Thursday, September 17, 2020

कृषि में कौशल विकास की चुनौतियां 

हम सभी जानते हैं कि दोस्त किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए कौशल और ज्ञान दो प्रेरक बल होते हैं। हमारा भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ ही वैश्विक स्तर पर भी सबसे अधिक युवाओं वाला देश भी है। कृषि क्षेत्र में हमने आजादी के बाद एक लंबा  संघर्ष भरा सफर तय किया है। आज दोस्त हरित क्रांति तथा कृषि वैज्ञानिकों के अनुसंधान तथा प्रसार ने भारत को न सिर्फ खाद्यान्न में  बल्कि दुग्ध उत्पादन में भी विश्व के शिखर में खड़ा कर दिया है और आज भारत फल एवं सब्जियों में दूध , मसाले एवं जुट में वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा उत्पादक देश है। अगर हम धान एवं गेहूं में देखें तो हमारा भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक एवं वैश्विक स्तर पर भारत 80% से अधिक फसलों के सबसे बड़ी उत्पादकों में से आज एक है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हरित क्रांति रणनीति द्वारा भारत में कृषि क्षेत्र के विकास के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा में सुधार लाने पर जोर दिया गया था, जो आज अनाजों से हमारा भंडारण भरा हुआ है। परंतु दोस्तों आज समय की यह मांग है की खाद्य सुरक्षा में सुधार के साथ-साथ अधिक आय अर्जित कराना भी होगा किसानों को क्योंकि आप यह देख रहे हैं कि आए दिन हमारे अन्नदाता आत्महत्या कर रहे हैं। इसके साथ ही पर्याप्त भंडारण क्षमता को भी और अधिक सुदृढ़ करना होगा क्योंकि हम यह भी देख रहे हैं कि पर्याप्त भंडारण नहीं होने के कारण भी अनाज बर्बाद हो जाते हैं कभी-कभी तो राजनीतिक उदासीनता के कारण भी अनाज गोदामों में सड़ते रहते हैं लेकिन हमारा देश भुखमरी में सबसे ऊपर बना रहता है इन सब में सुधार करने की अत्यंत आवश्यकता है।

आप ही देखो ना दोस्तों जहां एक तरफ हमारा भारत ने विश्व में अपने आप को कृषि उत्पादन में साबित किया है वही हम देख रहे हैं दूसरी तरफ हमारे देश में अधिकतर किसान कृषि त्यागना चाहते हैं तथा युवा वर्ग तो गांव में कृषि को त्याग कर शहरो में नौकरी करने हेतु बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं। आज दोस्त बढ़ती आबादी, घटती उपजाऊ कृषि भूमि , कम होते रोजगार तथा निवेश एवं बाजार के जोखिमो  ने कृषि क्षेत्र में कार्यरत युवाओं के समक्ष कृषि को लाभकारी बनाने में कहीं ना कहीं बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अगर सरकार अपनी उदासीनता वाली भावना को त्याग कर युवाओं को प्रेरित करें तो कृषि  में कौशल विकास इन चुनौतियों का उचित समाधान बन सकता है किंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कृषि क्षेत्र में युवाओं का कौशल विकास अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।

130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में दोस्त 70.7 प्रतिशत लोग आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं तथा 57.8 प्रतिशत लोग आजीविका हेतु कृषि से ही जुड़े हुए हैं। लेकिन देख रहे हैं धीरे-धीरे की कृषि में कार्यरत लोगों की संख्या गिरती जा रही है। अगर आंकड़े देखें तो 1999 से लगातार प्रतिदिन 2000 किसान कृषि का त्याग कर रहे हैं तथा हमारे देश के आधे से ज्यादा किसान कृषि को त्याग कर मजदूर बन गए हैं। आप ही देखो ना आज देश के कुल कार्यबल में निरंतर वृद्धि हुई लेकिन ध्यान से देखें तो कृषि का कुल कार्यबल में योगदान लगातार घटता चला जा रहा है। ऐसे में आप सोचो जब हमारे अन्नदाता ही  नहीं होंगे तब हम सब खाएंगे क्या?

