Monday, October 21, 2019

शिष्य, शिक्षक और सम्भावना

 गुरु और शिष्य का पुरातन काल से अत्यन्त पवित्र, श्रद्धा एवं विश्वास से भरा विशु( निस्वार्थपूर्ण सम्बन्ध रहा है दोनो एक सिक्के के दो पहलू हैं, दोनों का ही अस्तित्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। समाज में यदि आज इन सम्बन्धों में कुछ कमी आई है तो इस सम्बन्ध में दोनों को ही विचार करने की आवश्यकता है।
 सामान्यतयः हमें अपनी गलतियां ढूंढनी चाहिए न कि सामने वाले की। यदि हम ऐसा कर लेते हैं, तो समझो कि हमने उस पर विजय प्राप्त कर ली। हमें दूसरे के अनुकूल बनने की सोचना चाहिये, न कि हम दूसरे को अपने अनुकूल बनाने की सोचें। 
 यदि हमें किसी विद्यार्थी को दण्ड देना अनिवार्य लगता है तो हम उसे दण्ड तो दें, किन्तु बाद में उस घटना पर आत्मावलोकन भी करें। एक-दो दिन बाद उस दण्डित किये गये शिष्य को बुलाकर समझाए, कि उसे दण्ड क्यों दिया गया। उसे उसके उज्ज्वल भविष्य के बारे में समझाऐं और विश्वास दिलाऐं कि यदि उसने पूरे मनोयोग से पढ़ाई में मन लगाया तो उसका भविष्य संवर जायेगा और वह अच्छा विद्यार्थी एवं श्रेष्ठ नागरिक बन सकता है। ऐसा करने पर उस शिष्य के मन में यदि दण्ड पाने के समय क्षणिक द्वेष, गलत भावना पैदा हो गई होगी तो स्वतः आपके समझाने के कारण दूर हो जायेगी और वह यह समझने लगेगा कि जो आपने उसे दण्ड दिया, वह उसकी भलाई के लिये था, और उसके मन में आपके प्रति श्रद्धाभाव भी पैदा हो जायेगा। साथ ही स्वयं पर भी चिन्तन करके एक घटना पर विचार करें।
 कल्पना करें कि आप से किसी ने बस स्टैण्ड तक पहुंचने का रास्ता पूंछा, और आपने उसे वहां तक पहुंचने का रास्ता समझाया, किन्तु आपके समझाने के बाद भी वह व्यक्ति बस स्टैण्ड तक नहीं पहुंच पाया, तो क्या कभी आपने विचार किया कि इसमें किसकी गलती है, आपकी या उस व्यक्ति की जो बस स्टैण्ड नहीं ढूंढ सका।
 यदि आप अपना अहम छोड़कर विचार करें, तो आपकी समझ में आ जायेगा कि आप ही उसे ठीक से बस स्टैण्ड पहुंचने का रास्ता नहीं समझा पाये, जिससे वह अपने गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुंच पाया।
हमें सदैव प्यार की ताली बजानी चाहिये। ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती। एक व्यक्ति जब दूसरे व्यक्ति की ओर हाथ बढ़ाता है, और दोनों हाथ परस्पर पास पास आते हैं तभी प्यार भरी ताली की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है।
 यही सिद्धांत गुरु एवं शिष्य के मध्य, मर्यादाओं का ध्यान रखते हुये होना चाहिये। हमें शिष्य की भावनाओं एवं उसके मानसिक स्तर को समझना चाहिये, तथा शिष्य को गुरु के प्रति श्रद्धा समर्पण, विश्वास का भाव अपने मन-मस्तिष्क में समाहित करना चाहिये। गुरु को अपने हृदय में ऊँचा स्थान देना चाहिये। गुरु से जिज्ञासु होकर प्रश्न करना चाहिये और अहंकार से दूर रहना चाहिए। एक अक्षर पढ़ाने वाला भी गुरु होता है। तर्क कभी नहीं करना चाहिए, तर्क तलवार जैसा है।
 जब आप किसी से कुछ कहें तो विचार करना कि आपका हृदय अशान्त, दुखी तो नहीं है। सदैव शान्त भाव में ही बोलना चाहिए। क्रोध में शान्त रहना चाहिए। अपने दिल की बात कह, दूसरे के दिल की बात भी सुनें।
 शिष्य को अपने शिक्षक के प्रति असीम श्र(ा एवं आस्था होती है। पठन-पाठन के संदर्भ में उसके हृदय में आपके प्रति अपने माता-पिता से भी अधिक विश्वास होता है।
