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Monday, June 21, 2021

मिट्टी के बर्तनों से टूटता नाता:-

हिमाचल प्रदेश मण्डी  जिला के पांगणा उप-तहसील मुख्यालय से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित तोगड़ा गांव देवी-देवताओं के देवगण "तोगड़ा" के कारण तोगड़ा नाम से जाना जाता है।"तोगड़ा" शब्द दिव्य शक्ति सम्पन्न देवगण के लिए व्यवहृत होता है।यह लोकोपकारी देवगण कुचाली स्वभाव का माना गया है।देवगण तोगड़ा अपने अनुयायियों की मनोकामनाएँ पूर्ण करने के लिए प्रसिद्ध है। इस गांव के पास धार,डूंघरु,कणाओग,मंशवाड़ा,फरैटल,सराई, देहरी आदि उप-गाँव हैं।तोगड़ा गांव कुम्हारों का गांव है।तोगड़ा निवासी मेहर चंद शर्मा का कहना है कि जनश्रुति है कि रियासती काल में मस्ता नामक ब्राह्मण के पुत्र घुइंया ने कुम्हारों को यहाँ लाकर बसाया था।जवाहर नामक कुम्हार ने सबसे पहले तोगड़ा में बर्तन बनाने शुरू किए।सम्पूर्ण  पांगणा के साथ लगते,नाचण,सुंदर नगर,सराज के शिकारी देवी से सटे ऊपरी क्षेत्र के गांवों में तोगड़ा के बने घड़े,घड़ोलु,पारू,ढोरणु,संजीउठिया,दीपक,सींजीए,चीड़ के पेड़ों का बिरोजा निकालने में प्रयुक्त होने वाले गमले आदि की बहुत मांग  रहती थी।आज तोगड़ा मे मिट्टी के बर्तन निर्माण से जुड़े एक मात्र कुम्हार इन्द्रदेव का कहना है कि आधुनिक समाज का मिट्टी से बने बर्तनों से नाता टूटता जा रहा है।लेकिन फिर भी कुछ लोग अभी भी ऐसे बचे हैं जो इस पारंपरिक सास्कृतिक विरासत के कद्रदान हैं।वे बताते हैं कि उनके पूर्वज लोगों को गर्मियों में निर्जला एकादशी के दौरान घड़े तथा दीपावली के अवसर पर संजीउठिया,सींझीए भेंट करते थे तथा बदले में सम्बंधित परिवार के लोग कुम्हारों को अन्न व दालें भेंट करते थे।सुभाषपालेकर प्राकृतिक खेती और अद्भुत प्राचीन अनाज के प्रति किसानों को जागरूक कर रहे तोगड़ा गांव के धार उप-गाँव निवासी सोमकृष्ण गौतम व पज्याणु गांव की लीना शर्मा  का कहना है कि मिट्टी के बर्तनों के दान के बदले अनाज व दालें दान करने की यह समृद्ध प्रथा "कमीण" कहलाती है।इस "कमीण प्रथा" से व सास्कृतिक कला कौशल से कुम्हारों की व्यवहारिक रोजी-रोटी तो जुड़ी होती थी वहीं एक दूसरे के प्रति आदर,श्रद्धा भाव और सदव्यवहार आज भी परिलक्षित होता है।इन्द्रदेव ने बताया कि उन्हें गर्व है कि वह सास्कृतिक संक्रमण के इस दौर में भी अपनी इस विरासत को बचाए हुए हैं।वहीं तोगड़ा में इस कला कौशल को सुकेत व मण्डी रियासत के ऊपरी क्षेत्रों में पहचान दिलवाना वाले कुम्हार स्व.हेतराम के दामाद नेत्रसिह आज भी समय-समय पर बल्ह से तोगड़ा  आकर इस मिट्टी के वर्तन निर्माण की इस कला कौशल के माध्यम से कुम्हारों के सुनहरे भविष्य के प्रति सजग और आशावान हैं।तोगड़ा निवासी स्व.बालकुराम ने तो भज्जी रियासत में भी मिट्टी के बर्तनों का निर्माण कर इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष हिमेन्द्रबाली'हिम"जी व डाक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि मिट्टी के वर्तनो  का प्रयोग हमें प्रकृति और आरोग्य की ओर लौटाता है।एल्युमिनियम और स्टील के बर्तनों का जहाँ मनुष्य के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है वहीं मिट्टी के बर्तनों का शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं  पड़ता।मिट्टी के बर्तनों में भोजन बनाने से भोजन में मौजूद पोषक तत्व नष्ट नहीं होते हैं। खाने में पौष्टिकता व स्वाद बना रहता है तथा अपच और गैस की समस्या दूर होती है।कब्ज की समस्या से राहत मिलती है तथा कई बीमारियों से बचाव होता है।तोगड़ा निवासी देवेन्द्र शर्मा राजस्व अधिकारी तथा हरिश शर्मा हिमाचल पथ परिवहन निगम में परिचालक हैं।इनका कहना है कि मिट्टी के बर्तनों के कौशल को बढ़ावा देने से ग्रामीण  विकास व रोजगार के साथ विलुप्त होते जा रही इस धरोहर को बचाया जा सकता है।


राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश

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