याद रखना किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए कौशल और ज्ञान दो प्रबल होते हैं। वर्तमान परिदृश्य माहौल में देखे तो उभरती अर्थव्यवस्था की मुख्य चुनौती से निपटने में वे देश आगे हैं जिन्होंने आज कौशल का उच्च स्तर प्राप्त कर लिया है । आज देखे तो भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा उत्पादक आयु समूह में है क्योंकि भारत के पास 60.5 करोड़ लोग 25 वर्ष से कम आयु के हैं। दोस्तों यही भारत के लिए सुनहरा अवसर प्रदान करेगा अगर देश के नीति निर्माताओं ने युवाओं को कौशल विकास में आगे बढ़ने के लिए मदद करें तो, परंतु हम देख रहे हैं यह आज एक बड़ी चुनौती है। हमारी अर्थव्यवस्था को दोस्त इस युवा वर्ग का लाभ तभी मिलेगा जब हमारा जनसंख्या विशेषकर युवा स्वास्थ्य ,शिक्षित और कुशल होंगे। आंकड़ों के मुताबिक तो हम देख रहे हैं कि कृषि क्षेत्र में कार्यरत कार्यबल वर्ष 2022 में 33 प्रतिशत  तक घटकर मात्र 19 को रह जाएगा वही आंकड़ों के मुताबिक दूसरी तरफ कुल कार्यबल का मात्र 18.5 प्रतिशत ही कृषि में औपचारिक रूप से कुशलता प्राप्त करेगा।

दोस्तों आज किसानों को बदहाली से खुशहाली की स्थिति में लाने की दिशा में हमें सभी संभव प्रयास किए जाने की जरूरत है नहीं तो फिर भूखे मरना होगा। इसीलिए भारत सरकार की 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की पहल एक महत्वपूर्ण एवं उपयुक्त कदम है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु हमें विकास कार्यक्रम , तकनीकी तथा नीतियों का कुशल समन्वय कृषि क्षेत्र में कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पिछले वर्ष ही राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के सर्वेक्षण के अनुसार किसानों की औसत आय 6426 रुपए प्रतिमाह है और इस आय में भी किसान 3078 रुपए कृषि से, 2069 रुपए मजदूरी /पेंशन 765 रुपए पशुधन व 514 रुपए गैर कृषि कार्यों से अर्जित करता है । आज भी सीमांत और छोटे किसान फसल उत्पादन में तेजी से तकनीकी विकास के साथ तालमेल रखने में असमर्थ हैं। अब आप ही सोच सकते हो कि 6426 रुपए  प्रति माह कमाने वाला किसान आखिर कैसे अपना और अपने परिवार का पालन करेगा। हमें किसानों के आय को दुगनी करने के साथ ही कौशल में भी उनको निपुण करना होगा, जिस प्रकार से हम देखते हैं कि किसानों के फलों सब्जियों और अनाजों का उचित मूल्य नहीं मिलता उस पर भी हमें विशेष तौर पर ध्यान देना होगा।

सबसे जरूरी चीज है इन सभी योजनाओं का क्रियान्वयन इमानदारी पूर्वक किया जाए।

 

