Tuesday, October 29, 2019

खेलकूद और अनुशासन

 अनुषासन विद्यालय का एक महत्वपूर्ण अंग है। अनुषासन की स्थापना में खेलकूद का विषेश योगदान है इसी सेविष्व के अनेक देषों में अनुषासन की स्थापना में खेलकूद के महत्व को स्वीकार करते हुए विद्यालयों में खेलकूद की व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई है लेकिन हमारे देष में अभी विषेश ध्यान नहीं दिया गया है। प्रायः लोगों की मानसिकता है कि बच्चों को खेलकूद से दूर रखकर पाठ्य पुस्तक द्वारा एवं आचार संहिता द्वारा विद्यालय में अनुषासन की नींव सुदृढ़ की जा सकती है। लेकिन प्लेटों ने कहा ''बालक को दण्ड की अपेक्षा खेल द्वारा नियंत्रित करना कहीं अच्छा है।'' आजकल खेलकूद की उपेक्षा के कारण आए दिन हड़ताल, तोड़फोड़, परीक्षा में सामूहिक नकल का प्रयास, षिक्षकों के साथ दुव्र्यवहार आदि घटनाएँ छात्रों द्वारा हो रही हैं। भारत जैसे विषाल देष में विद्यालयों में पनपती अनुषासनहीनता घातक सिद्ध हो रही है।
 खेलकूद की उपेक्षा से अनुषासनहीनता पनपती है। अनुषासन की स्थापना में खेलकूद विभिन्न प्रकार से सहयोगी है।
 (1) सामाजिक भावना - खेलकूद बच्चों को आपस में मिलजुल कर रहना, आपसी बैरभाव समाप्त करना, विभिन्न जाति व सम्प्रदाय के साथ आपसी तालमेल द्वारा निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करना सिखाता है। फलस्वरूप उनमें सामाजिक सहयोग के भाव उत्पन्न होते हैं जो उन्हें अनुषासन प्रिय बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं। खेलकूद के अभाव में बच्चे इस लाभ से वंचित रह जाते हैं। जब विभिन्न देषों की टीमें खेलती हैं उनके सदस्यों में सहज ही मैत्रीभाव का विकास हो जाता है। क्रीड़ा जगत में एक साथ भाग लेने वाले खिलाड़ी परस्पर प्रतिस्पर्धा तो करते हैं परन्तु द्वेशभाव से दूर रहते हैं। खिलाड़ी हार-जीत को जब खिलाड़ी की भावना से लेने की षिक्षा पाते हैं तो वे जीवन में भी सफलता-असफलता के अवसरों पर सन्तुलन बनाये रखने में सफल होते हैं।
 (2) मस्तिश्क एवं षरीर पर प्रभाव - खेलकूद द्वारा छात्रों के स्वास्थ्य में वृद्विहोती है। खेलने के दौरान प्रत्येक मांसपेषियाँ काम करती हैं तथा रक्त तीव्रता से षरीर में दौड़ने लगता है जिससे बालक का षरीर निरोग बना रहता है और निरोग षरीर में स्वस्थ मस्तिश्क होता है उसमें अच्छे-बुरे समझने की षक्ति होती है जिससे चारित्रिक दुर्बलताएँ मस्तिश्क में प्रवेष नहीं कर पाती हैं। खेलते समय बालक के अन्दर संयम, दृढ़ता, वीरता, गम्भीरता, एकाग्रता तथा सहयोग की भावना का विकास होता है इसके विपरीत खेलकूद के अभाव में छात्रों का षारीरिक एवं मानसिक विकास अवरूद्ध हो जाता है और उनमें आत्मविष्वास की कमी उन्हें आत्मानुषासित बनाने में बाधक होती है। और वह कुण्ठाग्रस्त होकर गलत मार्ग की ओर अग्रसर हो जाते हैं
 (3) अतिरिक्त विकास- बालकों में किषोरावस्था में अतिरिक्त षक्ति होती है। खेलकूद द्वारा उनकी अतिरिक्त षक्ति को सरलता से रचनात्मक कार्यों मेें लगाया जा सकता है। और अतिरिक्त षक्ति का सदुपयोग हो जाता है। यदि अतिरिक्त षक्ति को खेलकूद में न लगाया जाए तो वह षक्ति बुरे कार्यों में लग सकती है।
 (4) अवकाष - खेलकूद के माध्यम से अवकाष का सदुपयोग होता है। प्रायः विद्यालयों में फैलती अनुषासनहीनता का प्रमुख कारण छात्रों को अवकाष के सदुपयोग की सुविधा न देना है। जहाँ अध्ययन के पष्चात् खेलकूद की सुविधा उपलब्ध होती है वहाँ प्रायः किसी प्रकार की अनुषासनहीनता नहीं होती है क्योंकि बालक खेलकूद में इतना व्यस्त रहते हैं कि उन्हें बुरा देखने बुरा कहने-सुनने व करने का समय नहीं मिल जाता है। इसके विपरीत बच्चे उपद्रव मचाते हैं।
 (5) आत्मनियन्त्रण की भावना - छात्र जब किसी अन्य विद्यालय के छात्रों से मैच या किसी प्रतियोगिता में भाग लेता है तो वह ऐसा कोई कार्य नहीं करता जिससे उसकी तथा उसके स्कूल की बदनामी हो।
  फलतः उसमें आत्म नियन्त्रण की भावना जाग्रत होती है और वह अनुषासित ढंग से व्यवहार प्रदर्षन करता है। इसके विपरीत खेलकूद के अभाव में छात्र आत्मनियन्त्रित नहीं हो पाते।
 (6) उचित मार्ग दर्षन- कुछ विद्यार्थियों की पढ़ाई की अपेक्षा खेलकूद में अधिक रूचि होती है। उनकी रूचि के अनूकूल खेलकूद के क्षेत्र में उचित मार्गदर्षन किया जाए तो वे अच्छे खिलाड़ी बनकर भारत का गौरव बढ़ा सकते हैं।
 खेल के समय खिलाड़ी को प्रत्येक अवसर पर तत्क्षण निर्णय लेना होता है। वह किधर से आगे बढ़े कब किस गेंद को किस प्रकार खेलें आदि। इस दृश्टि से खेल व्यक्ति के मस्तिश्क को अनुषासन में बाँध देते हैं।
 उपरोक्त विवेचना के अनुसार खेलकूद और अनुषासन के अन्तरंग सम्बन्ध हैंै। आज की षिक्षा का उद्देष्य बालक का बहुमुखी विकास करना है। एकांगी नहीं।
अतः मानसिक विकास के साथ षारीरिक विकास आवष्यक है तभी छात्र मानसिक रूप से एकाग्रचित, नियन्त्रित अर्थात् अनुषासित रह सकते हैं।
 इस प्रकार अनुषासन के लिए खेलकूद अति आवष्यक है। खेलकूद बालक के सर्वांगीण विकास में सहयोगी व आवष्यक है। अतः खेलकूद के महत्व को स्वीकारते हुए विद्यालय में खेलकूद की उचित व्यवस्था होनी चाहिए जिससे बालक का बहुमूखी विकास हो सके।


No comments:

Post a Comment