विश्व परिवार दिवस पर विशेष

बिखरते परिवार-सिसकते रिश्ते और हम

बिखरते परिवार,सिसकते रिश्ते और भभकती आग।आग में निकलते आंसू,पश्चाताप और बिखराव।अहम,मोबाइल,शक और इधर-उधर से सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करना,अपने आप में ही घुटना और फिर मरना या मारना,परिणाम सब कुछ स्वाहा।कौन पिता,कौन पुत्र,कौन पत्नी,कौन पति,कौन माँ,बेटा,बहन,कौन प्रेमिका सब धरे के धरे रह जाते हैं सिर्फ एक प्यार का एहसास और उस प्यार के प्रति विश्वास और समर्पण न होने के कारण और हम हाथ मलते रह जाते हैं।उसने ऐसा किया ही क्यों?उसकी इतनी हिम्मत कि वो मुझे ऐसे बोले/बोली।आखिर मैं उसका ये हूँ,वो हूँ,पता नहीं क्या-क्या?पुलिस अगर ये कर देती तो उसका ये हो जाता।वो पंचायत में बोल भी नहीं सका/सकी।कोर्ट में तुम्हें ऐसे घसीटूंगा/घसीटूंगी कि बस तुम देखते रह जाओगे/जाओगी।सारा दिन मोबाइल में क्या करते रहते हो?पासवर्ड क्यों लगा रखा है?अभी खोलकर दिखाओ वरना...किन्तु और परन्तु।

मेरे बिना तुम्हारा कौन है?देख लेना जब चली जाऊंगी/जाऊंगा।धमकी दर धमकी,ऊँगली पे ऊँगली,बोल पर कबोल,गुस्से पर गुस्सा,नफरत पर नफरत।दोषी में नहीं तुम हो,सिर्फ तुम हो और सदा तुम ही रहोगे/रहोगी।दो इंच जमीन पर दिवार खड़ी कर देते हैं लेकिन गली के कुत्तों से सब डरते हैं।अपना-अपना घर भरते है,खटते हैं,मिटते हैं,पिटते हैं दिन रात लगे रहते हैं लेकिन जब एकांत में बैठकर सोचते हैं तो सभी खुद को खाली हाथ पाते हैं।क्या गरीब,क्या अमीर,क्या मध्यम,क्या निम्न मध्यम,क्या नेता,अभिनेता,लेखक,कवि,पत्रकार,चौकीदार,थानेदार,पहरेदार,होशियार या बेकार,सब के सब एकसे यार।कैसा समाज,कैसी लाज,शर्म और हया।सिर्फ पैसा,सिर्फ पैसा,मौज मस्ती।कोई खलल न डाले मेरी मौज मस्ती में,मेरा जीवन अपना जीवन,मैं इसे अपने तरीके से जीऊंगा,किसी को क्या हक़ है बीच में टांग अड़ाने की।सोच सकते हैं आप कि नहीं, ऐसा नहीं है।काश!ऐसा ना हो और होना भी नहीं चाहिए लेकिन हमारे ये कहने से कि ऐसा नहीं है ,क्या ऐसा नहीं होगा?इसकी कोई गारन्टी नहीं है।हो सकता कि हमारा सोचने का और देखने का तरीक़ा बिल्कुल अलग हो।लेकिन आप यकीन मानिए कोई एक भी घर नहीं बचा,कोई व्यक्ति बचा हो सकता है,लेकिन घर नहीं जहाँ इफ-बट ना हो।आप कह सकते हैं कि दो बर्तन होंगे तो खुड़कने लाजिमी हैं।जी हाँ,लाजिमी हैं लेकिन ये लाजिमी जब लाइलाज हो जाए तो टेंसन बढ़ती है और जब टेंसन बढ़ती है फिर लाइफ घटती है और सेहत गिरती है,दिमाग थकता है और इंसान बिकता है।परिवाद हो,वाद हो या विवाद हो लेकिन संवाद होना बहुत जरुरी है और हैरत की बात है कि संवाद पर हमारी मानसिकता हावी है।संवाद पर पहरे हैं,संवाद पर संस्कृति,संस्कार और परम्पराएँ हावी है।बेचारा संवाद खुद ही घुटकर रह जाता है और कितनी जिंदगियाँ दम तोड़ जाती हैं जिनकी लाशों के ढेर पर खड़ा हूँ खुद मैं,हम और आप और ये तथाकथित संस्कार और परम्पाराएँ सब यहीं रह जाती हैं,जैसी थी,वैसी ही।इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता।पता नहीं क्यों ये जस की तस है किंतु मानव जाति इस कारण मुश्किल में है पर कोई राह नहीं मिल रहा कि आखिर करें तो क्या करें?एक गजब तो यह भी है कि अक्सर शिक्षित जमात में ज्यादा कुछ है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अनपढ़ जमात में रिश्तों की मर्यादा है,नहीं,वहां भी रिश्ते हर रोज तार-तार हो रहे हैं।परिवार बिखर रहे हैं,टूट रहे हैं,पेंडुलम में झूल रहे हैं।परिवार टूट रहे हैं तो रिश्ते भी बिखर रहे हैं और जब रिश्ते बिखरते हैं तब समाज टूटता है और जब समाज का विखंडन होता है तो फिर निश्चित तौर पर बहुत भयावह समय होता है।शायद कोविड-19 से भी खतरनाक और भयंकर।

अब सवाल यह है कि आखिर इस गम्भीर बीमारी का समाधान क्या है?तो इसका समाधान सीधा और सरल है लेकिन इसे अपनाना उतना ही कठिन है।इसका एकमात्र समाधान है कि सर्वप्रथम हमें अहम को छोड़ना ही होगा।दूसरे हमें परिवार के हर सदस्य को बराबर अधिमान देना होगा।तीसरा हमें छोटी-छोटी बातों को दरकिनार करना होगा।वर्तमान हालात और बदलती हुई परिस्थितियों में खुद को ढालने के लिए तैयार रखना होगा।खासकर मर्द को अपनी सोच बदलनी हो होगी वरना आने वाले समय में कहीं ऐसा ना हो कि हम परिवार नाम की संस्था को ढूंढते ही रह जाएं।

 

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