संवेदनहीनता,लाचारी या दुर्भाग्य-किसान,मजदूर का

संसद सत्र शुरू हुआ।इधर चंद दिन पहले पीपली में किसानों पर लाठीचार्ज किया गया।प्रदेश के गृहमंत्री का ब्यान आया कि लाठीचार्ज हुआ ही नहीं,लेकिन भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष का ब्यान आया कि किसानों पर लाठीचार्ज दुर्भाग्यपूर्ण है।इसी बीच तीन सांसदों की एक कमेटी बना दी जाती है,जो किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकत करके उनकी समस्याओं के समाधान के लिए रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।हुआ भी वही।कमेटी ने कई जिलों में जाकर किसान प्रतिनिधियों से मुलाकात की और अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस दौरान कमेटी को कहीं-कहीं खरी-खोटी भी सुननी पड़ी और भाजपा समर्थित किसान संघ का ये ब्यान भी आया कि किसानों की मांगों का हल होगा।ख़ैर,ये सब हुआ ही था कि केंद्र सरकार ने वर्तमान में चल रहे संसद सत्र में तीनों अध्यादेशों को बिल के रूप में प्रस्तुत कर दिया और साथ ही यह भी दो टूक कह दिया कि किसी भी सूरत में ये अध्यादेश वापिस नहीं होंगे बल्कि बिल पास कर कानून बनाएंगे।इसे क्या कहे संवेदनहीनता,लाचारी या किसान और मजदूर का दुर्भाग्य कि इनकी किस्मत में ही यह लिखा होता है।यह भी तो हो सकता था कि किसानों की आपत्ति सुनकर बिलों में संशोधन करके प्रस्तुत किया जाता,लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हुआ।एक बार दूसरी घटना और देखिए।चल रहे संसद सत्र में बीजू जनता दल के एक सांसद ने पुछ लिया कि आखिर लॉकडाउन के दौरान कितने मजदूरों की मौत हुए और उन्हें कितना मुआवजा दिया गया।हैरत की बात है कि इस समय संसद में सम्भवतः सबसे ज्यादा बार चुनकर आने वाले और अनुभवी सांसद और श्रम मंत्री का संसद में दिया गया ब्यान बेहद चिंतनीय है,शर्मनाक है।उनके ब्यान के अनुसार लॉकडाउन के दौरान कुल एक करोड़ चार लाख मजदूरों ने पलायन किया।इसके बाद जो ब्यान दिया वह बेहद खतरनाक है और वह यह है कि इस दौरान मरने वाले मजदूरों का डेटा सरकार के पास नहीं है,इसलिए उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता।क्या यह ब्यान किसी भी आदमी के गले से नीचे उतर सकता है?क्या यह ब्यान देने से पहले श्रम मंत्री ने जरा-सा सोचा है?क्या यह मान लिया जाए कि सरकार का यह चेहरा है और चरित्र है जबकि मुँह से बोला जाने वाला शब्द अलग होता है,लुभावना होता है।आजकल इन शब्दों का पर्यायवाची कुछ और हो गया है।जबकि दूसरी तरफ सेव लाइफ फाउंडेशन जो कि एक एनजीओ है,के पास पच्चीस मार्च से इकतीस मई तक का डेटा है,इस डेटा के अनुसार कुल एक सौ अठानवे मजदूरों की मौत हुई।यदि किसी एनजीओ के पास मजदूरों की मौत का डेटा हो सकता पर सरकार के पास नहीं,अपने आप में बेहद अजीब है।अगर आपको याद हो तो करीब सौलह मजदूरों की मौत तो रेल के नीचे कटकर हुई थी।औरैया में दो ट्रकों की भिंड़त में छियालीस मजदूरों की मौत हो गई थी,जिस पर खुद देश के प्रधानमन्त्री ने ट्वीट कर दुःख जताया था,सनद रहे कि उस वक्त के अखबार अब भी देखे जा सकते हैं कि हर रोज मजदूरों की ख़बरें छपती थी,प्राइम टाइम होते थे लेकिन दुर्भाग्य कि देश की सरकार के पास कोई डेटा नहीं है।हमने उस समय भी आलेख में लिखा था कि मजदूरों का पैदल ही निकल पड़ना,इस बात का प्रमाण है कि हम और हमारा देश और हमारी संवेदनाएं कहाँ हैं?यहाँ तक कि मरने वाले मजदूरों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?याद रहे कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया और कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी भी की थी,इस मामले पर लेकिन हुआ कुछ नहीं और अब इस तरह का ब्यान और वह भी संसद के पटल पर,जिससे मुकरा नहीं जा सकता।

