विज्ञापन

विज्ञापन

Monday, January 4, 2021

अध्यात्म का गूढ़ रहस्य

अध्यात्म ज्ञान मै स्वयं के द्वारा मन, बुद्धि, शरीर, इन्द्रिया, जीव, आत्मा और परमात्मा का अध्यन ही अध्यात्म है मैं स्वयं के द्वारा आत्मा का प्रयोगशाला ही अध्यात्म है इस सम्पूर्ण विश्व मे रहने वाला मनुष्य किसी न किसी प्रकार से दुःख में जी रहे हैं ऐसे बहुत कम ही मनुष्य है जो सम्पूर्ण आनंद में स्थिर है और जीवन में आनंद नही होने के कारण मन में घबराहट उत्पन्न होता है यही घबराहट मन का बंधन है और मन में भाव उत्त्पन होते है जिससे सही या गलत को जान नही पाते और इस जगत में विचरते रहते है।


मनुष्य का मन ही बंधन और मुक्ति का कारण हैं अतः यह समझा जा सकता है कि यदि मन व्यवस्थित किया जा सकता है तो आत्मा और परमात्मा की सारी समस्याओ का समाधान हो सकता है। मनुष्य की बुद्धि प्रकृति का वरदान है जिसकी योग्यता मनुष्य को सृस्टि मे श्रेष्ठ वाना  देता है यह मानना होगा की मनुष्य को भी सृस्टि की सीमा मे रह कर नियमो द्वारा निर्धरित क्रमवद्ध प्राणी-धर्म निभाना होता है। जन्म, मृत्यु, वृद्धि व्याधि, जरा,की प्रक्रिया निर्दिष्ट है इन घटनाओ का हम स्वेच्छा से चयन नहीं कर सकते। हम शेष सिमित क्षेत्र मे जीवन और उसकी घटनाओ को संवार सकते हैं, उसी ओर हमारा ध्यान और प्रयास अपेक्षित हैं। स्वीकार्य भाव जो क्षेत्र हमारे सीमा से बाहर है जिन घटनाओ जैसे आती है, उसे वैसे ही स्वीकार करना है उसके प्रति मन के स्तर पर प्रोत्साहन स्वीकार्य भाव जागृत करना होगा।

इन सब समाधानों की पुष्टि अध्यत्म है स्वयं का अध्ययन, अर्थात आत्मा का अनुसन्धान। मै "स्वयं" जगत और उसके नियंता की जिज्ञासा, जीवन जीने की कला जीवन्मुक्ति एव मोक्ष है, मोक्ष क्या है, उसके साधन क्या है, मृत्यु की समझ आदि इस मार्ग पर चलते-चलते हमारे लिए सुगम हो जाता है। आत्म-तत्व अथवा आत्मा और परमात्मा से सम्वद्ध अध्यात्म है।आत्मैवेदं सर्वम्  अर्थात सब कुछ आत्मा ही आत्मा है और इसको जाने बिना मुक्त जीवन संभव नहीं है। 

आत्मा को जान कर ही मृत्यु से पार जा सकते है अन्य कोई मार्ग नहीं है। यह सब जानते है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, भय , ईर्ष्या, आदि प्रवृतिया हमारे मुक्त जीवन के मार्ग को रोके रहती है इन सब के मूल ने इच्छा अथवा कामना के भाव ही है। मै स्वयं का भाव होने पर ही कामना ना संकल्प उत्पन्न करती है अपूर्ण होने पर अथवा प्रतिकूल होने पर भाव उत्पन्न होता है और अधिक की भोग इच्छा लोभ उत्पन्न करती है|इच्छित फल प्राप्ति से मोह उत्पन्न हो जाता हैं, जो मेरे की भावना सुदृढ़ करता है। उसके समाप्त होने की चिंता भय उत्पन्न करती है इच्छित वस्तु अन्य को प्राप्त होने से भय ईर्ष्या का उत्पन्न होती है। स्वयं का विचार ही सर्वोपरि है "मै" नहीं तो काम कौन करेगा, मृत्यु का भय भी "मै" के कारण ही होता है। "मै "का संसार से सम्बन्ध नहीं रहता तो जीना कौन चाहेगा !

