संवेदनहीनता,लाचारी या दुर्भाग्य-किसान,मजदूर का

संसद सत्र शुरू हुआ।इधर चंद दिन पहले पीपली में किसानों पर लाठीचार्ज किया गया।प्रदेश के गृहमंत्री का ब्यान आया कि लाठीचार्ज हुआ ही नहीं,लेकिन भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष का ब्यान आया कि किसानों पर लाठीचार्ज दुर्भाग्यपूर्ण है।इसी बीच तीन सांसदों की एक कमेटी बना दी जाती है,जो किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकत करके उनकी समस्याओं के समाधान के लिए रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।हुआ भी वही।कमेटी ने कई जिलों में जाकर किसान प्रतिनिधियों से मुलाकात की और अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस दौरान कमेटी को कहीं-कहीं खरी-खोटी भी सुननी पड़ी और भाजपा समर्थित किसान संघ का ये ब्यान भी आया कि किसानों की मांगों का हल होगा।ख़ैर,ये सब हुआ ही था कि केंद्र सरकार ने वर्तमान में चल रहे संसद सत्र में तीनों अध्यादेशों को बिल के रूप में प्रस्तुत कर दिया और साथ ही यह भी दो टूक कह दिया कि किसी भी सूरत में ये अध्यादेश वापिस नहीं होंगे बल्कि बिल पास कर कानून बनाएंगे।इसे क्या कहे संवेदनहीनता,लाचारी या किसान और मजदूर का दुर्भाग्य कि इनकी किस्मत में ही यह लिखा होता है।यह भी तो हो सकता था कि किसानों की आपत्ति सुनकर बिलों में संशोधन करके प्रस्तुत किया जाता,लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हुआ।एक बार दूसरी घटना और देखिए।चल रहे संसद सत्र में बीजू जनता दल के एक सांसद ने पुछ लिया कि आखिर लॉकडाउन के दौरान कितने मजदूरों की मौत हुए और उन्हें कितना मुआवजा दिया गया।हैरत की बात है कि इस समय संसद में सम्भवतः सबसे ज्यादा बार चुनकर आने वाले और अनुभवी सांसद और श्रम मंत्री का संसद में दिया गया ब्यान बेहद चिंतनीय है,शर्मनाक है।उनके ब्यान के अनुसार लॉकडाउन के दौरान कुल एक करोड़ चार लाख मजदूरों ने पलायन किया।इसके बाद जो ब्यान दिया वह बेहद खतरनाक है और वह यह है कि इस दौरान मरने वाले मजदूरों का डेटा सरकार के पास नहीं है,इसलिए उन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता।क्या यह ब्यान किसी भी आदमी के गले से नीचे उतर सकता है?क्या यह ब्यान देने से पहले श्रम मंत्री ने जरा-सा सोचा है?क्या यह मान लिया जाए कि सरकार का यह चेहरा है और चरित्र है जबकि मुँह से बोला जाने वाला शब्द अलग होता है,लुभावना होता है।आजकल इन शब्दों का पर्यायवाची कुछ और हो गया है।जबकि दूसरी तरफ सेव लाइफ फाउंडेशन जो कि एक एनजीओ है,के पास पच्चीस मार्च से इकतीस मई तक का डेटा है,इस डेटा के अनुसार कुल एक सौ अठानवे मजदूरों की मौत हुई।यदि किसी एनजीओ के पास मजदूरों की मौत का डेटा हो सकता पर सरकार के पास नहीं,अपने आप में बेहद अजीब है।अगर आपको याद हो तो करीब सौलह मजदूरों की मौत तो रेल के नीचे कटकर हुई थी।औरैया में दो ट्रकों की भिंड़त में छियालीस मजदूरों की मौत हो गई थी,जिस पर खुद देश के प्रधानमन्त्री ने ट्वीट कर दुःख जताया था,सनद रहे कि उस वक्त के अखबार अब भी देखे जा सकते हैं कि हर रोज मजदूरों की ख़बरें छपती थी,प्राइम टाइम होते थे लेकिन दुर्भाग्य कि देश की सरकार के पास कोई डेटा नहीं है।हमने उस समय भी आलेख में लिखा था कि मजदूरों का पैदल ही निकल पड़ना,इस बात का प्रमाण है कि हम और हमारा देश और हमारी संवेदनाएं कहाँ हैं?यहाँ तक कि मरने वाले मजदूरों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?याद रहे कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया और कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी भी की थी,इस मामले पर लेकिन हुआ कुछ नहीं और अब इस तरह का ब्यान और वह भी संसद के पटल पर,जिससे मुकरा नहीं जा सकता।

क्या यह मान लिया जाए कि देश के किसानों और मजदूरों की कोई सुनने वाला नहीं है।इनके नाम पर पिछले सत्तर सालों से केवल राजनीति और ब्यानबाजी हो रही है।कोई भी पार्टी और कोई भी नेता,चाहे वह सत्ता में हो या सत्ता से बाहर हो,इनके नाम पर सिर्फ राजनीति चमकाता है वरना तो दो घटनाएं जो इस समय टीवी की टीआरपी बढ़ा रही हैं,उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं किसान की समस्याएं और मजदूरों की मौत लेकिन क्या कहीं कोई चर्चा है?नहीं।आखिर चर्चा हो भी क्यों,क्योंकि ये सिर्फ वोट बैंक है बाकी कुछ नहीं।ये मेहनत की खाने वाले हैं,भूल जाएंगे लेकिन याद रखिए इतिहास कभी किसी चीज को नहीं भुलाता।समय रहते चेत जाइए वरना किसान और मजदूर के पास 'हाय' है,जो बहुत बुरी होती है।सुना है कि देश के बेरोजगार कल राष्ट्रीय झूठ दिवस के रूप में मनाने जा रहे हैं,सम्भवतः यह पहला मामला ही होगा और उम्मीद करें कि आखिरी भी हो क्योंकि इस तरह की बातें ठीक नहीं होती वैसे बेरोजगारों को रोजगार तो चाहिए और रोजगार देना या रोजगार का प्रबंध करना सरकार का न केवल काम होता है बल्कि जिम्मेदारी भी होती है।किसान,मजदूर और बेरोजगारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी ही होगी,हर हाल में वरना हम बहुत पीछे चले जाएंगे।उधर सुदर्शन टीवी चैनल के कार्यक्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए रोक लगा दी कि ये कार्यक्रम एक धर्म विशेष को टारगेट करता है।काश!सुप्रीम कोर्ट पूरे मीडिया को मछली बाजार होने से भी रोक दे,ये भी देश के लिए बेहद अच्छी बात ही होगी।

 

कृष्ण कुमार निर्माण

  करनाल,हरियाणा।

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