क्या यह मान लिया जाए कि देश के किसानों और मजदूरों की कोई सुनने वाला नहीं है।इनके नाम पर पिछले सत्तर सालों से केवल राजनीति और ब्यानबाजी हो रही है।कोई भी पार्टी और कोई भी नेता,चाहे वह सत्ता में हो या सत्ता से बाहर हो,इनके नाम पर सिर्फ राजनीति चमकाता है वरना तो दो घटनाएं जो इस समय टीवी की टीआरपी बढ़ा रही हैं,उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं किसान की समस्याएं और मजदूरों की मौत लेकिन क्या कहीं कोई चर्चा है?नहीं।आखिर चर्चा हो भी क्यों,क्योंकि ये सिर्फ वोट बैंक है बाकी कुछ नहीं।ये मेहनत की खाने वाले हैं,भूल जाएंगे लेकिन याद रखिए इतिहास कभी किसी चीज को नहीं भुलाता।समय रहते चेत जाइए वरना किसान और मजदूर के पास 'हाय' है,जो बहुत बुरी होती है।सुना है कि देश के बेरोजगार कल राष्ट्रीय झूठ दिवस के रूप में मनाने जा रहे हैं,सम्भवतः यह पहला मामला ही होगा और उम्मीद करें कि आखिरी भी हो क्योंकि इस तरह की बातें ठीक नहीं होती वैसे बेरोजगारों को रोजगार तो चाहिए और रोजगार देना या रोजगार का प्रबंध करना सरकार का न केवल काम होता है बल्कि जिम्मेदारी भी होती है।किसान,मजदूर और बेरोजगारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी ही होगी,हर हाल में वरना हम बहुत पीछे चले जाएंगे।उधर सुदर्शन टीवी चैनल के कार्यक्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए रोक लगा दी कि ये कार्यक्रम एक धर्म विशेष को टारगेट करता है।काश!सुप्रीम कोर्ट पूरे मीडिया को मछली बाजार होने से भी रोक दे,ये भी देश के लिए बेहद अच्छी बात ही होगी।

 

कृष्ण कुमार निर्माण

  करनाल,हरियाणा।

Wednesday, September 16, 2020

  जिंदगी चलने का ही दूसरा नाम है यारों 

आज दोस्त भारत में हर 4 मिनट में एक शख्स आत्महत्या कर रहा है, अब सवाल यह उठता है कि ऐसी कौन सी बातें हैं, जिनकी वजह से एक इंसान अपनी जान देने पर आमादा हो जाता है?

मुझे लगता है कि आत्महत्या को प्रेरित करने वाले कारणों में घरेलू ,पारिवारिक, निजी और सामाजिक सभी पहलू शामिल है, जो कि आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इन सभी कारणों को मिलाकर हम डिप्रेशन कहते हैं दोस्तों।

अब आप ही देखो ना पिछले  दिन ही यूपीपीसीएस का अंतिम परिणाम आया जिसमें एक हमारे देश के होनहार अभ्यार्थी  का अंतिम रूप से चयन नहीं होने के कारण आत्महत्या कर लिया आखिर दोस्तों आज हमारे युवाओं में इतना अवसाद क्यों बढ़ता जा रहा है? कुछ महीने पहले ही भारत में आत्महत्याओं को लेकर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े जारी हुए थे, जिसमें यह बताया गया था कि भारत में हर 4 मिनट में एक शख्स आत्महत्या कर लेता है। अगर हम घंटे के हिसाब से बात करें तो 1 घंटे में 15 भारतीय किसी न किसी वजह से अपनी ही जान ले लेते हैं। दोस्तों आज यह बेहद ही गंभीर समस्या है ।

