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Wednesday, May 19, 2021

सरस्वती और लक्ष्मी का द्वंद

हिंदी लेखन जगत में एक नई बहस चल रही है। मेरे बहुत से मित्र कुछ न कुछ लिख रहे हैं। कुछ समर्थन में तो कुछ विरोध में। हालांकि बहस में कुछ भी नया नहीं है। यह सालों से चली आ रही समस्या है; जिससे लेखक-कवि जूझ रहा है। समस्या है - सरस्वती-लक्ष्मी का द्वंद्व। 

दो तरह के काम हैं। एक, स्वयंचेतस् रचनात्मकता। दूसरा, डिमांड पर लिखना। दोनों अलग-अलग हैं। 
मैं एक पत्रिका का सह संपादक रहा हूँ। मैंने बाक़ायदा पैसे लिये। क्योंकि वो काम 'मज़दूरी' है। ईमेल चेक करो, आवश्यक संसोधन करो, प्रूफ़ रीडिंग, डिजाइन तैयार करो ... ढेर सारे छोटे-मोटे काम। यह एक फॉर्मेट में होता है। इसका पारिश्रमिक माँगा जाना चाहिए। 
विद्यालयों में बतौर वक्ता गया हूँ। बुलाने वाले मित्र थे। जब वक्ता होने की सहमति दी तब नहीं पता था कि बोलने का पारिश्रमिक मिलता है। लेकिन भाषण-समाप्ति उपरांत पैसा हाथ में आया तो अच्छा लगा। वो मेरी बेरोज़गारी के दिन थे। उन पैसों से काफ़ी सहायता मिली। 
कुछ कार्यक्रमो का संचालन भी किया है, शौक़िया तौर पर। कभी न पैसा माँगा न मुझे दिया गया। मैं पैसों के लिए यह करता भी नहीं था। हाँ, एक जगह के आयोजक ने ( जिसने कार्यक्रम में लाखों का खर्चा किया था ) मुझे पाँच हजार का चेक दिया था। मैंने सहर्ष स्वीकार भी लिया था। 
कहीं पर बोलने जाने से पहले मैंने आयोजकों से यह कभी नहीं कहा कि मैं डिबेटर रहा हूँ। यह देखिए मेरे सर्टिफिकेट्स। मेरी प्रतिभा है इसलिए आपको पैसा देना होगा। उल्टा मैं डिबेट में इसलिए जाना छोड़ चुका था क्योंकि वहाँ पुरस्कार राशि के लिए मारधाड़ मची थी। योग्यता झक मारती थी। रटा-रटाया और आवेशपूर्ण बोलना ज्यूरी को ज़्यादा रुचता था। उनकी अपनी लॉबी थी। ख़ैर ...
अनुवादक का काम किया है मैंने। अंग्रेजी से हिंदी। काम करवाने वाले ने प्रति-पृष्ठ मेहनताना तय किया। मुझे कीमत ठीक लगी तो मैंने वह काम किया। 
दिल्ली में मेरे घनिष्ठ हैं।  उन्हें कंटेंट प्रोवाइड करता था। यह काम भी बाक़ायदा पारिश्रमिक देता था। 
अपने मित्रों की किताबों की प्रूफ़ रीडिंग की है। मैंने किसी से पैसा नहीं माँगा। यह काम मैंने दोस्ती के लिए किया। कुछ काम मुझे सौंपा गया तो मैं मना नहीं कर पाया और कुछ मैंने स्वेच्छा से किया ... एक मित्र ने पैसे देने भी चाहे तो मैंने स्वीकार न किये।
पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख भेजता रहा हूँ। बस इसलिए कि लोगों तक मेरा लिखा हुआ पहुँचे। यह शुद्ध रचनात्मक कार्य था। मैंने इस काम के लिए कभी पैसे नहीं चाहे। तीन चार पत्रिकाओं ने लेख प्रकाशन पश्चात बैंक डिटेल माँगी तो सुखद भी लगा।
