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Saturday, January 9, 2021

कविता-डर

डरा डरा सा ये दिल,

अब हर किसी से भागता हुआ,
मंजिलें खो सी गयीं है कहीं,
ये दिल अब खुद से लडता हुआ,
ठोकड़े जमाने की या हौसला मेरा हारा,
हर एक मौत पर अब सवालों से मै घिरा हुआ,
जख्म सिलने कि बात अब क्या करू किसी से,
हर एक अपना हाथ में खंजर लिए मेंरे पीछे फिरता हुआ,
चाहत तो फिर भी यहीं हैं एक दिन सब ठीक होगा,
यहीं उम्मीद की लौउ में हमेशा जलता रहा,
इरादे यूँ तो कमजोर नहीं मेंरे, 
फिर भी ना जानें ये दिल क्यों इतना डरा हुआ है,

लेखक संदीप समर
मधुबनी बिहार 

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