राष्ट्रीय बहुआयामी निर्धनता सूचकांक - मानव विकास, भूख, प्रतिस्पर्धात्मकता, मानव पूंजी, नवाचार सहित 29 वैश्विक सूचकांकों में देश के निष्पादन पर नज़र रखी जा रही है

वैश्विक मान्यता प्राप्त सूचकांको के आधार को औजार बनाकर रणनीतिक रोडमैप बनाकर परिणामों में सुधार के लिए सूचकांक के निगरानी तंत्र का लाभ उठाना ज़रूरी - एड किशन भावनानी

गोंदिया - भारत में दशकों से हम मीडिया के माध्यम से पढ़ व सुन रहे हैं कि गरीबी रेखा के नीचे, गरीबी रेखा के ऊपर, रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट, तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट, दांडेकर समिति की रिपोर्ट, अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी का गठन गरीबी का पैमाना नापने का आधार, सबका अपना-अपना पैमाना परंतु साथियों आज भी वही चल रहा है कौन गरीबी रेखा के नीचे है, और कौन ऊपर। सन 2012 में जारी योजना आयोग के साल 2009-2010 के गरीबी आंकड़े कहते हैं कि पिछले पांच साल के दौरान देश में गरीबी 37.2 फीसदी से घटकर 29.8 फीसदी पर आ गई है। यानि अब शहर में 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन और गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता।नए फार्मूले के अनुसार शहरों में महीने में 859 रुपए 60 पैसे और ग्रामीण क्षेत्रों में 672 रुपए 80 पैसे से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। साथियों बात अगर हम गरीबी की करें तो, गरीब कौन ? गरीबी रेखा क्या है? गरीब,गरीबी और गरीबी रेखा आय-व्यय, कैलौरी मात्र, कुपोषण अर्द्ध-भुखमरी व भूख से मौतों जैसे मुद्दोंपर सरकार, योजनाकारों व जनता के बीच कई दशकों से देश में बहस चल रही है। हाल ही में गरीबी रेखा पर हुई बहस में योजनाकारों द्द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में 26 रूपये तथा शहरी क्षेत्रों में 32 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय से कम प्राप्त करने वालों को गरीबी रेखा के नीचे या बी. पी. एल. माना गया जिसे सभी वर्गों ने एकमत से नकार दिया तथा इस सम्बन्ध में सुझाव देने हेतु सरकार दवारा नई समिति का गठन किया गया। गरीबी बहस का विषय नहीं है, सोचने समझने और महसूस करने तथा उसे हर संभव तरीके से निपटने का विषय है। गरीबी रेखा के निर्धारण में रात-दिन कवायद चल रही है। सभी समितियों के निष्कर्ष भिन्न-भिन्न व विरोधाभासी होने के कारण किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सका है। साथियों बात अगर हम नीति आयोग की इस रिपोर्ट की करें तो उसके अनुसार 12 इंडिकेटर के आधार पर तय होते हैं राज्यों की रैंकिंग। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और नीति आयोग की पीआईबी के अनुसार, नीति आयोग द्वारा जारी सूचकांक के अनुसार, बिहार की 51.91 प्रतिशत जनसंख्या गरीब है जबकि झारखंड में 42.16 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 37.79 प्रतिशत आबादी गरीबी में रह रही है। सूचकांक में मध्य प्रदेश (36.65 प्रतिशत) चौथे स्थान पर है, जबकि मेघालय (32.67 प्रतिशत) पांचवें स्थान पर है। केरल (0.71 प्रतिशत), गोवा (3.76 प्रतिशत), सिक्किम (3.82 प्रतिशत), तमिलनाडु (4.89 प्रतिशत) और पंजाब (5.59 प्रतिशत) पूरे देश में सबसे कम गरीब लोग वाले राज्य हैं और सूचकांक में सबसे नीचे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव (ओपीएचआई) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा विकसित विश्व स्तर पर स्वीकृत और मजबूत पद्धति का उपयोग कर तैयार किया जाता है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक में मुख्य रूप से परिवारकी आर्थिक हालात और अभाव की स्थिति को आंका जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है, भारत के एमपीआई में तीन समान आयामों-स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर का मूल्यांकन किया जाता है। इसका आकलन पोषण,बाल औरकिशोर मृत्यु दर, प्रसवपूर्व देखभाल, स्कूली शिक्षा के वर्ष, स्कूल में उपस्थिति, खाना पकाने के ईंधन, स्वच्छता, पीने के पानी, बिजली, आवास, संपत्ति तथा बैंक खाते जैसे 12 संकेतकों के जरिये किया जाता है। साथियों बात अगर हम नीति आयोग द्वारा दिनांक 27 नवंबर 2021को जारी राष्ट्रीय बहुआयामी निर्धनता सूचकांक पर व्याख्यात्मक नोट की करें तो पीआईबी के अनुसार, कैबिनेट सचिव की सुधार एवं विकास हेतु वैश्विक सूचकांक पहल के तहत, मानव विकास सूचकांक, वैश्विक भूख सूचकांक, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक, मानव पूंजी सूचकांक, वैश्विक नवाचार सूचकांक सहित 29 वैश्विक सूचकांकों में देश के निष्पादन पर नज़र रखी जा रही है। इस कार्य का लक्ष्य महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सूचकांकों के निगरानी तंत्र का लाभ उठाना है, ताकि परिणामों में सुधार लाने के लिए इन सूचकांकों को औजार के रूप में इस्तेम…

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