दोस्त वैसे तो डिप्रेशन के बहुत से लक्षण होते हैं, लेकिन कुछ खास लक्षणों की हम बात यहां करेंगे जिनकी पहचान कर हम इलाज करा सकते हैं और उनको प्रेरित करके जीवन में आगे बढ़ा सकते हैं। अगर आपको कोई भी व्यक्ति परेशान दिखे, जिसका मन उदास हो, बात-बात पर चिड़चिड़ा हो जा रहा हो, या कोई अपने आपको व्यर्थ समझ रहा हो, किसी प्रतियोगी परीक्षा में असफल हो गया हो ,आशाहीन  महसूस कर रहा हो ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे अवसाद में चले जाते हैं और सोचने लगते हैं कि भगवान अब उसे उठा ले यहीं से दोस्तों आत्महत्या के प्रयास शुरू होते हैं और फिर मरने की योजना के साथ इंसान आत्महत्या कर लेता है। इसलिए आप सब से मेरा विनम्र निवेदन है कि ऐसे कोई भी निराश और परेशान व्यक्ति आपको नजर आए तो उससे बातें जरूर करें जितना संभव हो सके उसका मदद करें और प्रेरित करें कि जीवन में रुकना नहीं चाहिए बल्कि जीवन चलने का ही दूसरा नाम है। दोस्तों विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार कहा गया  था कि इस वर्ष यानी कि 2020 तक डिप्रेशन की बीमारी इंसान की डिसेबिलिटी की दूसरी सबसे बड़ी वजह बन जाएगी, जबकि दोस्तों डब्ल्यूएचओ के मुताबिक साल 2025 -30 तक यह पहली वजह बन जाएगी। ऐसे में अगर कोई बीमारी इस तरह से कॉमन हो रही है तो इसका इलाज बहुत जरूरी है। कोई भी बीमारी हो दोस्त बीमारी तो बीमारी होती है, आप ही सोचो अगर कबूतर के आंख बंद कर लेने से बिल्ली नहीं भागेगी, बल्कि कबूतर को खुद उड़ना  होगा । इसीलिए मैं कह रहा हूं दोस्तों की यह हम सबका कर्तव्य है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति दिखे जो निराश है ,परेशान है उसका मदद अपने अनुसार करने का जरूर कोशिश करें।

आज कोविड 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण बहुतों की नौकरिया चली गई है और काम धंधे चौपट हो गए हैं। हमें ऐसे लोगों का अपने सामर्थ्य अनुसार जरूर मदद करना चाहिए। दोस्त देखा गया है कि जब जीवन में संघर्ष बढ़ता है और उससे तनाव कहीं ना कहीं उपजने ही लगता है तब देखा गया है कि दिमाग में खुशी और सीमित रहने के रसायन धीरे धीरे कम होते जाते हैं, डिप्रेशन बढ़ता जाता है और लोग गलत कदम उठा लेते हैं। आंकड़ों के मुताबिक हम देख रहे हैं पुरुषों में आत्महत्या की दर कुछ ज्यादा है महिलाओं की अपेक्षा क्योंकि दोस्त महिलाओं के मुकाबले पुरुष किसी काम को अंत तक अंजाम देने की प्रवृत्ति रखते हैं। याद रखना मेरे बात को दोस्त जब भी कोई व्यवहार या स्वभाव जरूरत से ज्यादा हो या फिर कहे की जरूरत से ज्यादा समय सीमा तक के लिए हो जो इंसान के सामाजिक ,व्यवसायिक और निजी जीवन पर असर डालने लगे तो दोस्तों वही बीमारी है। आज डिप्रेशन भी ऐसी ही बीमारी है, जो इंसान के लक्षणों में बदलाव और उसके स्वभाव में परिवर्तन से हम समझ सकते हैं। आप ही देखो ना जब एक दो बार कोई व्यक्ति अपने बच्चे को चांटा मारा तो यह गुस्सा चलेगा लेकिन आप ही सोचो अगर रोज गुस्सा होकर कोई व्यक्ति अपने बच्चे को चांटा मारे तो यह  कहीं ना कहीं मानसिक बीमारी है। अब दोस्तों विनम्र निवेदन आप सभी से है कि समाज में जब भी किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई दे तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे अच्छे से मनोचिकित्सक के पास लेकर जाएं कभी भी उसे मात्र तसल्ली ना देकर की चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा, उसे यह भी मत कहना आप की फलां  बाबा के पास जाकर अपने जीवन को बदलने का उपाय पूछ लो । याद रखना दोस्त इससे डिप्रेशन ठीक नहीं होगा और इंसान फिर आत्महत्या की तरफ रुख करेगा। अगर हमें आत्महत्या को रोकना है तो डिप्रेशन के लक्षणों की अनदेखी करने से बचना होगा और मरीज को सहानुभूति के साथ डॉक्टर के पास लेकर जाना हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए यही दोस्तों कारागार उपाय है। इसके साथ ही लोगों को प्रेरित करना चाहिए कि प्रात काल उठकर शैर करें और योगा मेडिटेशन का सहारा ले। देश के युवाओं को एक बात कहना चाहूंगा कि जिंदगी कभी रुकती नहीं है दोस्त अगर किसी परीक्षा में असफल हो जाते हो कोई बात नहीं जिंदगी में और सारे अवसर मिलेंगे जो आप एक दिन इस दुनिया के नक्शे को बदल सकते हो।

