Friday, May 29, 2020

स्त्रीत्व बनाम पुरुषत्व

क्या सोचते हो ,

तुम बात नहीं करोगे तो,

यह शाम ना ढलेगी ,

अगर हँस के गले नहीं लगाओगे तो,

यह रात ना कटेगी। 

गलत !बहुत गलत सोचते हो तुम !

वक़्त का काम चलना है, तो चलेगा ही....

शाम भी ढलेगी और रात भी ।

सुबह खुशनुमा बयार भी चलेगी ,

मगर हाँ, मेरे लिए वक्त 

ठहरा-ठहरा सा होगा ।

शाम मुद्दतों में और 

रात सदियों सी कटेगी ,

सुबह की ताज़ी हवा भी 

तुम बिन भली कैसे लगेगी ।

पर अब मैं ना तुमको मनाऊंगी ,

तुम पुरुषत्व के अहं में डूब ,

हर बार मुझे ही दोषी ठहराते हो ।

प्रेम तो साझा होता है ,

तो गलतियों की ज़वाबदेही 

साझा क्यों नहीं ।

नहीं चाहती तुम को अपने 

समक्ष झुकाना ,

पर झूठे अहं के आगे नतमस्तक ,

मैं कब तक और क्यों होती रहूँ ।

इसलिए कि 

मैं स्त्री हूँ !कमजोर हूँ !

भावुक हूँ ! 

तुमसे असीम प्रेम करती हूं !

नहीं ऐसा करना अपमान होगा ! 

स्त्रीत्व का ! प्रेम का !

और शायद तुम्हारे पुरुषत्व का भी....!

 

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