बात हमारी इच्छा पर है। डिमांड पर लिखने के पैसे मांगना लेखक का अधिकार है। लेकिन अपना लिखा सिर्फ़ इसीलिए न छपवाना कि उसके पैसे नहीं मिल रहे, नितांत बौनापन है।
अमीश त्रिपाठी और चेतन भगत करोड़ों कमाते हैं। फेम और ग्लैमर उन्होंने खुद पैदा किया है। आप ब्रांडिंग कीजिए, मार्केटिंग कीजिए, कमाइए लाखों - कौन रोक रहा है ?
पाठकों का मन मेरी समझ में नहीं आया कभी। आजकल वो ग्लैमर के पीछे भागता है। अमीश का कचरा पढ़ लेंगे लेकिन नरेंद्र कोहली को खरीदकर पढ़ने में जोर आता है। बलदेव उपाध्याय की किताबें कोई पलटकर देखना नहीं चाहता, वहीं राधाकृष्णन का दर्शन थोक में बिक रहा। कुछ बात फेम की है, कुछ पाठकों के नज़रिये की। लेकिन वो उसकी मर्ज़ी की बात है। आप और मैं दबाव नहीं डाल सकते।
कुछ किताबें जो उपहार में मिलतीं हैं, स्तरीय होतीं हैं तो कुछ कोरा कचरा। कुछ खरीदीं किताबें भी निराश कर सकतीं हैं।
एक सवाल रॉयल्टी को लेकर भी है। प्रकाशक किताब बेचे और आपको उचित रॉयल्टी न दे तो यह धोखेबाजी है। लेखक को रॉयल्टी मिलनी चाहिए और उसकी योग्यता को सम्मान भी। लेकिन हाँ, योग्यता का सम्मान लड़-झगड़कर तो नहीं लिया जा सकता न !
अनुपम मिश्र कृत " आज भी खरे हैं तालाब " पुस्तक की लाखों प्रतियाँ बिकीं। उन्होंने उसे कॉपीराइट से मुक्त रखा। यह उनकी इच्छा थी। उनके लेखकीय कर्म का सम्मान किया जाना चाहिए। यह सेवा ही थी... लेकिन आप पर कोई दबाव नहीं कि आप सेवा करें। यहाँ अनुपम जी को लेखक-बिरादरी का दुश्मन मानने का कोई कारण नहीं। ऐसे कई सेवाभावी लोग गम्भीर अकादमिक कार्य में लगे हुए हैं ... मेरा असीम आदर है उनके प्रति।
यह आपका चुनाव है। आप चाहें तो कचरा बेचकर करोड़ों कमाएं, चाहें तो महत्वपूर्ण कार्य का भी एक पैसा न लें। निराला का उदाहरण ज़्यादा घसीटने का कोई अर्थ नहीं रहा। अंग्रेजी लेखकों का लेखकीय-कर्म भी हिंदी के मुक़ाबले थोड़ा अलग है, इसलिए उसकी चर्चा भी अकारथ है। 
हम अपने हीनताबोध से बाहर आएं। पुरस्कारों के लिए लड़ना-झगड़ना बंद करें। चापलूसी कर फैलोशिप प्राप्ति के सपने देखना छोड़ें। सुंदर लड़कियों की अधपकी कविताओं को अज्ञेय के शिल्प की कविताएँ कहने से बचें। कोमल शरीर देख समीक्षा-लेखन से बाज़ आएं .... तो कुछ बात करें। 
मुझे कोई लड़की अच्छी लगी तो उसके ज़िस्म की तारीफ़ कर ली, उसके सौंदर्य पर कविता लिख मारी, उसके ड्रेस  सराह लिया, कुछ सलाह दे दी, कह दिया कि भविष्य उज्ज्वल है आपका, लेकिन उसके लिखे को निराला के समकक्ष बताने का अपराध न हो सका। 

इति नमस्कारांते ...

प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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