Monday, November 16, 2020

अपने ढँग से जीने दो


माना हम छोटे बच्चे हैं,

अपनी भी इक्षाएं हैं।

अपने भी तो कुछ सपने हैं,

अपनी भी आशाएं हैं।

 

खेल खिलौने अजब अनूठे,

अपनी भी कुछ बातें हैं।

उजले-उजले दिन हैं अपने,

सपनों बाली रातें हैं।

 

मन पतंग की तरह हमेशा,

उच्च उड़ाने भरता है।

अपने ढँग का काम अनोखा,

करने को मन करता है।

 

इंद्रधनुष सा रंग-रँगीला,

अपना तो संसार है।

जिसमें राज कुँवर के जैसा,

अपना तो किरदार है।

 

लेकिन कोई नहीं समझता,

अपनी सोच थोपते हैं।

उनके जैसा बनूँ, करूँ मैं,

हमसे यही बोलते हैं ।

 

कैसे उनको समझाऊँ मैं,

अमृत रस को पीने दो।

बचपन की मस्ती के ये दिन,

अपने ढँग से जीने दो।

 


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