 

मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर समस्या 

मानसिक विकार का ग्राफ पूरी दुनिया में बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है, इसका प्रमुख कारण है कि लोगों में समयाभाव व संतुष्टि की बेहद कमी का होना। मानसिक विकार का सीधा संबंध व्यक्ति की निजी भावना व सामाजिक परिदृश्य से है, इसमें विषम परिस्थिति का समावेश, जो व्यक्ति के सोचने, समझने, महसूस करने व कार्य शैली को प्रभावित करने लगती है। ज्यादातर मानसिक विकार के कारण व्यक्ति में अनेक प्रकार की बुराइयों का जन्म भी हो जाता है, जिससे व्यक्ति कुढ़न व नशे का आदी बनने लगता है। मानसिक रोगों के अंतर्गत डिमेंशिया, डिस्लेक्सिया, डिप्रेशन, भूलने की बीमारी, चिंता, आटिज्म, अल्जाइमर आदि आते हैं, जो व्यक्ति की भावनाओं, विचारों व सामाजिक व्यवहारों को बहुत ही तीव्र गति से प्रभावित व परिवर्तित कर देते हैं। मानसिक विकार को जन्म देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समाज व परिवार ही अदा करता है, बाकी लगभग नगण्य भूमिका में प्राकृतिक बीमारी व दुर्घटना आदि आते हैं। मानसिक विकार को लेकर वैज्ञानिकों का दावा है कि जिस तीव्र गति से यह बढ़ता जा रहा है, जल्दी ही यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी का स्थान ले लेगी। 

हालांकि मानसिक विकार के तीव्र गति से बढ़ने के बावजूद भी दुनिया इस बीमारी को महज काल्पनिक कथानक के रूप में लेकर, इसकी उपेक्षा कर रही है, जबकि भावी परिस्थिति में इस बीमारी के प्रति गंभीर चिंतन-मनन की आवश्यकता है। शारीरिक विकार जिस प्रकार व्यक्ति को प्रभावित करते हैं, वैसे ही मानसिक विकार भी व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, बस यह मानसिक विकार आँखों के समक्ष परिलक्षित नहीं होते, यही कारण है कि इसकी उपेक्षा पूर्णतः की जाती रही है। मानसिक विकार का सबसे बड़ा सच आत्महत्या के रूप में पूरी दुनिया के समक्ष मौजूद है, फिर भी इस पर गहन चिंतन-मनन की कमी साफ दिखाई देती है। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के प्रति चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति किसी ना किसी रूप में मानसिक विकार से प्रभावित है। हालांकि यह बीमारी व्यक्ति के मानसिक रासायनिक असंतुलन से भी उत्पन्न होती है, मगर इस असंतुलन का मुख्य कारण भी कहीं न कहीं हमारे परिवेश, परिवार व समाज से ही जुड़ा हुआ होता है। अतः मानसिक विकार से बचने के लिए सबसे पहला उपाय यह है कि हमें अपने परिवेश, परिवार व समाज में संतुलन स्थापित करना होगा। मानसिक तौर पर सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देने से यह बीमारी काफी हद तक कम की जा सकती है। एक सुदृढ़ व स्वस्थ्य मानसिक समाज के विकास के लिए, हमारा सामाजिक ढांचा स्वस्थ्य होना बेहद जरूरी है, तभी इस विकट समस्या से निजात पाना संभव है। 

 

मिथलेश सिंह मिलिंद 

मरहट पवई आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)