ऑक्सीजन की आस

देश में संक्रमित मरीजों की संख्या के मुकाबले ऑक्सीजन का स्टॉक सीमित पड़ रहा है। आक्सीजन के सिलेंडर का संकट बना हुआ है। कई राज्यों से ऐसी खबरें आ रही हैं। इसकी वजह से देश के कई कोविड-19 नर्सिंग होम संक्रमित मरीजों को भर्ती करने में आनाकानी कर रहे हैं। मरीज और तीमारदार पहले बेड और फिर ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए परेशान हो रहे हैं, वह कभी एक अस्पताल तो कभी दूसरे अस्पताल इसी के बीच चक्कर काट रहे हैं। मरीजों को अपनी जान बचाने के लिए उन्हें ऑक्सीजन की आस है। बहरहाल, आक्सीजन की कमी एक गंभीर समस्या है जिसे दूर करने में सरकारें अपने-अपने स्तर से लगी हुई हैं। रेलवे ने ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाने की घोषणा की है ताकि कम से कम  सप्लाई लाइन बाधित होने की वजह से अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी ना होने दी जाए । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में 10 ऑक्सीजन प्लांट लगाने का आदेश दिया है। जाहिर सी बात है कि इससे ऑक्सीजन की कमी दूर करने में फौरी राहत शायद ही मिल पाए।

वैश्विक महामारी कोरोना के देश में पैर पसारने के बाद अब लोग खुद को और अपने रिश्तेदारों को बचाने के लिए लाखों-करोड़ो रुपए तक खर्च करने के लिए तैयार है। मगर उसके बाद भी जान बचना नामुमकिन सा दिखाई दे रहा है।

मौजूद समय में कोरोना वायरस के गंभीर मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी होना एक चिंता का विषय बना हुआ है। ऑक्सीजन न मिलने के कारण मौतों का आंकड़ा दिन- प्रतिदिन बढ़ रहा है। मरीज़ के तीमारदार आक्सीजन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। बड़े दुख की बात यह है कि ऐसे वक़्त में भी जगह-जगह ऑक्सीजन के सिलेंडर की कालाबाजारी हो रही है, जो सिलेंडर 20 दिन पहले 13000 रुपये का था आज वह 40,000 में बिक रहा है। ये कहना बिलकुल गलत नहीं है कि ऐसे दौर में भी कालाबाज़ारी अपने चरम पर है। बड़े से बड़े अस्पताल में आज डॉक्टर, मरीज़, मरीज़ का परिवार ऑक्सीजन के लिए सरकार से गुहार लगा रहा हैं। ऑक्सीजन की कमी के कारण स्थिति कुछ ऐसी पैदा हो गयी है की पैसा, डॉक्टर्स, जान-पहचान यहां तक की सरकार भी लाचार दिख रही है। अगर सरकार ने कोरोना वायरस के पहली लहर के बाद भी ऑक्सीजन की सुध ली होती तो शायद मौतों का आंकड़ा इतना न होता और लोग अपनों को न खोते।

 ऐसी भयावह स्थिति के चलते जहां एक तरफ जनता की सरकार से नाराज़गी दिख रही है तो वहीं एक आस भी नज़र आ रही है।

- निकिता शुक्ला

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