Monday, October 21, 2019

सदाचरण

 किसी व्यक्ति का सच्चा परिचय उसका आचरण है। शिष्टाचार मानव जीवन की सुगन्ध है। किसी का व्यक्तित्व कितना ही आकर्षक क्यों न हो, शिष्ट आचरण के बिना उसका कोई मूल्य नहीं है। शिष्टता की बड़ी बहन का नाम विनम्रता है। विनम्रता से सेवा, सरलता, शिष्टाचार, सद्व्यवहार आदि सभी गुण विकसित होते हैं। विनम्र सन्तान के माता पिता सदैव प्रसन्न रहते हैं।
 'विद्या ददाति विनयम्' विनय से विद्या आती है। किसी शिष्य के लिये गुरु से बढ़ कर मार्ग दर्शक कौन हो सकता है? अतः गुरु के प्रति श्र(ा, विनम्रता एवं सेवा का भाव रखते हुये उनकी इच्छानुसार आचरण करना चाहिए। शिष्य की उद्दण्डता एवं अनुशासनहीनता गुरु के मन को खिन्न कर देती है। ऐसे शिष्यों को पढ़ने लिखने की चाहे जितनी व्यवस्था की जाय वे अज्ञानी ही रहेंगे। विनम्र व्यक्ति सदैव सर्वत्र आदर प्राप्त करते हैं गुरु का तथा अपने से बड़ों के साथ विनम्रता का व्यवहार करने से आयु, विद्या, यश तथा बल की प्राप्ति होती है।
अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपि सेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्।।
 कोई ज्ञानार्थी तभी ज्ञान प्राप्त कर सकेगा जब उसके हृदय में विनम्रता होगी। अहंकारी व्यक्ति के अन्तःकरण में ज्ञान का प्रवेश नहीं हो सकता। गुरु का दिया गया ज्ञान उसके ऊपर से बह कर निकल जाएगा। आज के युग में कुछ लोग विनम्रता की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। ऐसे लोग विनम्रता को किसी व्यक्ति की कमजोरी मानते हैं वे यह मानते हैं कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति का कठोर होना आवश्यक है। यह सोचना पूर्णतया गलत है। श्री लालबहादुर शास्त्री हमारे देश के प्रधानमंत्री थे। व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त विनम्र एवं सरल होते हुये भी प्रशासनिक जीवन में उन्होंने कोई समझौता नहीं किया। 1965 के भारत-पाक यु( में उनके सफल संचालन से प्राप्त विजयश्री इसका उदाहरण है। उनके एक विनम्र अनुरोध से पूरे देशवासियों ने एक बार अन्न खाना छोड़ दिया। क्या कठोरता के चलते यह सम्भव था। विनय द्वारा मनुष्य दूसरों का हृदय जीत सकता है। विनम्रता से जो कार्य हो सकता है वह किसी प्रकार के बल प्रयोग द्वारा नहीं कराया जा सकता।
 कोई भी व्यक्ति कितना भी विद्वान हो, धनबल, जनशक्ति रखता हो। यदि अहंकार से युक्त है तो दूसरों की दृष्टि में अनादर और अवहेलना का पात्र बनता है। अहंकारी, दुष्ट स्वभाव वाला तथा प्रतिकूल आचरण करने वाला व्यक्ति सबसे तिरस्कृत होता है और अन्ततः विनाश को प्राप्त होता है। लंका के रावण की दुष्टता से कौन परिचित नहीं है।
 विनम्रता आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों क्षेत्रों में लाभकारी है। जीवन में सफलताएँ प्राप्त करने के लिये इन्द्रियों को वश में करना पड़ता है। यह दुष्कर कार्य है। मानव शरीर एक मंदिर के समान है। इस मन्दिर में ईश्वर का निवास है। इस शरीर द्वारा विनम्रता पूर्वक सदाचरण करने वाला ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। निष्कर्ष यह है कि विनम्रतापूर्वक सदाचरण करते हुये रसवती वाणी से हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। 


वेदानन्द त्रिपाठी


No comments:

Post a Comment