व्यास जी की कलम से सप्रेम भेंट

एक आशियाँ हो मेरा भी छोटा सा जिसमे दो प्रेमी रहते हो ।

कभी वो मेरे लिए संगर्ष करे कभी में उसके लिए संगर्ष करूँ।।
कभी वो मेरी ख़ुशी को अपना समझे और कभी मै उसके दुःख को अपना मानु।।
जब भी चले नयी राहों पे तो उड़ान साथ भरे आसमां की ओर ।
वो मुझे सहारा दे  होसला बढाये और में उसका सहारा बनू।।
ऐसा हो मेरी खुशियों का आशियाँ जिसमे वो हो और में हूँ।
काश मेरा भी एक छोटा सा आशियाँ होता जिसमे दो प्रेमी रहते हों ।।
मंजिये मिलें अगर तो एक साथ रहकर मिले न काँटों की चुभन हो न हरने का डर हो।।
न उसको मुझसे कोई सिकायत हो न में उसो कभी सिकायत का मौका दूँ।
न कभी वो मुझसे दूर हो न मुझे उससे दूर होने का ख्याल आये ।।
काश मेरा भी एक छोटा सा आशियाँ होता जिसमे दो प्रेमी रहते हों ।।
वो मेरी गलती को भूल जाये में उसमी गलती को भूल जाऊ।
जब भी नया सबेरा हो नए जीवन की सुरुबात हो सूर्य की नयी किरण सफलता की सुरुवात हो।।
मेरा  भी कोई हो जो मेरा हमसफर बने मुझे समझे और मुझसे प्यार करे।।
न कोइ मज़बूरी हो सांसारिक न  कोई रिश्तों की  रकावट हो ।
काश मेरा भी एक छोटा सा आशियाँ होता जिसमे दो प्रेमी रहते हों ।।

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