मां

मां के प्यार सा संबल

नहीं जहां में,
दिवस हो या निशा
मां बच्चों के हर्ष हेतु
करती चिंतन मनन,
अहसास व्यथा का
तभी तक होता
यदा मां के प्रेम का
मरहम व्यथा पे लगता,
वरना दुनियां तो 
बना देती दर्द का पर्याय
मां के छांव से दूर होते ही,
जीवन से विलुप्त हो जाता
निश्छल प्रेम का अध्याय।
किंचित तबीयत नासाज होने पे,
अपार परवाह करती मां,
संपूर्ण धरा हेतु 
ईश्वर का वरदान मां,
अपार अनुराग तिरोहित
मां के क्रुद्ध में ,
क्या कोई करे मां पे 
रचना सृजन,
हम सब मां के सृजन।

                (स्वरचित)
                 सविता राज

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