापुरूषों के जीवन संकट और विपत्तियों से भरे हुए थे पर वे संकटों की तनिक भी परवाह न करते हुए अपने कत्र्तव्य मार्ग पर अविचल अग्रसर होते रहे। सफतः वे अपने उद्देश्य के सफल हुए और आज संसार उन्हें ईश्वरीय अवतार मानकर पूजा करता है। विपत्तियों एवं कठिनाईयों से जूझने मंे ही हमारा पुरूषार्थ ही यदि हम कोई महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते हंै तो उसमें अनेक आपत्तियों का मुकाबला करने के लिए हमें तैयार ही रहना चाहये जिन्होंने इस रहस्य को समझकर धैर्य का आप्रय ग्रहण किया हो आपत्तियाँ संसार का स्वाभाविक धर्म हैं। वे आती हैं और सद आती रहेंगी उनसे न तो भयभीत होइए और न भागने की कोशिश करिए बल्कि अपने पूरे आत्मबल साहस और शूरता से अनका सामना कीजिए उन पर विजय प्राप्त कीजिए और जीवन में बड़े से बड़ा लाभ उठाइए।  


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