 उपरोक्त कथन के सम्बन्ध में हंसानुकरण को बताना समीचीन समझता हूँ। हंस को नीर-क्षीर विवेककारी कहा गया है। अर्थात जल व दूध को मिलाकर हंस को दिया जाय तो हंस दूध को तो पी लेता है, किन्तु जल को पात्र में ही छोड़ देता है। हमारे अन्दर भी ऐसा ही विवेक होना चाहिए कि हंस की भांति हम भी सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई आदि का ईमानदारी से बिना भेद - भाव किये विश्लेषण करें। हंस का यह विशिष्ट लक्षण सभी के लिये विशेष प्रेरणादायक एवं अनुकरणीय होना चाहिए। यदि हम इस हंसानुकरण को आत्मसात कर ले तो हमारा जीवन तो सफल होगा ही, अपितु दूसरों के लिये भी अनुकरणीय होगा।
 जिन्दगी में सम्भावना शब्द का अलग ही महत्व है।  जो किसी को भी किन्हीं भी बुलन्दियों तक ले जाने में सक्षम है। इस शब्द को यदि गुरु और शिष्य के परिपेक्ष में समझे तो हमें चांदी और लोहा का उदाहरण लेना पड़ेगा।
 यदि हम किसी से जानना चाहें कि चांदी और लोहा में कौन चमकदार है, तो उसका उत्तर होगा चांदी। अब यदि हम सम्भावना के संदर्भ में चंादी और लोहा की चमक की बात करें तो हम पायेंगे कि चांदी की चमक एक सीमित चमक है, किन्तु लोहा में चमक तो नहीं है अपितु सम्भावना है। इसको समझने के लिये हमें पारस का सहारा लेना पड़ेगा। चांदी को पारस के सम्पर्क में लाने पर चंादी की चमक में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा। क्योंकि इसमें कोई सम्भावना नहीं है। किन्तु लोहा को पारस के सम्पर्क में लायेंगे तो पारस उस चमकहीन लोहा को सोना बना देगा। अर्थात लोहा चांदी से अधिक चमकीला हो गया, या यूं कहें कि अभी तक चांदी मूल्यवान थी, किन्तु अब लोहा चांदी से भी बहुमूल्य धातु में बदल गया। ऐसा केवल इसलिये हुआ क्योंकि लोहा में संभावना है।
 इसी सम्भावना को एक गुरु को तलाशना होता है अपने शिष्य में। शिक्षक की यही योग्यता है, कि वह अपने लोहा रूपी शिष्य की सम्भावना को पहचाने और उसकी प्रतिभा को बाहर निकालकर निखारे, सपना देखने की ललक पैदाकर आत्म विश्वास को जगाये और उसे एक योग्य, शिष्ट, शीलवान और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का इंसान बनाये यही कार्य कुरु क्षेत्र में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देकर किया, और समुद्र तट पर जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति एहसास कराकर किया।
 सम्भावना साधारण को भी महान बनाती है। बड़ा तो बड़ा बन ही जाता है, क्योंकि उसकी पृष्ठभूमि समृ( होती है, जैसे टाटा, बिरला आदि किन्तु डा. अब्दुल कलाम, एकलव्य, लालबहादुर शास्त्री, सचिन तेंदुलकर आदि साधारण परिवार से होने के बावजूद भी महान हो गये, क्योंकि उनकी सम्भावनाओं को उनके गुरुओं नें पहचाना और शिष्यों को उसका बोध कराकर प्रतिभावान बनने के लिये प्रेरित किया।
 अन्त में मैं यह दावे से कह सकता हूँ कि यदि गुरु अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से निर्वहन करते हुए अपने शिष्य की सम्भावनाओं को उजागर करे, तो शिष्य अवश्य ही प्रतिभावान एवं तेजस्वी बनकर अपना नाम तो रोशन करेगा ही, अपितु अपने गुरु के नाम को भी प्रकाशित करेगा, और उसके हृदय मन-मस्तिष्क में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊँचा होगा।
तभी तो कबीरदास जी ने ठीक ही कहा है- 
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय।।
 अतः सम्भावना में प्रयास छिपा है, और प्रयास सफलता एवं प्रगति का रास्ता दिखाती है। 
सुरेश चन्द्र पाण्डेय


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