कर्म के माध्यम से मै आत्मा से परमात्मा तत्व को महसूस किया जाता है कि कर्म मार्ग को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। गृहस्थ व्यक्ति के लिए कर्म अधिक उपयुक्त है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी काम में लगे हुए हैं, और यह शरीर प्रकृति का भाग है इस लिये हम कर्म के रहस्य को नहीं जानते हैं। लेकिन उसके द्वारा किया गया कर्म भी प्रकृति के नियंता के लिये हैं समर्पण भाव कर्म फल से भी मेरा कोई लेना देना नहीं, यही कर्म योग कहलाता हैं। जब मै कर्ता नहीं तो भोक्ता कैसे ? फिर कर्म फल का प्रश्न ही नहीं उठता। यही जीवन्मुक्ति की अवस्था हैं अहं की भावना से किया गया पाप कर्म या पूर्ण कर्म बुरा या अच्छा प्रभाव पड़ता हैं निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म निष्काम कर्म ही हैं |कर्म तो होंगे, लेकिन यह भी सच है कि दुख की उत्पत्ति कर्म से ही होती है। कर्म करो, निष्काम कर्म करो। कर्मयोगी इस कारण से काम करता है कि कर्म करना अच्छा है और इसके पीछे कोई उद्देश्य नहीं है। कर्मयोगी कर्मों का त्याग नहीं करता और कर्मों को दुखों से मुक्त किया जाता है। और वह कभी भी कुछ पाने के लिए चिंतित नहीं होता है वह जानता है कि परमात्मा दे रहा है और बदले में कुछ भी नहीं मांग रहा है और यही कारण है कि वह दु:ख की स्थिति में नहीं आता है। वह जानता है कि दुःख का बन्धन 'मै ' स्वयं का परिणाम है। कर्म मार्ग को बहुत महत्व दिया गया है। भारतीय दर्शन में कर्म को बंधन का कारण माना जाता है। लेकिन कर्म मार्ग में, कर्म का जो रूप तैयार किया गया है, वह बंधन का कारण नहीं है। जब तक शरीर हैं तब तक किस भाव से कर्म किया जा रहा है। 

कर्म सिद्धांत का यह सामान्य नियम है कि हमें वही फल मिलते हैं जो हम करते हैं। इस नियम के अनुसार, शुभ कर्मों का फल अच्छे और बुरे कर्मों के प्रभाव के लिए अशुभ होता है।  इसी प्रकार सुख और दुख को भी क्रमशः हमारे शुभ और अशुभ कार्यों का फल माना जाता है। जो ऐसे कार्यों से युक्त होते हैं, अब प्रश्न यह है कि कौन से कर्म बंधन उत्पन्न करते हैं और कौन सा नहीं? कर्म परमात्मा के लिए होता  हैं, तो वे बंधन उत्पन्न नहीं करते हैं। और पूर्ण परमानन्द को प्राप्त करने में सहायक हैं। इस प्रकार, परमात्मा के लिए कर्म करना, वास्तव में कर्म योग है और इसके अनुसरण से मनुष्य को मुक्ति प्राप्त होता है ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग मेँ कर्म मार्ग को अधिक श्रेष्ठ माना गया हैं। कर्म करने ही हैं जब तक शरीर हैं किस भाव से कर्म किया जा रहा हैं केवल कर्म को छोड़ने के कारण, मनुष्य को सिद्धि या परमान्द नहीं प्राप्त होती है। मनुष्य एक क्षण भी कुछ किए बिना नहीं रहता। फिर भी वे कर्म में लगे हुए हैं।

यदि वे कार्य नहीं करते हैं,  तो व्यक्ति को मिथ्या आचरण करने वाला कहाँ गया हैं। कर्म करना मनुष्य को कहाँ गया हैं यह लोगों की स्थिति के लिए अनिवार्य हैं जिसके बिना शरीर का निर्वाह संभव नहीं है अज्ञानी मनुष्य फल की आकांक्षा से कर्म करता है उसी प्रकार आत्मज्ञानी मनुष्य को लोकहित के लिए आसक्ति रहित होकर कर्म करना चाहिए। इस प्रकार आत्मज्ञान से संपन्न मनुष्य ही, वास्तविक रूप से कर्मयोगी हो सकता।

No comments:

Post a Comment